नई दिल्लीः आगामी 20 जुलाई से शुरू होकर 14 अगस्त तक चलने वाले संसद के मॉनसून सत्र को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। इस बार संसद पटल पर एनडीए का खेमा बेहद आक्रामक और उत्साहित नजर आ रहा है। दरअसल, विपक्ष के दो बड़े धड़ों तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) में हुई बड़ी टूट के बाद सत्तापक्ष के सांसदों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। इस फेरबदल के बाद भाजपा के नेतृत्व वाला यह गठबंधन अब लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंचता दिख रहा है।
हालांकि, इस नए सियासी गणित में एनडीए के लिए दो-तिहाई बहुमत तक पहुंचने की अंतिम चाबी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के पास है, जिसके समर्थन के बिना यह आंकड़ा छूना नामुमकिन है। तमिलनाडु की राजनीति में भी हाल ही में बड़ा उलटफेर हुआ है; वहां डीएमके और कांग्रेस का पुराना गठबंधन विधानसभा चुनाव तक तो कायम रहा, लेकिन नतीजों के बाद कांग्रेस ने पाला बदल लिया। कांग्रेस अब डीएमके से अलग होकर सुपरस्टार विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम के साथ हाथ मिला चुकी है और वहां सरकार का हिस्सा है। इस बदले हुए समीकरण ने केंद्र से लेकर राज्य तक की राजनीति को बेहद दिलचस्प बना दिया है।
तमिलनाडु में कांग्रेस के अलग होने से नाराज डीएमके ने अब दिल्ली में भी आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। डीएमके ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सभापतियों को पत्र लिखकर कांग्रेस से अलग बैठने की जगह मांगी है। आगामी मॉनसून सत्र में डीएमके के 22 लोकसभा और 8 राज्यसभा सांसद विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन के बजाय अलग बेंचों पर नजर आएंगे।
डीएमके की इस नाराजगी ने बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं। एनडीए की रणनीति इस सत्र में बेहद आक्रामक है। तृणमूल कांग्रेस के बागी धड़े के 20 सांसदों और उद्धव गुट से टूटे 6 सांसदों को मिलाकर एनडीए का आंकड़ा 318 तक पहुंच रहा है। अगर इसमें डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन भी मिल जाता है, तो सत्तापक्ष की ताकत 340 तक पहुंच जाएगी। हालांकि, लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 363 का आंकड़ा चाहिए और एनडीए इससे 23 कदम दूर रहेगा, लेकिन टीडीपी, वाईएसआरसीपी या बीजेडी जैसे दलों के सहयोग से इस आंकड़े को छूना नामुमकिन नहीं होगा।
क्या है असली गेम प्लान
यदि एनडीए इस दो-तिहाई बहुमत के करीब या पार पहुंच जाता है, तो सरकार 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' और 'देशव्यापी परिसीमन विधेयक' जैसे बड़े और कड़े नीतिगत कानूनों को आसानी से पास करा सकती है। इस पूरे गणित में डीएमके के 22 सांसद बेहद निर्णायक भूमिका में आ गए हैं। खतरे की इस घंटी को भांपते हुए कांग्रेस बैकफुट पर है और डैमेज कंट्रोल के लिए एक बार फिर डीएमके को अपने पाले में लाने की हरसंभव कोशिश कर रही है।
डीएमके की नाराजगी से विपक्षी खेमे में मची खलबली के बीच कांग्रेस ने डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तेज कर दी हैं। कांग्रेस ने डीएमके के साथ दोबारा रिश्ते सुधारने के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं, ताकि मॉनसून सत्र के आगाज से पहले ही उसे वापस इंडिया गठबंधन के पाले में लाया जा सके।
इसी सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष के बेहद करीबी और कर्नाटक से राज्यसभा सांसद नासिर हुसैन ने पार्टी का रुख साफ करते हुए कहा कि कांग्रेस उन सभी राजनीतिक दलों के साथ मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह तैयार है, जो भाजपा और आरएसएस के खिलाफ इस वैचारिक लड़ाई में उनके साथ हैं। उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि देश के संविधान को बचाने, राज्यों के संघीय ढांचे की रक्षा करने और भारत की विविधताओं को संजोने के संकल्प में जो भी दल कांग्रेस का हाथ थामना चाहेगा, पार्टी उसे खुले दिल से साथ रखेगी।
कांग्रेस का यह खुला प्रस्ताव सीधे तौर पर डीएमके की तरफ ही इशारा है, लेकिन तकनीकी पेंच यह है कि डीएमके औपचारिक रूप से इंडिया गठबंधन छोड़ चुकी है। इस गतिरोध को तोड़ने के लिए कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि वे पश्चिम बंगाल में वामदलों और तृणमूल कांग्रेस की तरह राज्यों में भले ही एक-दूसरे के खिलाफ लड़ें, लेकिन दिल्ली में विपक्षी एकजुटता का हिस्सा बने रह सकते हैं। कांग्रेस की नई रणनीति यह है कि डीएमके भले ही इंडिया गठबंधन में वापस न आए, लेकिन वह संसद सत्र के दौरान विपक्ष की रोजाना होने वाली रणनीतिक बैठकों में शामिल हो।
कांग्रेस को उम्मीद है कि इस लचीले रुख से वह डीएमके को एनडीए के पाले में जाने से रोक पाएगी। अगर डीएमके विपक्ष के साथ खड़ी रहती है, तो सरकार के लिए 'परिसीमन बिल' और 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' जैसे बड़े विधेयकों को पास कराना बेहद मुश्किल हो जाएगा। फिलहाल कांग्रेस ने पासा फेंक दिया है, और अंतिम फैसला पूरी तरह डीएमके के पाले में है।