विशाखा तिवारी
कोलकाता : कोलकाता की गलियों में बसने वाली आस्था हर साल नया रूप लेती है, लेकिन कुछ रूप ऐसे होते हैं जो परंपरा की सीमाओं को छूते हुए इतिहास बन जाते हैं। पिछले साल दुर्गापूजा के दौरान ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला, जब मां दुर्गा अपने पारंपरिक रौद्र और दिव्य स्वरूप से हटकर एक बेहद कोमल, मासूम और “क्यूट” अवतार में सामने आईं। यह कोई साधारण प्रयोग नहीं था। यह एक भावनात्मक क्रांति थी, जिसने कोलकाता ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
जिसे लोग प्यार से “क्यूटेस्ट दुर्गा” कहने लगे, वह देखते ही देखते सोशल मीडिया का सेंसेशन बन गई। इंस्टाग्राम रील्स, फेसबुक पोस्ट्स और यूट्यूब वीडियोज़ ने इस मूर्ति को ऐसा वायरल किया कि लोग केवल उसे देखने के लिए देश–विदेश से कोलकाता पहुंचने लगे। मां दुर्गा का वह बाल-सुलभ, गोपाल रूपी चेहरा लोगों के दिलों में बस गया। एक ऐसा चेहरा जिसमें शक्ति के साथ ममता, और भव्यता के साथ मासूमियत झलकती थी।
इस नए ट्रेंड की जड़ें पहुंचती हैं कुमारटोली तक, कोलकाता की वही ऐतिहासिक धरती, जहां मिट्टी में सांस लेती हैं सदियों पुरानी परंपराएं। यहां के मूर्तिकारों ने न केवल इस प्रयोग को अपनाया, बल्कि उसे एक नई दिशा दे दी। उन्होंने यह समझ लिया कि श्रद्धा अब केवल परंपरा से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव से भी बनती है।
नए साल पर नया ट्रेंड
इस साल कहानी ने एक नया मोड़ लिया है। क्यूटेस्ट दुर्गा के बाद अब कुमारटोली में जन्म ले रही हैं। गोपाल रूपी मां सरस्वती। ज्ञान, संगीत और कला की देवी इस बार गंभीर और शास्त्रीय नहीं, बल्कि एक नन्हीं बालिका के रूप में विराजमान हैं। बड़ी-बड़ी आंखें, हल्की मुस्कान, और ऐसा चेहरा मानो अभी बोल पड़ेगा। ऐसा लगता है जैसे स्वयं सरस्वती मां धरती पर उतर आई हों एक छोटी बच्ची बनकर।
पिछले साल दुर्गापूजा में गिने-चुने पंडालों में ही यह नया रूप देखने को मिला था, लेकिन इस बार सरस्वती पूजा में यह ट्रेंड हर पंडाल की पहचान बनने जा रहा है। कुमारटोली की लगभग हर मूर्ति-दुकान में क्यूटेस्ट सरस्वती की झलक मिल रही है। मूर्तिकारों की उंगलियों से गढ़ी गई ये मूर्तियां इतनी रियलिस्टिक हैं कि देखने वाला कुछ पल के लिए ठिठक जाता है।
मूर्तिकारों को मिला नया दृष्टिकोण
सोशल मीडिया ने इस बदलाव को न केवल गति दी, बल्कि यह भी दिखा दिया कि समय के साथ लोगों की पसंद कैसे बदल रही है। आज श्रद्धालु देवी को केवल पूजने नहीं, बल्कि उनसे जुड़ना चाहते हैं उन्हें अपने करीब महसूस करना चाहते हैं। और शायद यही वजह है कि इस साल कुमारटोली की गलियों में विदेशी पर्यटकों की आवाजाही भी बढ़ गई है। कैमरों में कैद हो रही हैं ये मासूम प्रतिमाएं, और दुनिया को दिखा रही हैं कि कोलकाता में आस्था भी समय के साथ मुस्कुराना सीख रही है।
परंपरा और प्रयोग के इस अद्भुत संगम ने एक बात तो साफ कर दी है। जब कला दिल से निकलती है, तो वह ट्रेंड नहीं, इतिहास बन जाती है।