देश/विदेश

सांसद ने तटीय शासन पर उठाए गंभीर सवाल, प्रधानमंत्री को लिखा पत्र

पर्यावरणीय कानूनों में मौजूदा नियामक खामियों पर प्रकाश

विकास के बाद समुद्र में छोड़े जाने वाले अपशिष्ट को लेकर चिंता

सन्मार्ग संवाददाता

श्री विजयपुरम : अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के सांसद बिष्णु पद रे ने द्वीपों में पर्यावरणीय शासन और तटीय प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाते हुए भारत के प्रधानमंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखा है। अपने विस्तृत प्रतिवेदन में सांसद ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा सीआरजेड अधिसूचना, 2019 के अंतर्गत मौजूदा नियामक ढांचे में एक मूलभूत कमी की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वर्तमान कानून मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित हैं कि विकास कहां किया जा सकता है, लेकिन यह पर्याप्त रूप से इस बात को नियंत्रित नहीं करते कि उसके बाद समुद्र में क्या छोड़ा जा रहा है, जो कि द्वीपों के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। सांसद ने यह भी रेखांकित किया कि अंडमान एवं निकोबार जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील द्वीप क्षेत्रों में वास्तव में कोई “सुरक्षित क्षेत्र” नहीं होता, क्योंकि अनुमत विकास भी यदि अपशिष्ट और तरल पदार्थों का उचित प्रबंधन न हो तो अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति का कारण बन सकता है। शासन से जुड़े मुद्दों पर चिंता व्यक्त करते हुए बिष्णु पद रे ने कहा कि द्वीपों में प्रशासनिक स्तर पर एक गंभीर और बढ़ती दूरी देखी जा रही है, जो पिछले आठ वर्षों में काफी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि जनता से संवाद में कमी और वैधानिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने के बजाय उनसे बचने या उन्हें रोकने की प्रवृत्ति ने नीतियों के क्रियान्वयन को प्रभावित किया है और जनता का विश्वास कमजोर किया है। सांसद ने आम नागरिकों के सामने आने वाली चुनौतियों का भी उल्लेख किया और कहा कि अत्यधिक नियम, उच्च अनुपालन लागत तथा जटिल प्रक्रियाओं ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहां नियमों का पालन करना कठिन हो गया है और उन्हें दरकिनार करना एक व्यावहारिक विकल्प बन गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नागरिकों की विफलता नहीं, बल्कि नीतियों के ऐसे डिजाइन का परिणाम है जो द्वीपों की वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है। जमीनी हकीकत को उजागर करते हुए सांसद ने कहा कि द्वीपों में अब भी डीजल आधारित बिजली पर निर्भरता बनी हुई है, सीवेज ट्रीटमेंट और कचरा प्रबंधन के बुनियादी ढांचे में कमी है, तथा पर्यटन का बढ़ता दबाव मौजूद बुनियादी ढांचे की क्षमता से मेल नहीं खाता। तत्काल सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए सांसद ने तटीय प्रबंधन के लिए प्रदर्शन-आधारित ढांचे की ओर बदलाव का प्रस्ताव रखा, जो केवल जोनिंग प्रतिबंधों के बजाय वास्तविक पर्यावरणीय परिणामों पर ध्यान केंद्रित करे। इसके अंतर्गत उन्होंने सार्वभौमिक सीवर कनेक्टिविटी, उन्नत सीवेज ट्रीटमेंट प्रणाली, समुद्री आउटफॉल ढांचा तथा अपशिष्ट जल के रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी प्रमुख सुझाव दिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सरकार की होनी चाहिए, जिसके लिए मजबूत बुनियादी ढांचा विकसित किया जाए, न कि इसका असंतुलित बोझ आम नागरिकों पर डाला जाए। एक दूरदर्शी सुझाव के रूप में बिष्णु पद रे ने कहा कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हवाई किराए के युक्तिकरण के साथ-साथ एक नाममात्र “आइलैंड सस्टेनेबिलिटी शुल्क” लागू किया जा सकता है, जो पर्यटकों के ठहरने की अवधि से जुड़ा हो, ताकि पर्यटन सीधे तौर पर बुनियादी ढांचे के विकास में योगदान दे सके और स्थानीय निवासियों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। सांसद ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि संबंधित मंत्रालयों को निर्देशित कर व्यापक समीक्षा कराई जाए और द्वीपों के लिए विशेष रूप से तैयार, प्रदर्शन-आधारित तटीय प्रबंधन ढांचा लागू किया जाए, साथ ही प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करने और जनता के विश्वास को पुनः स्थापित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।


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