भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा है कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल किसी देश पर राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। भारत ने आरोपों और अधूरे आंकड़ों के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नकारात्मक छवि पेश करने की कोशिशों का भी विरोध किया।
विदेश मंत्रालय में उप सचिव बरखा ताम्रकार ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में ‘जबरन गुमशुदगी पर कार्य समूह’ से संबंधित एजेंडे पर भारत का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्रों के साथ संवाद करता है, लेकिन यह प्रक्रिया बातचीत, परामर्श, सहयोग, निष्पक्षता और पारदर्शिता जैसे सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।
ताम्रकार ने प्रतिनिधिमंडलों से रिपोर्ट का सही संदर्भ में उल्लेख करने की अपील करते हुए कहा कि मानवीय चिंता से जुड़े किसी संवाद को अंतिम फैसला बनाकर पेश नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत उचित दस्तावेजों के साथ दर्ज विशिष्ट मामलों पर स्थापित प्रक्रियाओं के तहत स्पष्टीकरण देने के लिए तैयार है। हालांकि, अपुष्ट आरोपों, अधूरे आंकड़ों या ऐसी रिपोर्ट के आधार पर देश की नकारात्मक छवि बनाने का विरोध करता है, जिसमें भारत के संबंध में कोई विशिष्ट टिप्पणी नहीं है।
भारत का यह बयान नई दिल्ली में युवाओं के नेतृत्व में हुए हालिया विरोध प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों की चिंता के बीच आया है। मंगलवार को जिनेवा में 20 से अधिक संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने शांतिपूर्ण युवा प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित तौर पर बार-बार सख्त कार्रवाई पर चिंता जताई। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में हजारों छात्र और उनके समर्थक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सरकारी फैसलों तथा हाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों ने अधिकारियों से प्रदर्शनों के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की शिकायतों पर न्याय सुनिश्चित करने की अपील की। उनके अनुसार, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मुद्दा लगभग 13 करोड़ लोगों को प्रभावित करता है। इससे पहले पिछले सप्ताह भी भारत ने एक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञ की रिपोर्ट को ‘सुनी-सुनाई बात’ बताते हुए खारिज किया था। रिपोर्ट में युवाओं के एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन और उसके सदस्यों के खिलाफ कथित जवाबी कार्रवाई का उल्लेख किया गया था।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने भी दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान प्रदर्शनकारियों, आंदोलन के नेताओं, नागरिक समाज संगठनों के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों की कथित सामूहिक हिरासत पर चिंता जताई थी। भारत ने इन टिप्पणियों को ‘अनुचित’ बताते हुए देश के आंतरिक मामलों में ‘अस्वीकार्य हस्तक्षेप’ करार दिया था।