इजराइल में पैसे के दम पर वोट खरीदने के आरोप 
देश/विदेश

पैसा बहुत पावरफुल

जब-तब पैसे के दम पर वोट खरीदने के आरोप सामने आते हैं, अब इजराइल में इसी तरह के आरोप लग रहे हैं

Rajesh Nain
लोकतंत्र में जनता की ताकत का सबसे बड़ा प्रतीक उसका वोट है। लेकिन जब-तब पैसे के दम पर वोट खरीदने के आरोप सामने आते हैं। अब इजराइल में इसी तरह के आरोप लग रहे हैं, वह भी विदेशी पैसे के दखल के आरोप। यह मामला केवल एक देश के चुनाव का नहीं, बल्कि दुनियाभर के लोकतंत्रों की विश्वसनीयता का है। इजराइल के केंद्रीय चुनाव आयोग ने देश की सुरक्षा एजेंसी शिन बेट को उन आरोपों की जांच करने को कहा, जिनके अनुसार विदेशी संस्थाओं ने इजराइल के हितों के विरुद्ध चुनाव को प्रभावित करने के लिए धन मुहैया कराया हो सकता है। सवाल यह है कि आखिर किस तरह के प्रभाव की आशंका ने इस जांच को जरूरी बनाया? इजराइल के चुनाव परिणामों ने इस सवाल को और महत्वपूर्ण बना दिया है। 120 सदस्यीय संसद नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। 29 अक्टूबर तक उपलब्ध नतीजों के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गुट को 53 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को 48 सीटें मिल रही हैं। अरब दलों को मिलाकर 19 सीटें मिलने की संभावना सामने आई, जो उनके लिए ऐतिहासिक बढ़त मानी जा रही है। मतलब बहुमत किसी को नहीं मिला, लेकिन अरब दल सरकार गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे अनिश्चित राजनीतिक माहौल में विदेशी धन से चुनाव को प्रभावित करने का संदेह और भी संवेदनशील हो जाता है। इजराइल को दुनिया के सबसे सक्षम खुफिया तंत्र वाले देशों में गिना जाता है। उसकी सुरक्षा एजेंसियां, साइबर तकनीक और आतंकवाद विरोधी अभियान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे हैं। इसी देश की कंपनी एनएसओ समूह ने पेगासस जैसा जासूसी सॉफ्टवेयर विकसित किया, जो किसी मोबाइल फोन की गतिविधियों तक पहुंचने में सक्षम है। दुनिया में विदेशी चुनावी हस्तक्षेप के उदाहरण पहले से मौजूद हैं। वर्ष 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस से जुड़े लोगों और संस्थाओं ने साइबर हमलों, राजनीतिक दलों की सूचनाएं चुराने और सामाजिक माध्यमों पर भ्रामक प्रचार के जरिये अमेरिकी मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की। अमेरिकी सीनेट की खुफिया समिति ने पाया कि रूसी पक्ष ने कई राज्यों की चुनावी व्यवस्थाओं को निशाना बनाया था। रोमानिया में 2024 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान सामाजिक माध्यमों पर समन्वित प्रचार, संदिग्ध खातों और विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों ने गंभीर विवाद खड़ा किया। पहले चरण के नतीजों के बाद वहां की संवैधानिक अदालत ने चुनाव प्रक्रिया रद्द कर दी। मोल्दोवा में भी 2024 के चुनाव और यूरोपीय संघ से जुड़ी जनमत प्रक्रिया के दौरान विदेशी प्रचार, धन और भ्रामक सूचनाओं के इस्तेमाल के आरोप सामने आए। भारत भी इस खतरे से पूरी तरह अछूता नहीं रहा है। 2018 में फेसबुक और राजनीतिक परामर्श कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका का केस सामने आया। फेसबुक के जरिये भारतीय मतदाताओं की निजी जानकारी और चुनावी व्यवहार को प्रभावित करने के प्रयास सामने आए। सरकार के अनुसार, लगभग 5.62 लाख भारतीय उपयोगकर्ता संभावित रूप से उस मामले से प्रभावित हो सकते थे। बाद में इस प्रकरण की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपी गई। हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि इस मामले से भारत के किसी चुनाव का नतीजा बदल गया था, लेकिन इस प्रकरण ने दिखाया कि मतदाताओं की जानकारी, उनकी पसंद और उनकी कमजोरियों का व्यावसायिक या राजनीतिक इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। भारत में चुनावी दुष्प्रचार का एक और बड़ा रूप सामाजिक माध्यमों पर फैली झूठी खबरों, भ्रामक वीडियो और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाए गए नकली संदेशों के रूप में सामने आया है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान करीब 97 करोड़ मतदाता मतदान के पात्र थे। इतने विशाल लोकतंत्र में करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाला कोई झूठा संदेश या किसी समुदाय के बारे में सुनियोजित अफवाह जनमत को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। इजराइल जैसा समृद्ध, तकनीकी रूप से उन्नत और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था वाला देश भी अगर विदेशी धन से चुनाव प्रभावित करने की आशंका की जांच कराने को मजबूर है, तो विकासशील और अविकसित देशों के सामने चुनौती कितनी बड़ी होगी? इससे उठने वाला सवाल पूरी दुनिया के लिए है - अगर पैसा चुनावी जनमत को प्रभावित करने लगे, तो लोकतंत्र की असली कीमत कौन चुकाएगा? पैसा बहुत पावरफुल है, इसलिए लोकतंत्र को उससे बचाने वाली व्यवस्था उससे भी ज्यादा मजबूत होनी चाहिए।
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