प्राइवेट अस्पताल मरीजों से वसूल रहे कैंसर की दवाओं के लिए 10 गुना ज्यादा दाम! 
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दवाओं का 10 गुना अधिक दाम वसूला जाना खुली लूट : सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कहा : प्राइवेट अस्पताल इंडस्ट्री की तरह काम कर रहे, 2700 रु. वाली कैंसर दवा के 27 हजार रु. वसूल रहे!

Lokendra Bahuguna

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों, खास तौर से प्राइवेट अस्पतालों, द्वारा मरीजों से कैंसर की दवाओं के मूल्य से 10 गुना अधिक दाम वसूले जाने को मंगलवार को ‘लूट’ करार दिया। कोर्ट ने साथ ही केंद्र से सवाल किया कि दवाओं के लिए अलग-अलग नियम क्यों हैं। दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) रिटेल कीमत से 16 फीसदी से ज्यादा क्यों होना चाहिए। निजी अस्पताल तो उद्योग हैं, सेवा नहीं।

नुकसान आम आदमी का

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता के पीठ ने औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO), 2013 के तहत दवाओं की कीमतों के नियमन, डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक दवा लिखे जाने और मेडिकल उपकरण पर नियंत्रण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उक्त टिप्पणी की। पीठ ने केंद्र से अस्पतालों द्वारा अपने ही दवाखाने से दवाइयां खरीदने को अनिवार्य बनाने के मुद्दे पर गौर करने का निर्देश देते हुए कहा कि इस व्यवस्था से आम आदमी को नुकसान हो रहा है। पीठ ने कहा कि कैंसर की दवा का MRP 27,000 रुपये है जबकि खुदरा विक्रेताओं को इसकी आपूर्ति 2,700 रुपये में की जाती है। याचियों का कहना है कि इससे मरीजों के इलाज का खर्च बढ़ सकता है। कई मरीज इलाज के लिए अपनी संपत्ति या गहने तक बेचने को मजबूर होते हैं। वे शव भी नहीं ले जाने देते।

निजी अस्पताल किसी को नहीं बख्शते!

पीठ ने केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि निजी अस्पताल किसी को नहीं बख्शते। पीठ ने कहा कि अगर कोई मरीज सरकारी योजना के तहत इलाज करवा रहा है, तो उसका खर्च करदाता उठाता है। तो फिर नियम एक जैसे क्यों नहीं हैं? पीठ ने कहा कि DPCO के अनुसार 16 फीसदी ‘मार्जिन’ है। हर दवा आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में आती है। हमें समझ नहीं आता कि उनसे इस तरह कीमतें तय करने के लिए क्यों कहा जाता है।

सरकार ने मांगी दो हफ्ते की मोहलत

पीठ ने यह भी कहा कि अगर कोई फार्मासिस्ट, जो बहुत दयालु हो, कहे कि वह जरूरतमंद को 2,700 रुपये में दवा देगा, तो मरीज सोचने लगेगा कि दवा असली है या नकली। आखिरकार, नुकसान ईमानदार करदाता का ही होता है। हम इस मामले की अच्छी तरह से पड़ताल करेंगे। यह समाज के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करता है। पहले तो कीमत का मामला है और उसके बाद चिकित्सकों के नैतिक तौर-तरीकों का। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि फायदा फार्मा कंपनियों को नहीं हो रहा है, बल्कि ऐसा लगता है कि लाभ निजी अस्पतालों को हो रहा है। उन्होंने कहा कि मुझे अधिकारियों के साथ बैठक करने दें। मुझे दो हफ्ते का समय दें।

अगली सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर को

पीठ ने कहा कि बिना किसी संयोजन वाली सामान्य ‘स्टेटिन’ की कीमत 40 रुपये है। एस्पिरिन के साथ संयोजन होने पर इसकी कीमत 70 रुपये हो जाती है। ऐसा कैसे हो रहा है? आम आदमी को यह सब क्यों भुगतना पड़े? पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर की तारीख तय की और कहा कि वह इस मुद्दे पर केंद्र का जवाब सुनेगा।

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