देश/विदेश

ग्रेट निकोबार एयरपोर्ट भूमि अधिग्रहण पर सांसद ने गृह मंत्री को लिखा पत्र

सामाजिक प्रभाव आकलन और पुनर्वास रिपोर्ट में विसंगतियों पर उठाए सवाल

सन्मार्ग संवाददाता

श्री विजयपुरम : अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के सांसद बिष्णु पद रे ने ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा परियोजना के लिए चल रही भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से तत्काल हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है। सांसद ने कहा कि यह परियोजना राष्ट्रीय रणनीतिक महत्व की है और इसका सफलतापूर्वक क्रियान्वयन अत्यंत आवश्यक है। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भूमि अधिग्रहण पूरी तरह कानून के अनुरूप, निष्पक्ष तथा पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी कानूनी त्रुटि के कारण परियोजना प्रभावित न हो। सांसद ने बताया कि उन्होंने इससे पूर्व 1 दिसंबर 2025 को अपने पत्र के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री तथा केंद्रीय गृह मंत्री को 25 नवंबर 2025 को गांधी नगर एवं शास्त्री नगर के पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों तथा प्रभावित व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत आपत्तियों को अग्रेषित किया था। ये आपत्तियां आरएफसीटीएलएआरआर अधिनियम, 2013 के अंतर्गत 6 नवंबर 2025 को जारी प्रारंभिक अधिसूचना के संबंध में थीं। उन्होंने कहा कि प्रभावित परिवारों ने अपनी आपत्तियों में कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। इनमें यह तथ्य शामिल है कि अनेक परिवार वर्ष 1969 की पुनर्वास योजना के अंतर्गत सरकार द्वारा बसाए गए पूर्व सैनिक परिवार हैं। कई परिवार वर्ष 2004 की सुनामी के बाद पहले ही विस्थापन का सामना कर चुके हैं और वर्तमान भूमि अधिग्रहण के कारण उन्हें तीसरी बार विस्थापित होना पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक प्रभाव आकलन (एसआईए) रिपोर्ट में कथित रूप से जमीनी वास्तविकताओं, बागान आधारित आजीविका, सामुदायिक परिसंपत्तियों, धार्मिक स्थलों, कब्रिस्तानों, विद्यालयों, आंगनवाड़ी केंद्रों तथा बसावट वाले गांवों पर पड़ने वाले प्रभाव का समुचित उल्लेख नहीं किया गया है। सांसद ने बताया कि प्रभावित लोगों ने भूमि का उचित मूल्यांकन करने की मांग की है, जिसमें सुनामी के बाद दिए गए मुआवजे के मानकों को भी ध्यान में रखा जाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने नारियल, सुपारी तथा अन्य बागान वृक्षों के लिए केवल सांकेतिक मूल्यांकन के बजाय आजीविका एवं आजीवन आय के आधार पर उचित मुआवजा देने की मांग की है। प्रभावित परिवारों ने भूमि के बदले भूमि, मकान के बदले मकान, आजीविका की सुरक्षा, रोजगार सहायता तथा यथासंभव ग्रेट निकोबार के भीतर ही पुनर्वास सुनिश्चित करने का भी अनुरोध किया है। साथ ही उन्होंने धारा 15 के अंतर्गत व्यक्तिगत सुनवाई, आपत्तियों पर कारणयुक्त आदेश तथा आपत्तियों के निस्तारण से पूर्व धारा 19 की अधिसूचना जारी नहीं करने की मांग भी की है। बिष्णु पद रे ने कहा कि ये सभी आपत्तियां आरएफसीटीएलएआरआर अधिनियम की धारा 15 के दायरे में आती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि धारा 15 का संबंध इस मूल प्रश्न से है कि प्रस्तावित भूमि का अधिग्रहण निर्धारित उद्देश्य के लिए तथा सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट के आधार पर किया जाना उचित है या नहीं। जबकि धारा 16 के अंतर्गत पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन की प्रक्रिया केवल उस स्थिति में लागू होती है जब भूमि अधिग्रहण आगे बढ़ता है। इसलिए केवल पुनर्वास संबंधी विषयों पर विचार करना धारा 15 के अनिवार्य प्रावधानों का विकल्प नहीं हो सकता। सांसद ने उपलब्ध अभिलेखों में कथित विसंगतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट में लगभग 263 प्रभावित परिवारों का उल्लेख है, जबकि पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन रिपोर्ट में 572 प्रभावित परिवार तथा 344 विस्थापित परिवार दर्शाए गए हैं। वहीं उपलब्ध कराई गई सूची में 582 प्रभावित परिवार एवं 344 विस्थापित परिवारों का उल्लेख है। उन्होंने आगे की कार्रवाई से पहले इन आंकड़ों का उचित मिलान करने की मांग की उन्होंने दिनेश एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें न्यायालय ने कहा है कि यदि धारा 15 के प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता है तो भूमि अधिग्रहण की पूरी कार्यवाही बाद की प्रक्रियाएं पूरी होने के बावजूद भी प्रभावित हो सकती है। सांसद ने केंद्रीय गृह मंत्री से अनुरोध किया है कि अंडमान एवं निकोबार प्रशासन को धारा 15 की संपूर्ण प्रक्रिया पूर्ण करने, प्रभावित व्यक्तियों की सुनवाई सुनिश्चित करने, आपत्तियों पर विधिसम्मत आदेश पारित करने, अभिलेखों में मौजूद विसंगतियों का समाधान करने तथा वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किए बिना कोई भी अपरिवर्तनीय कदम नहीं उठाने के निर्देश दिए जाएं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका रुख पूरी तरह स्पष्ट है कि ग्रेट निकोबार परियोजना आगे बढ़नी चाहिए, लेकिन यह परियोजना कानून के अनुरूप, निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से आगे बढ़े तथा इसमें राष्ट्रीय हित के साथ-साथ प्रभावित परिवारों के अधिकारों का भी पूर्ण संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।

SCROLL FOR NEXT