टीबी मुक्त भारत बनाने का रखा गया लक्ष्य 
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टीबी मुक्त भारत अभियान में युवाओं और एनसीसी कैडेटों की बड़ी भागीदारी, रक्षा व खेल मंत्रालय मिलकर बनाएंगे रणनीति

टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य को साधने के लिए युवाओं और एनसीसी कैडेटों को जोड़ा जाएगा, रक्षा और खेल मंत्रालय संयुक्त रूप से जागरूकता व रोकथाम की नई रणनीति तैयार करेंगे

भारत से तपेदिक (टीबी) को पूरी तरह खत्म करने के संकल्प को अब एक बड़ा जन आंदोलन बनाने की तैयारी है। इस मुहिम में देश की युवा शक्ति, मेडिकल छात्र, एनसीसी कैडेट और रक्षा कर्मियों को भी अग्रिम पंक्ति में शामिल किया जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने 7 जुलाई को एक उच्च स्तरीय बैठक की, जिसमें यह रणनीतिक फैसला लिया गया। इस अभियान को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए अब स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ-साथ युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय भी कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे।

युवा शक्ति से बनेगा 'जन आंदोलन'

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने स्पष्ट किया कि टीबी जैसी बीमारी को जड़ से उखाड़ने के लिए अकेले स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रयास नाकाफी हैं। इसके लिए सभी मंत्रालयों, सरकारी व शैक्षणिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।

पीएम मोदी की पहल: दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में आयोजित 'प्रगति' (PRAGATI) बैठक के दौरान देश के युवाओं की ऊर्जा और क्षमता का उपयोग कर इस अभियान को एक जन आंदोलन में बदलने का आह्वान किया था। इसी विजन को आगे बढ़ाते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने पूरे सरकारी तंत्र को एकजुट कर 'टीबी मुक्त भारत अभियान' को नई रफ्तार देने का फैसला किया है।

टीबी उन्मूलन में 'माय भारत' और युवाओं की बड़ी भूमिका

स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस मुहिम में युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय को एक बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा है कि 'माय भारत' (MY Bharat) स्वयंसेवकों और एनसीसी (NCC) कैडेट्स की जमीनी स्तर पर भागीदारी को तेजी से बढ़ाया जाए। इसके तहत पहले से काम कर रहे 'टीबी मुक्त भारत टोली' मॉडल का दायरा गांव-गांव और शहरों तक फैलाया जाएगा, ताकि युवाओं के जरिए आम लोगों को टीबी जांच शिविरों में आने के लिए प्रेरित किया जा सके।

इसके साथ ही, समाज में 'लीड निक्षय मित्र' (टीबी मरीजों की मदद करने वाले मार्गदर्शक) तैयार करने वाले ट्रेनिंग प्रोग्राम को और ज्यादा मजबूत किया जाएगा। इस पूरी रणनीति का मकसद स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों में युवा शक्ति के माध्यम से टीबी को लेकर जागरूकता फैलाना है, जिससे इस बीमारी से जुड़े सामाजिक संकोच को खत्म किया जा सके।

राष्ट्रीय पर्वों और सैन्य शिविरों में गूंजेगा टीबी जागरूकता का संदेश

इस राष्ट्रीय मुहिम में देश के रक्षा मंत्रालय को भी एक बेहद अहम और अनूठी जिम्मेदारी दी गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से आग्रह किया है कि एनसीसी (NCC) कैडेट और रक्षा कर्मियों को सीधे तौर पर टीबी जागरूकता रैलियों से जोड़ा जाए, ताकि वे जांच शिविरों में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने और मरीजों के परिवारों तक सही जानकारी पहुंचाने में मदद कर सकें।

इसके साथ ही, इस अभियान को बड़े पैमाने पर जन-जन तक ले जाने के लिए एक खास खाका तैयार किया गया है

राष्ट्रीय आयोजनों में जागरूकता: अब गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के भव्य समारोहों के दौरान भी टीबी मुक्त भारत का संदेश दिया जाएगा।

शिविरों का उपयोग: एनसीसी के सभी वार्षिक प्रशिक्षण शिविरों, एडवेंचर कैंपों और ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले सैन्य कार्यक्रमों में टीबी जागरूकता गतिविधियों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा।

पोषण सहायता में सहयोग: जागरूकता के साथ-साथ टीबी मरीजों के लिए चल रहे पोषण सहायता अभियान (निक्षय मित्र योजना) को और मजबूत करने के लिए भी रक्षा मंत्रालय के सहयोग की रूपरेखा तैयार की गई है।

टीबी-फ्री वर्कप्लेस' मॉडल: कामकाजी सेक्टर्स और श्रमिकों पर विशेष फोकस

देश को टीबी मुक्त बनाने के लिए अब कार्यस्थलों को लेकर एक बेहद कारगर और विशेष योजना तैयार की गई है। उच्च स्तरीय बैठक में यह सहमति बनी है कि कामकाजी जगहों पर संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए 'टीबी-फ्री वर्कप्लेस' मॉडल लागू किया जाएगा। इसके तहत उन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाएगा जहां संक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है, जैसे—खनन, कंस्ट्रक्शन, कपड़ा उद्योग, ट्रांसपोर्ट और प्रवासी मजदूर।

नियमित जांच और इलाज: ईएसआईसी और डीजीएफएएसएलआई जैसी प्रमुख संस्थाओं के नेटवर्क का इस्तेमाल कर फैक्ट्रियों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले कर्मचारियों की नियमित टीबी जांच की जाएगी और बीमारी का पता चलने पर तुरंत मुफ्त इलाज शुरू होगा।

कर्मचारियों को बैकअप सपोर्ट: जो श्रमिक या कर्मचारी इस बीमारी की चपेट में आकर अपना इलाज करा रहे होंगे, उन्हें नौकरी और कार्यस्थल के स्तर पर हर जरूरी वित्तीय व मानसिक सहयोग उपलब्ध कराया जाएगा ताकि उनकी आजीविका प्रभावित न हो।

8 लाख मेडिकल छात्र और शिक्षा मंत्रालय संभालेंगे मोर्चा: टीबी उन्मूलन को मिलेगी नई रफ्तार

केंद्रीय मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने देश के करीब 6 लाख एमबीबीएस (MBBS) और 2 लाख पोस्टग्रेजुएट मेडिकल छात्रों को मेडिकल कॉलेजों के जरिए सीधे 'टीबी मुक्त भारत अभियान' से जोड़ने का खाका तैयार किया है। इसके तहत जिला स्तर पर बेहतर प्लानिंग और मॉनिटरिंग के लिए 'प्रतिभा सेतु कार्यक्रम' के अधिकारियों को जिला टीबी समन्वय समितियों से संबद्ध किया जाएगा। साथ ही, मेडिकल कॉलेजों और अन्य बड़े शिक्षण संस्थानों की भागीदारी बढ़ाने के लिए शिक्षा मंत्रालय को भी इस महाअभियान का हिस्सा बनाया जा रहा है।

युवाओं और एनसीसी के विशाल नेटवर्क का इस्तेमाल कर गांवों और शहरों में टीबी जांच शिविरों का दायरा बढ़ाया जाएगा। कार्यस्थलों पर नियमित स्क्रीनिंग होगी और सामाजिक सहयोग से मरीजों को मुफ्त इलाज व पोषण सहायता दी जाएगी।

लक्ष्य और वर्तमान स्थिति

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा 9 सितंबर 2022 को 'प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान' की शुरुआत की गई थी, जिसका शुरुआती लक्ष्य देश को 2025 तक टीबी मुक्त बनाना था। इसके बाद रफ्तार बढ़ाने के लिए 7 दिसंबर 2024 को एक विशेष 100 दिवसीय राष्ट्रीय अभियान भी चलाया गया। हालांकि, तमाम बड़ी सफलताओं के बावजूद यह अभियान अपने तय समय में लक्ष्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया है, जिसके चलते अब पूरे सरकारी तंत्र को एकजुट कर इसे दोबारा नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।

व्यापक जांच और पोषण सहयोग से टीबी के खिलाफ जंग में बड़ी कामयाबी

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश को टीबी मुक्त बनाने की दिशा में चलाए जा रहे इस महाअभियान के अब तक बेहद सकारात्मक और सुखद परिणाम सामने आए हैं। इस मुहिम के तहत देश भर में 28 करोड़ से अधिक संवेदनशील और जोखिम वाले लोगों की टीबी जांच की जा चुकी है, जिसके जरिए 39 लाख से अधिक मरीजों की पहचान कर उनका समय पर इलाज शुरू किया गया। इस पूरी कवायद की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण कामयाबी यह रही कि इसमें करीब 12.93 लाख ऐसे मरीजों को भी ढूंढ निकाला गया जिनमें बीमारी के कोई बाहरी या स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे। इन मरीजों को एक्टिव स्क्रीनिंग और चेस्ट एक्स-रे जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से समय रहते चिन्हित किया गया, जिससे संक्रमण को आगे फैलने से रोका जा सका।

इलाज के साथ-साथ मरीजों को शारीरिक और सामाजिक संबल देने के मोर्चे पर भी देश ने एक मिसाल पेश की है। मरीजों को गोद लेने और उनकी देखभाल करने के लिए अब तक 5.7 लाख से अधिक जागरूक नागरिक 'निक्षय मित्र' के रूप में इस अभियान का हिस्सा बन चुके हैं, जिन्होंने मरीजों की रिकवरी को तेज करने के लिए अब तक कुल 38.9 लाख विशेष पोषण किट का वितरण किया है। इसके अलावा, देश के 20 लाख से ज्यादा मरीजों को उनकी शारीरिक आवश्यकताओं और बीमारी की गंभीरता के आधार पर व्यक्तिगत सहायता और सटीक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई गई हैं, ताकि वे इस बीमारी को हराकर मुख्यधारा में वापस लौट सकें

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