कोहिमा : नागालैंड की समृद्ध जैव-विविधता के संरक्षण के लिए समुदायों, आम नागरिकों, शैक्षणिक संस्थानों और चर्चों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। राज्य के वन विभाग के पास कुल वन क्षेत्र का पांच प्रतिशत से भी कम हिस्सा होने के कारण अकेले विभाग के प्रयासों से जैव-विविधता का संरक्षण संभव नहीं है। यह बात पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रधान सचिव और नागालैंड राज्य जैव-विविधता बोर्ड के अध्यक्ष वाई. किखेतो सेमा ने बुधवार को कही। सेमा यहां नागालैंड राज्य जैव-विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना (NSBSAP) में संशोधन के लिए आयोजित हितधारक परामर्श बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि नागालैंड की विशिष्ट भूमि स्वामित्व व्यवस्था को देखते हुए जैव-विविधता संरक्षण में समाज के हर वर्ग की भागीदारी जरूरी है।
परिवार और स्कूलों से शुरू हो जागरूकता
सेमा ने जैव-विविधता संरक्षण को केवल सरकारी विभाग की जिम्मेदारी मानने के बजाय इसे नागरिकों की भी साझा जिम्मेदारी बताया। उन्होंने विशेष रूप से कचरा प्रबंधन को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने परिवारों से जैव-विविधता और कचरा प्रबंधन जैसे विषयों पर चर्चा करने का आह्वान किया। साथ ही, पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने की जरूरत बताई। प्रधान सचिव ने चर्चों से भी जैव-विविधता संरक्षण को संडे स्कूल की पढ़ाई, धार्मिक प्रवचनों और चर्च सम्मेलनों का हिस्सा बनाने की अपील की। उन्होंने नागालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (NBCC) की उस पूर्व प्रतिबद्धता का भी उल्लेख किया, जिसमें राज्य की जैव-विविधता के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लिया गया था। उन्होंने काउंसिल से इस प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाने का आग्रह किया। बड़े चर्च सम्मेलनों, अभियानों और अन्य आयोजनों के दौरान पैदा होने वाले कचरे के प्रबंधन पर भी उन्होंने विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई।
झूम खेती को बंद करना आसान नहीं
सेमा ने नागालैंड की पारंपरिक झूम यानी स्थानांतरित खेती का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि झूम खेती नागा संस्कृति और त्योहारों से गहराई से जुड़ी हुई है, इसलिए इसे अचानक बंद नहीं किया जा सकता।
हालांकि, उन्होंने कहा कि मौजूदा स्वरूप में यह कृषि व्यवस्था आर्थिक रूप से पहले जैसी व्यवहार्य नहीं रह गई है और इसके पारिस्थितिक प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। कम होती फालो अवधि और मिट्टी की उर्वरता पर असर को लेकर भी चिंता जताई गई है। उन्होंने कहा कि राज्य की करीब 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और कृषि तथा इससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। बड़े और मध्यम स्तर के उद्योगों की सीमित संभावनाओं को देखते हुए कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। सेमा ने पारंपरिक कृषि प्रणालियों पर अधिक शोध और उन्हें कृषि शिक्षा में पर्याप्त स्थान देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
73 प्रतिशत वन क्षेत्र का दावा
सेमा के अनुसार, नागालैंड में करीब 73 प्रतिशत वन आवरण है, जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 21-22 प्रतिशत है। राज्य के 2026 के आधिकारिक सांख्यिकीय सर्वेक्षण में भी 2023 के लिए नागालैंड का कुल वन आवरण 12,222.47 वर्ग किलोमीटर, यानी राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 73.72 प्रतिशत, दर्ज किया गया है। हालांकि, वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया करीब 8,629 वर्ग किलोमीटर है और इसका 88.30 प्रतिशत हिस्सा निजी या सामुदायिक स्वामित्व में है, जबकि राज्य सरकार के स्वामित्व में 11.70 प्रतिशत है। यही विशिष्ट भूमि स्वामित्व व्यवस्था जैव-विविधता संरक्षण में समुदायों की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाती है।
जैव-विविधता से पर्यटन को बढ़ावा देने पर जोर
सेमा ने कहा कि नागालैंड को अपनी जैव-विविधता और पारिस्थितिक संसाधनों को आर्थिक अवसरों में बदलने की संभावनाओं पर भी विचार करना चाहिए। उन्होंने राज्य की पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संसाधनों को अनुभव करने के लिए पर्यटकों को आकर्षित करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि राज्य की जैव-विविधता न केवल पर्यावरणीय संपदा है, बल्कि समुदायों की आजीविका और भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण संसाधन है।
वैश्विक जैव-विविधता लक्ष्य के अनुरूप संशोधन
नागालैंड अपनी राज्य जैव-विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना को भारत की अद्यतन राष्ट्रीय जैव-विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना और कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KMGBF) के अनुरूप संशोधित कर रहा है। नागालैंड राज्य जैव-विविधता बोर्ड ने द नेचर कंजर्वेंसी सेंटर (TNCC) और फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी (FES) के सहयोग से यह हितधारक परामर्श आयोजित किया। इसमें जैव-विविधता से जुड़ी चुनौतियों, राज्य की प्राथमिकताओं, शासन व्यवस्था, क्षमता निर्माण और सामुदायिक भागीदारी पर सुझाव लिए जा रहे हैं। नागालैंड ने अपनी पहली राज्य जैव-विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना वर्ष 2005 में तैयार की थी। इसके बाद इसे संशोधित कर मई 2022 में औपचारिक रूप से लागू किया गया था। अब नवीनतम संशोधन के जरिए राज्य अपनी जैव-विविधता संरक्षण व्यवस्था को राष्ट्रीय और वैश्विक लक्ष्यों के साथ जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। परामर्श बैठक में TNCC इंडिया के कार्यकारी निदेशक ईश्वर नारायणन और FES के महाप्रबंधक संजय शर्मा ने भी विचार रखे।