ट्रंप के बयान के कुछ ही घंटों बाद ईरान पर बरसा मिसाइल 
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युद्धविराम के बावजूद थम नहीं रहे अमेरिका-ईरान के मिसाइल हमले, मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में क्या चल रहा है?

युद्धविराम के बाद भी अमेरिका-ईरान के बीच मिसाइलों की जंग जारी, बदलते गठजोड़ और ऊर्जा हितों से मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में नया तनाव

मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात को देखकर आज दुनिया के सामने कई बड़े प्रश्न खड़े हो गए हैं। सवाल उठ रहा है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे बातचीत का सिलसिला जारी था, तो फिर आसमान से मिसाइलें क्यों बरस रही हैं? अगर हाल ही में युद्धविराम को लेकर सहमति बनी थी, तो फिर इन नए और ताबड़तोड़ हमलों की वजह क्या है? और सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि अगर दोनों में से कोई भी देश आमने-सामने की खुली जंग नहीं चाहता, तो फिर यह तनाव कम होने के बजाय लगातार चरम पर क्यों पहुंच रहा है? इन उलझे हुए सवालों के जवाब किसी एक घटना में नहीं, बल्कि उन जटिल परतों में छिपे हैं जो पिछले कई दशकों की कड़वाहट, अविश्वास और भू-राजनीतिक खींचतान के कारण बनती चली गई हैं। यही गहरी खाई और पुरानी दुश्मनी मुख्य वजह है कि तमाम कूटनीतिक बातचीत और शांति प्रयासों के बावजूद, जरा सी चिंगारी सुलगते ही मिडिल ईस्ट के हालात बार-बार बेकाबू हो जाते हैं।

ट्रंप का बड़ा ऐलान: ईरान के साथ युद्धविराम खत्म

मिडिल ईस्ट के ताजा घटनाक्रम ने पूरी दुनिया को एक बार फिर बड़ी जंग के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की के अंकारा में नाटो की एक अहम बैठक के दौरान बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए एलान किया है कि ईरान के साथ हुआ युद्धविराम अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। ट्रंप ने दो टूक शब्दों में कहा कि ईरान के साथ किसी भी तरह की डील या बातचीत करना महज समय की बर्बादी है। उन्होंने साफ किया कि भले ही वे अपने मध्यस्थों को बातचीत की औपचारिकता पूरी करने की छूट दे दें, लेकिन अब उन्हें शांति की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती।

अमेरिकी राष्ट्रपति की इस खुली चेतावनी और फिर से हमले शुरू करने के बयान के कुछ ही घंटों के भीतर अमेरिकी सेना एक्शन मोड में आ गई। यूएस सेंट्रल कमांड के नेतृत्व में अमेरिकी लड़ाकू विमानों और मिसाइलों ने ईरान के ठिकानों पर नए सिरे से जोरदार सैन्य हमले शुरू कर दिए हैं। अमेरिकी सेना के मुताबिक, इन हमलों का मुख्य उद्देश्य ईरान की उस सैन्य क्षमता को पूरी तरह नेस्तनाबूद करना है, जिसके दम पर वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बेहद संवेदनशील माने जाने वाले 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को लगातार खतरे में डाल रहा था।

ट्रंप ने कहा युद्घ विराम खत्म

अमेरिकी हमलों से दहल उठा दक्षिणी ईरान:

ट्रंप के एलान के बाद खाड़ी क्षेत्र में जंग बेहद भीषण रूप ले चुकी है। ईरान के सरकारी मीडिया ने पुष्टि की है कि अमेरिकी लड़ाकू विमानों और मिसाइलों ने दक्षिणी ईरान के तटीय इलाकों को निशाना बनाया है, जिससे बंदर अब्बास, सीरिक और बुशहर जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र जोरदार धमाकों से दहल उठे हैं। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के जनसंपर्क विभाग के प्रमुख हुसैन केरमानपुर के अनुसार, 8 और 9 जुलाई को ईरान के पांच अलग-अलग प्रांतों को निशाना बनाकर किए गए इन घातक अमेरिकी हमलों में अब तक 14 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 78 अन्य लोग घायल हुए हैं। घायलों में से 47 की हालत गंभीर है और वे अस्पताल में भर्ती हैं।

दूसरी तरफ, अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड ने इस सैन्य कार्रवाई के हैरान करने वाले आंकड़े जारी किए हैं। सेंट्रल कमांड का दावा है कि उसके बलों ने मंगलवार को एक ही दिन में ईरान के 80 से अधिक ठिकानों पर अचूक निशाना साधा। इस विनाशकारी कार्रवाई में अमेरिका ने ईरान के मजबूत माने जाने वाले एयर डिफेंस सिस्टम, तटीय रडार स्टेशनों के नेटवर्क और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की उन 60 से अधिक छोटी सैन्य नावों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया है, जिनका इस्तेमाल वे 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में जहाजों को डराने या रोकने के लिए करते थे।

अमेरिका का ईरान पर हमला

अमेरिकी और ईरानी सैन्य टकराव के पीछे सिर्फ होर्मुज स्ट्रेट ही एकमात्र वजह नहीं है, बल्कि यह इस गहरी दुश्मनी का महज एक सिरा है। असल लड़ाई वैश्विक और रणनीतिक वर्चस्व की है। अमेरिका का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल सप्लाई चेन बिना किसी रुकावट या ईरानी खतरे के सुचारू रूप से चलती रहे। दूसरी तरफ, ईरान का मानना है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य घेराबंदी और राजनीतिक दबाव के जरिए उसे पूरी तरह पंगु बनाना चाहते हैं। दोनों देशों के बीच का यही पुराना अविश्वास और बुनियादी टकराव आज बार-बार मिसाइलों और बमबारी के रूप में सामने आ रहा है।

होर्मुज स्ट्रेट: वैश्विक अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल व्यापार का सबसे मुख्य गलियारा है। खाड़ी देशों का कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर पूरी दुनिया में सप्लाई होते हैं। यदि इस मार्ग पर जरा भी तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तुरंत आसमान छूने लगती हैं। तेल का यह उछाल सीधे तौर पर चौतरफा महंगाई बढ़ाता है, जिससे भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाती है। यही वजह है कि अमेरिका और ईरान की यह जंग सिर्फ दो देशों का विवाद नहीं है, बल्कि दुनिया भर के आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक यह वैश्विक मंदी और दूरगामी आर्थिक संकट का सबसे बड़ा कारण बन सकती है।

क्यों नाकाम हो रही है अमेरिका-ईरान की बातचीत?

अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत टूटने की सबसे बड़ी वजह दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास है। अमेरिका को डर है कि ईरान बातचीत की आड़ में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है, जबकि ईरान का आरोप है कि अमेरिका प्रतिबंध और दबाव की नीति छोड़ने को तैयार नहीं है। यही कड़वाहट शांति प्रयासों को पटरी से उतार देती है।

तनाव की एक बड़ी वजह ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी है, जिसे रोकने के लिए अमेरिका ने 28 फरवरी से ही सैन्य हमले शुरू कर दिए थे। राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि ईरान ऐसी सख्त शर्तें माने जिससे उसके परमाणु हथियार बनाने की गुंजाइश ही खत्म हो जाए। इसके विपरीत, ईरान लगातार अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों के लिए बताता आया है। दोनों देशों की इसी जिद और मतभेद के कारण बातचीत हर बार नाकाम हो जाती है।

दबाव की रणनीति या कूटनीतिक चाल:

हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों में लगातार विरोधाभास देखा गया है। वे कभी युद्धविराम खत्म करने का एलान करते हैं, तो कभी कहते हैं कि अमेरिका लंबी जंग के पक्ष में नहीं है। साथ ही, वे फिर से बड़े हमलों की चेतावनी देने और किसी भी समझौते की जरूरत को नकारने से भी पीछे नहीं हटते। ट्रंप के इन पल-पल बदलते बयानों ने पूरी दुनिया को असमंजस में डाल दिया है, जिससे वैश्विक बाजारों और व्यापार में अनिश्चितता का माहौल बन गया है।

संयुक्त राष्ट्र की बढ़ी चिंता:

खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य टकराव पर संयुक्त राष्ट्र ने गहरी चिंता जताते हुए दोनों देशों से अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सख्ती से पालन करने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि लगातार बढ़ती यह सैन्य कार्रवाई अब तक हुई तमाम कूटनीतिक प्रगति और शांति प्रयासों को पूरी तरह बर्बाद कर सकती है। इसके साथ ही, यूएन ने युद्ध क्षेत्र में आम नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया है ताकि किसी बड़े मानवीय संकट को रोका जा सके।

सैन्य बल नहीं, कूटनीति ही एकमात्र रास्ता: अंतरर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ

मध्य-पूर्व के इस गंभीर संकट पर अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और संगठन लगातार चेतावनी दे रहे हैं। विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगेलमैन का मानना है कि मध्य-पूर्व में केवल सैन्य कार्रवाई के दम पर कभी भी स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती और इस विवाद को सुलझाने के लिए अंततः दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर ही लौटना होगा। वहीं क्विंसी इंस्टीट्यूट के राजनीतिक विश्लेषक त्रिता पारसी का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ा संकट आपसी भरोसे की कमी है और जब तक इस अविश्वास की खाई को पाटा नहीं जाता, तब तक कोई भी शांति समझौता लंबे समय तक टिक ही नहीं सकता। इन सबके बीच इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप ने बेहद डरावनी चेतावनी दी है कि होर्मुज स्ट्रेट जैसे संवेदनशील इलाके में दोनों ओर से हुई ज़रा सी भी सैन्य चूक या रणनीतिक गलती पूरे वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र को हिलाकर रख सकती है, जिसका भारी खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा।

अमेरिका-ईरान जंग से भारत पर असरः

भारत अपनी ऊर्जा और कच्चे तेल की जरूरतों के लिए बहुत हद तक विदेशी आयात पर निर्भर है। हालांकि, मार्च से मई के बीच जब अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ा था, तब भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने देश के पास पर्याप्त तेल भंडार होने का आश्वासन दिया था, लेकिन इसके बावजूद घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए गए थे।

अब यदि होर्मुज स्ट्रेट में यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होगी। इससे भारत के लिए कच्चे तेल का आयात काफी महंगा हो जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। तेल महंगा होने से माल ढुलाई लागत बढ़ेगी, जिससे चौतरफा महंगाई की मार आम जनता पर पड़ेगी और सरकार का आयात बिल भी बेकाबू हो जाएगा। यही बड़ी वजह है कि भारत शुरू से ही दोनों देशों से युद्ध टालने और बातचीत के जरिए कूटनीतिक समाधान निकालने की अपील करता रहा है।

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