तिरुवनंतपुरम : केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने शुक्रवार को नीट प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रदर्शन को देश की अगली पीढ़ी की वास्तविक तस्वीर नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि छात्रों को अपनी मांगों के लिए आवाज उठाने और प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है, लेकिन विरोध के दौरान अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
राज्यपाल आर्लेकर ने युवाओं के बीच चरित्र निर्माण, सांस्कृतिक मूल्यों और संस्कारों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना या तकनीकी दक्षता विकसित करना नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक, देश के भविष्य का निर्माण करने वाली पीढ़ी के व्यक्तित्व में नैतिकता और जिम्मेदारी की भावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
राज्यपाल यहां मार बेसिलियोस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के रजत जयंती समारोह के तहत आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने युवाओं की भूमिका, शिक्षा के व्यापक उद्देश्य और सामाजिक व्यवहार से जुड़े पहलुओं पर विचार रखा।
उन्होंने कहा कि देश में युवाओं के लिए खेत, खेल के मैदान, तकनीक और तकनीकी शिक्षा जैसे अनेक अवसर उपलब्ध हैं। ऐसे माहौल में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या युवाओं के चरित्र निर्माण पर भी उतना ही ध्यान दिया जा रहा है, जितना उनकी शिक्षा और कौशल विकास पर दिया जाता है।
राज्यपाल आर्लेकर ने छात्रों के प्रदर्शन के अधिकार को नकारा नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में अपनी मांगों और समस्याओं को लेकर आवाज उठाना युवाओं का अधिकार है।
उनके अनुसार, किसी नीति, व्यवस्था या परीक्षा प्रणाली को लेकर असहमति होने पर छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपना पक्ष रख सकते हैं और अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन भी कर सकते हैं। उनका सवाल प्रदर्शन के अधिकार को लेकर नहीं, बल्कि उसके दौरान इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और व्यवहार को लेकर था।
राज्यपाल ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा कि आंदोलन के दौरान देश के नेताओं के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किए जाने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने पूछा कि क्या अपनी मांगों को सामने रखने के लिए देश के नेताओं के खिलाफ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना वास्तव में जरूरी था ?
आर्लेकर का तर्क था कि किसी मुद्दे पर असहमति जताते समय भी प्रदर्शनकारी अपने सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक संस्कारों को प्रतिबिंबित कर सकते हैं। उनके मुताबिक, आंदोलन का उद्देश्य मांग को प्रभावी ढंग से सामने रखना होना चाहिए, न कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना जिससे सार्वजनिक संवाद की मर्यादा प्रभावित हो।
राज्यपाल ने कहा कि जंतर-मंतर पर दिखाई दिया प्रदर्शन देश की अगली पीढ़ी की संपूर्ण तस्वीर नहीं है। उनके मुताबिक, भारत के युवाओं की क्षमता और व्यक्तित्व को किसी एक विरोध प्रदर्शन के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए।
उन्होंने युवाओं के सामने मौजूद व्यापक अवसरों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश की नई पीढ़ी कृषि, खेल, तकनीक और तकनीकी शिक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी क्षमता साबित कर सकती है। इस संदर्भ में उनका जोर इस बात पर था कि युवा केवल अपनी शैक्षणिक और पेशेवर उपलब्धियों से ही नहीं, बल्कि अपने आचरण, जिम्मेदारी और मूल्यों से भी समाज और देश की दिशा तय करेंगे।
आर्लेकर ने शिक्षा के उद्देश्य को व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत बताई। तकनीकी संस्थानों और इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ने वाले युवाओं के संदर्भ में उन्होंने संकेत दिया कि आधुनिक ज्ञान और तकनीकी दक्षता जरूरी है, लेकिन इसके साथ मानवीय और नैतिक पक्ष को मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उनके मुताबिक, तकनीक युवाओं को सक्षम बना सकती है, लेकिन उस क्षमता का इस्तेमाल किस उद्देश्य से और किस तरीके से किया जाएगा, यह उनके चरित्र और मूल्यों पर निर्भर करता है।
राज्यपाल ने देश में उपलब्ध विभिन्न क्षेत्रों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि युवाओं के सामने अवसरों की कमी नहीं है। कृषि, खेल, तकनीकी शिक्षा और आधुनिक प्रौद्योगिकी ऐसे क्षेत्र हैं जहां युवा अपनी प्रतिभा और ऊर्जा का उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने इस व्यापक अवसर-संसार को चरित्र निर्माण से जोड़ते हुए सवाल उठाया कि क्या शिक्षा व्यवस्था और समाज युवा पीढ़ी को केवल सफलता हासिल करने के लिए तैयार कर रहे हैं या उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए भी तैयार किया जा रहा है।
आर्लेकर की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब नीट से जुड़े प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर राजनीतिक तथा सार्वजनिक बहस तेज थी। इसी मुद्दे को लेकर कॉकराच जनता पार्टी (कॉजपा) ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए 20 जून से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था।
पार्टी ने परीक्षा व्यवस्था में अनियमितताओं और नीट प्रश्नपत्र लीक को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध जताया था। खबर के अनुसार, प्रदर्शन 36 दिनों तक चला और बाद में धर्मेंद्र प्रधान के पद से इस्तीफा देने के बाद इसे समाप्त कर दिया गया।
नीट जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा में कथित अनियमितताओं का मुद्दा सीधे लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा है। परीक्षा परिणाम और प्रवेश प्रक्रिया को लेकर किसी भी तरह की अनिश्चितता छात्रों में असंतोष पैदा कर सकती है। इसी पृष्ठभूमि में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को छात्रों की मांगों और परीक्षा प्रणाली को लेकर उनकी चिंताओं के सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में देखा गया। हालांकि, आर्लेकर ने इस असंतोष के अधिकार से इनकार किए बिना विरोध के दौरान भाषा और आचरण को बहस का विषय बनाया।
राज्यपाल के संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल के साथ सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। किसी व्यवस्था पर सवाल उठाना या सरकार के निर्णय का विरोध करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन विरोध की अभिव्यक्ति किस भाषा में होती है, यह भी सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।
उन्होंने युवाओं को केवल अधिकारों के प्रति जागरूक होने के बजाय अपने कर्तव्यों, व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति भी सजग रहने का संदेश दिया।
आर्लेकर ने युवाओं के चरित्र निर्माण को देश की सांस्कृतिक विरासत और मूल्यों से जोड़ते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा और तकनीकी प्रगति के साथ संस्कारों को भी महत्व दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, भारत की युवा पीढ़ी को आधुनिक तकनीक और वैश्विक अवसरों के लिए तैयार करते समय उसकी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
राज्यपाल की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि किसी विरोध प्रदर्शन को देखकर पूरे देश के युवाओं का आकलन नहीं किया जा सकता। भारत की युवा आबादी विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग तरह की प्रतिभा और क्षमता का प्रदर्शन कर रही है।
किसान बनने से लेकर खिलाड़ी, इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञ और उद्यमी बनने तक युवाओं के सामने अनेक विकल्प हैं। इसलिए किसी एक स्थान पर दिखाई देने वाली राजनीतिक या सामाजिक गतिविधि को पूरी युवा पीढ़ी का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।
आर्लेकर ने अंततः सवाल उठाया कि क्या देश युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण के लिए पर्याप्त प्रयास कर रहा है। यह सवाल शिक्षा व्यवस्था से आगे परिवार, संस्थानों और समाज की भूमिका से भी जुड़ता है।उनके संदेश का व्यापक अर्थ यह है कि ज्ञान, तकनीक और कौशल के साथ जिम्मेदारी, अनुशासन, संस्कार और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा भी युवा विकास का हिस्सा होना चाहिए।
नीट विवाद और छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि में राज्यपाल का यह बयान इसी बड़े सवाल को सामने रखता है कि देश जिस पीढ़ी को भविष्य की जिम्मेदारी सौंपने जा रहा है, उसे केवल प्रतिस्पर्धी और कुशल बनाने के साथ-साथ कितना संवेदनशील, जिम्मेदार और मूल्यनिष्ठ बनाया जा रहा है।