पिछले साल अगस्त में दिल्ली के कालकाजी इलाके में भारी बारिश के कारण एक बाइक सवार युवक पर पेड़ गिर जाने से उसकी मौत हो गई थी। वहीं इसी साल मार्च के महीने में आई भीषण आंधी से दिल्ली में एक ही दिन में अलग-अलग जगहों पर 100 से अधिक पेड़ गिर गए थे। जिससे न केवल ट्रैफिक और लाइट की स्थिति खराब हुई बल्कि कई वाहन भी क्षतिग्रस्त हुए थे।
दिल्ली में मानसून ने दस्तक दे दिया है। आंधी-बारिश का अलर्ट जारी है। ऐसे में दिल्ली में मौजूद पेड़ों के गिरने से हादसा होने का डर बना हुआ है। बारिश के समय पेड़ाें के नीचे रुकने या वहां से गुजरते समय जान का खतरा बना रहेगा। इन हादसों के बीच पेड़ों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर लापरवाही की सूचना सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी दिल्ली ट्री सेंसस का काम शुरू नहीं हो सका है। जबकि इसके लिए करीब तीन दशक पहले से कानूनी प्रावधान लागू है।
दिल्ली वन विभाग और देहरादून स्थित फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट अब तक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर को अंतिम रूप नहीं दे पाए हैं। अभी भी यह प्रक्रिया विचारविमर्श के बीच फंसी है। पेड़ों के स्वास्थ्य का आकलन कैसे होगा, खतरनाक पेड़ों की पहचान कैसे की जाएगी और फील्ड सर्वेक्षण किस तरह संचालित होगा इन सभी मुद्दों पर चर्चा जारी है।
केंद्र सरकार ने इस परियोजना के पहले चरण के लिए 2.9 करोड़ रुपए मंजूर किए थे। यह काम 3 चरणों में होना है। इससे दिल्ली के गैर-वन शहरी क्षेत्रों में पेड़ों की गिनती होनी है। इस कवायद के जरिए दिल्ली के पेड़ों का वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार किया जाएगा, जिसमें पेड़ों की प्रजाति के साथ-साथ उनकी आयु, ऊंचाई, तने का घेरा, जियो-लोकेशन और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दर्ज की जाएगी।
वर्तमान में दिल्ली के पास ऐसा कोई डाटा नहीं है जो यह बताए कि शहर में कुल कितने पेड़ हैं, वे कहां स्थित हैं या उनमें से कितने कमजोर, कंक्रीट से घिरे हुए या गिरने की स्थिति में है। अधिकारियों का कहना है कि यह सेंसस दिल्ली के शहरी पेड़ों के लिए एक वैज्ञानिक आधार तैयार करेगा, जिससे पेड़ों के स्वास्थ्य की निगरानी, अवैध कटाई की पहचान, वृक्षारोपण योजनाओं की बेहतर योजना और संरक्षण प्रयासों को मजबूती मिलेगी।