संसद परिसर का विहंगम दृश्य 
देश/विदेश

' चिंता- निर्देश ' तो बहुत पर अमल कब तक !

एक साथ चुनाव संबंधित संयुक्त समिति का कार्यकाल बढ़ा, दिव्यांगजनों पर चिंता, डीयू में आरक्षण रोस्टर की प्रक्रिया में मिलीं विसंगतियां

नयी दिल्ली : देश के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर प्रशासनिक नीतियों को तैयार करने के लिए संसद के विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों को लेकर संसदीय समितियों का गठन किया जाता है, जो इन मुद्दों का अध्ययन कर संसद को अपनी रिपोर्ट सौंपती हैं तथा समुचित दिशा में कार्य करने के लिए आग्रह तथा निर्देश देती हैं, जिनके आधार पर संसद नयी नीतियों के निर्माण की दिशा में अग्रसर होती है। जाहिर है कि समितियां अपना सुझाव समय-समय पर सौंपती हैं लेकिन उन पर क्रियान्वयन कब तक हो पाता है, यह दीगर यक्ष प्रश्न है। इस क्रम में विभिन्न संसदीय समितियों ने अपनी रिपोर्ट सौंपी हैं। आइए, दें उन पर एक नजर..।

भाजपा सांसद पी पी चौधरी

एक साथ चुनाव : समिति का कार्यकाल बढ़ा

लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रावधान संबंधी 2 विधेयकों का अध्ययन कर रही संसदीय समिति का कार्यकाल मंगलवार को शीतकालीन सत्र के अंतिम सप्ताह तक के लिए बढ़ा दिया गया है।

संसद की संयुक्त समिति के अध्यक्ष और भाजपा के सांसद पी पी चौधरी द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यकाल विस्तार के प्रस्ताव को सदन ने ध्वनिमत से पारित कर दिया। प्रस्ताव के अनुसार, समिति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए शीतकालीन सत्र, 2025 के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक का समय दिया गया है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रावधान वाले ‘संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024’ और इसी व्यवस्था के तहत केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव कराने से संबंधित ‘संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024’ पर संयुक्त समिति विचार कर रही है। दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होते हैं। सदन ने गत 25 मार्च को प्रतिवदेन सौंपने के लिए समिति का कार्यकाल मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक के लिए बढ़ा दिया था। इन विधेयकों को पिछले साल 17 दिसंबर को लोकसभा में पेश किया गया था। तब समिति को बजट सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा गया था। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था और इसने अपनी रिपोर्ट में इस अवधारणा का जोरदार समर्थन किया था। इसके बाद, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और सरकार ने लोकसभा में 2 विधेयक पेश किये।

प्रतीकात्मक तस्वीर

कम खर्च : दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग की आलोचना

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता संबंधी स्थायी समिति ने प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में ‘निधि के निरंतर कम उपयोग’ को लेकर दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग (डीईपीडब्ल्यूडी) की आलोचना की और कहा कि तत्काल, लक्षित सुधारों के बिना, चालू वित्त वर्ष के लक्ष्य प्राप्त नहीं होंगे। वर्ष 2024-25 के लिए अनुदान मांगों पर सरकार द्वारा की गयी कार्रवाई पर अपनी नौवीं रिपोर्ट में, समिति ने 2021-22 से 2023-24 तक दिव्यांगजनों को सहायक उपकरणों की खरीद/फिटिंग के लिए सहायता (एडीआईपी), दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए योजना (एसआईपीडीए), दीनदयाल दिव्यांगजन पुनर्वास योजना (डीडीआरएस) और दिव्यांगता छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं में ‘निरंतर कम खर्च की प्रवृत्ति’ का उल्लेख किया। सोमवार को संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया कि प्रक्रियागत बदलावों के बावजूद मंत्रालय गहन संरचनात्मक मुद्दों का समाधान करने में विफल रहा, विशेष रूप से एसआईपीडीए में, जहां ‘वर्ष दर वर्ष व्यय, आवंटन से बहुत पीछे रहा।’ एसआईपीडीए के लिए समिति ने राज्यों और कार्यान्वयन एजेंसियों से प्रस्तावों में देरी, उपयोग प्रमाणपत्रों के लंबित रहने और कुछ क्षेत्रों, विशेष रूप से पूर्वोत्तर से पर्याप्त प्रस्तावों की कमी को चिह्नित किया। इसने एक ‘समयबद्ध, योजनावार सुधारात्मक कार्य योजना’ बनाने की अपील की। समिति ने सुगम्यता लेखा परीक्षकों के पैनल और निजी कंपनियों के साथ साझेदारी के बावजूद सुगम्य भारत अभियान (एआईसी) की धीमी गति पर भी चिंता व्यक्त की। रिपोर्ट में राज्यों के लिए निश्चित समय-सीमा और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन के साथ ‘मिशन-मोड’ दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया गया है। समिति ने भविष्य में अधिक लचीले लक्ष्य निर्धारित करने की भी सिफारिश की। समिति ने भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एलिम्को) के आधुनिकीकरण, प्रधानमंत्री दिव्यांग केंद्रों के विस्तार और शैक्षिक पाठ्यक्रमों में सुगम्यता को शामिल करने के उपायों की सराहना की। साथ ही, इस बात पर जोर दिया कि इन उपायों को कुशल निधि प्रवाह, समय पर परियोजना अनुमोदन और ठोस जमीनी परिणामों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। समिति ने मंत्रालय को लंबित सिफारिशों पर तीन महीने के भीतर कार्रवाई संबंधी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

दिल्ली यूनिवर्सिटी

डीयू में आरक्षण रोस्टर की प्रक्रिया में विसंगतियां अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी संसदीय समिति ने आरक्षण रोस्टर के ‘त्रुटिपूर्ण कार्यान्वयन’ के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की आलोचना की है और आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया ‘विसंगतियों’ से प्रभावित रही है, जिससे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शिक्षकों को उनके वैध पदों से वंचित होना पड़ा है।

संसद में पेश अपनी पांचवीं रिपोर्ट में समिति ने कहा कि 2013 में आरक्षण रोस्टर को ‘विभाग एक इकाई के रूप में’ से ‘विश्वविद्यालय एक इकाई के रूप में’ पुनर्गठित करने के परिणामस्वरूप कई अनारक्षित पद आरक्षित पदों में परिवर्तित हो गए, लेकिन विश्वविद्यालय ने पिछली रिक्तियों को अधिसूचित नहीं किया और कुछ मामलों में, उन्हें अनारक्षित उम्मीदवारों के लिए आरक्षण से हटा दिया। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘समिति इस बात को संज्ञान में लेने के लिए बाध्य है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में रोस्टर पुन: तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से, इसके दोषपूर्ण कार्यान्वयन के कारण इसमें कई विसंगतियां और कमियां रही हैं।’ समिति ने विश्वविद्यालय के इस दावे को खारिज कर दिया कि कोई भी रिक्त पद लंबित नहीं है और उसे इन पदों की पहचान करने और 3 महीने के भीतर एक विशेष भर्ती अभियान चलाने का निर्देश दिया। उसने यह भी सिफारिश की कि अनारक्षित श्रेणी के शिक्षक वर्तमान में जिन आरक्षित पदों पर हैं, के रिक्त होने पर उन्हें अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को पुनः आवंटित किया जाए और अद्यतन रोस्टर ऑनलाइन प्रकाशित किए जाएं। समिति ने प्रत्येक कॉलेज में एससी/ एसटी प्रकोष्ठ स्थापित करने और विदेशी प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए एससी/ एसटी कर्मचारियों के नामांकन बढ़ाने की सिफारिश की।

दिल्ली विकास प्राधिकरण का एक परिसर

डीडीए में एससी/ एसटी के रिक्त पदों पर जताई चिंता

(डीडीए) में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित पदों की रिक्तियों, पदोन्नति के लंबित मामलों और आवास व वाणिज्यिक इकाइयों के कम आवंटन को लेकर संसद की एक स्थायी समिति ने कड़ी आपत्ति जतायी है। संसद में पेश अपनी चौथी रिपोर्ट में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति ने कहा कि डीडीए में समूह ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ में एससी के 1,158 और एसटी के 703 पद रिक्त हैं, जबकि प्राधिकरण ने अपने स्वीकृत पदों की संख्या 12,932 से घटाकर 5,883 करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने तक भर्ती पर रोक लगा रखी है। समिति ने कहा, ‘भर्ती केवल मौजूदा स्वीकृत पदों के आधार पर की जा सकती है, न कि प्रस्तावित पदों की संख्या के आधार पर। संशोधित पद संरचना प्रस्ताव के मंजूर होने तक भर्ती रोकना, नौकरी की तलाश में जुटे एससी और एसटी अभ्यर्थियों के साथ गंभीर अन्याय है।’ समिति के अनुसार, मौजूदा स्वीकृत पदों के तहत डीडीए में समूह ‘ए’ में ही एससी के 183 और एसटी के 211 पद रिक्त हैं। समूह ‘बी’ में एससी के 123 और एसटी के 59, जबकि समूह ‘सी’ में एससी के 144 और एसटी के 106 पदों के लंबित मामलों पर भी समिति ने चिंता जतायी। ‘योग्य उम्मीदवार उपलब्ध नहीं’ होने के डीडीए के तर्क को समिति ने ‘रूढ़िवादी’ और अनुचित बताया और पदोन्नति कोटा पूरा करने के लिए रियायत देने की सिफारिश की। डीडीए ने पिछले पांच वर्षों में जातीय भेदभाव की कोई शिकायत नहीं मिलने की बात कही, लेकिन सांसदों ने आशंका जतायी कि कर्मचारी शिकायत दर्ज कराने में हिचक सकते हैं। समिति ने ऑनलाइन शिकायत पोर्टल, पखवाड़े में निस्तारण की समय-सीमा, मामले की स्थिति सार्वजनिक करने और समन्वय अधिकारियों व रोस्टर रखरखाव के लिए स्पष्ट जवाबदेही तय करने की सिफारिश की। आवास के मामले में समिति ने कहा कि पिछले 25 वर्षों में डीडीए के केवल 19.17 प्रतिशत फ्लैट एससी और 4.74 प्रतिशत फ्लैट एसटी को आवंटित हुए। इन समुदायों के लिए केवल 2 विशेष योजनाएं -अंबेडकर आवास योजना (1989) और 2019 की एससी/एसटी आवास योजना चलाई गईं। समिति के अनुसार, इन योजनाओं में खराब कनेक्टिविटी और वहनीयता के कारण 40 प्रतिशत से अधिक आवंटन रद्द हुए। समिति ने मूल्य में रियायत, बिना ब्याज ईएमआई विकल्प और बिक न पाए फ्लैटों को आरक्षित श्रेणी में बनाए रखने की विशेष मुहिम चलाने की सिफारिश की। रिपोर्ट में समिति ने कहा कि वाणिज्यिक आवंटन में भी अपेक्षित लक्ष्य नहीं दिखा, जहां पिछले एक दशक में एससी समुदाय के केवल 88 लोगों को और एसटी समुदाय के 36 लोगों को इकाइयां/ दुकानें आवंटित हुईं। समिति ने जोरशोर से विज्ञापन, मूल्य कटौती, ईएमआई विकल्प और बिक्री न होने पर आरक्षित इकाइयों को एससी/ एसटी उद्यमियों को किराये पर देने की भी सिफारिश की। समिति ने अनुच्छेद 46 का हवाला देते हुए डीडीए को एससी/ एसटी समुदायों के आर्थिक हितों को बढ़ावा देने और उन्हें शोषण से बचाने का दायित्व याद दिलाया तथा आगाह किया कि लक्षित सुधारों के अभाव में दिल्ली के विकास में उनका योगदान अधूरा रह जाएगा।

एक एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल

एकलव्य स्कूलों और खेल ढांचे पर नाराजगी

संसद की एक स्थायी समिति ने जनजातीय कार्य मंत्रालय पर एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) और जनजातीय छात्रों के लिए खेल अवसंरचना के निर्माण में देरी के लिए नाराजगी जाहिर की है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर संसद की स्थायी समिति ने सोमवार को संसद में पेश अपनी 2024-25 की अनुदान मांगों पर सरकारी कार्रवाई संबंधी 10वीं रिपोर्ट में कहा कि स्वीकृत 717 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में से केवल 476 ही क्रियाशील हैं और ज्यादातर नये स्कूल अब भी किराये की इमारतों से संचालित हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 87 नये स्कूल भवन पूरे हो चुके हैं, 222 पर काम जारी है, जबकि 120 परियोजनाएं पूर्व-निर्माण चरण में हैं। समिति ने राष्ट्रीय जनजातीय छात्र शिक्षा समाज (एनईएसटीएस) से सभी पुराने और नये स्कूलों को निर्धारित समयसीमा के भीतर अपने भवनों से संचालित करने के लिए ‘अधिक ठोस, परिणामोन्मुख और सक्रिय’ दृष्टिकोण अपनाने को कहा। एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में खेलों के उत्कृष्टता केंद्रों के निर्माण की धीमी प्रगति पर भी समिति ने चिंता जताई। प्रस्तावित 15 केंद्रों में से पहले चरण के लिए केवल पांच स्थान तय किए गए हैं, जिन्हें जून 2026 तक चालू करने का लक्ष्य है। शेष 10 दिसंबर 2026 तक पूरे करने का लक्ष्य है, लेकिन इनके स्थान अभी तय नहीं हुए हैं। समिति ने ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ (डीए-जेजीयूआ) के तहत हुई प्रगति का स्वागत किया, लेकिन आयुष और कौशल विकास मंत्रालयों में लंबित अनुमोदनों से क्रियान्वयन में देरी की आशंका जताई। ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ बहु-मंत्रालयी मिशन है जिसका लक्ष्य 63,000 से अधिक गांवों में बुनियादी ढांचे और सेवाओं की खाई को पाटना है। समिति ने तीव्र समन्वय पर जोर दिया है ताकि सड़कों से लेकर आवास, स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी सुविधा तक सभी लक्ष्यों को मिशन की 2024 से 2028 तक की अवधि में पूरा किया जा सके। रिपोर्ट में एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के लिए भूमि की आवश्यकता कम करने, परियोजना निधि के लिए एस्क्रो खाता खोलने और खेल सुविधा योजना में भारतीय खेल प्राधिकरण को शामिल करने जैसे कदमों की सराहना की गयी। समिति ने आगाह भी किया है कि सख्त निगरानी और मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय के बिना जनजातीय कल्याण के ये प्रमुख कार्यक्रम अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएंगे।

SCROLL FOR NEXT