प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : सरस्वती पूजा—ज्ञान और बुद्धि की देवी की आराधना— केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अनुष्ठानों से कहीं आगे जाकर आत्मिक और सांस्कृतिक खोज का भी माध्यम है। यह जानकर आश्चर्य होगा कि, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस—देश की दो सबसे सम्मानित और प्रतिष्ठित विभूतियां एक समय इसी सरस्वती पूजा के आयोजन को लेकर आमने-सामने आ खड़ी हुई थीं। घटना सन् 1928 की है, जब सिटी कॉलेज का शांत परिसर अचानक धार्मिक अधिकार और सहिष्णुता की बहस का केंद्र बन गया। राम मोहन रॉय हॉस्टल, जो साधारण ब्रह्म समाज के नियमों से संचालित होता था, मूर्ति पूजा की अनुमति नहीं देता था। लेकिन सरस्वती पूजा के दिन छात्रों की आस्था नियमों से टकरा गई। उन्होंने प्रशासन की हिदायत के बावजूद हॉस्टल के भीतर पूजा कर डाली।
नतीजा सख्त हुआ। कुछ छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई, हॉस्टल बंद कर दिया गया और कई विद्यार्थियों को दूसरे कॉलेजों में भेज दिया गया। यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि युवा मन में सवाल छोड़ गया—क्या शिक्षा के मंदिर में आस्था के लिए जगह नहीं होनी चाहिए? इसी सवाल के साथ छात्रों के पक्ष में खड़े हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस। उनके लिए यह मामला केवल पूजा का नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता का था। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज सदियों से सहिष्णु रहा है और किसी पर अपनी मान्यता थोपने की परंपरा उसकी नहीं रही। बोस का तर्क था कि ब्रह्म समाज भी उसी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, इसलिए छात्रों को अपनी आस्था व्यक्त करने से रोकना अन्याय है।
दूसरी ओर, गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे अलग दृष्टि से देखा। उन्होंने The Modern Review में लिखा कि अगर छात्र हॉस्टल के भीतर पूजा पर जोर न देते, तो टकराव की नौबत ही नहीं आती। टैगोर के लिए असली प्रश्न यह था कि क्या अपनी धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर किसी और समुदाय की भावनाओं को आहत करना उचित है? उन्होंने यह भी पूछा कि यदि मुस्लिम छात्र अपने धार्मिक तरीके अपनाना चाहें, तो क्या उन्हें वही छूट मिलेगी? इस तरह सरस्वती पूजा एक दिन की रस्म न रहकर दो महान विचारधाराओं की बहस बन गई—एक अधिकारों की, दूसरी मर्यादा और सह-अस्तित्व की।