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मेघालय की ‘कियाड’ राइस बीयर पर नई स्टडी, पारंपरिक पौधे में दिखे संभावित लाभ

Krishna Das Parth

शिलांग : मेघालय की पारंपरिक राइस बीयर ‘कियाड’ (Kiad) को तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली पौधे की एक पारंपरिक सामग्री को लेकर नई वैज्ञानिक स्टडी सामने आई है। Indian Journal of Traditional Knowledge में प्रकाशित शोध के अनुसार, अमोमम एरोमैटिकम (Amomum aromaticum) से निकाले गए पॉलीसेकेराइड फर्मेंटेशन में इस्तेमाल होने वाले यीस्ट Saccharomyces cerevisiae की वृद्धि और गतिविधि को प्रभावित कर सकते हैं। शोध में यह भी पाया गया कि इस पौधे के यौगिक कियाड की एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि में योगदान दे सकते हैं। यह अध्ययन पूर्वी खासी हिल्स के सोहरा और पश्चिमी जयंतिया हिल्स के टायरसाड से स्थानीय उत्पादकों द्वारा तैयार की गई कियाड के नमूनों पर किया गया। शोधकर्ताओं डारिटी हिन्यूटा, बकमेनलांग रानी और वेदांत विक्रम बोराह ने फर्मेंटेशन प्रक्रिया के दौरान A. aromaticum से जुड़े यौगिकों और यीस्ट के बीच संभावित संबंधों का अध्ययन किया।

‘थियाट’ में इस्तेमाल होता है पौधा

खासी और जयंतिया समुदायों की पारंपरिक फर्मेंटेशन प्रक्रिया में ‘थियाट’ (Thiat) नामक पौधों से तैयार स्टार्टर का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें A. aromaticum के साथ अन्य जड़ी-बूटियां भी शामिल होती हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस पौधे की संभावित प्रीबायोटिक क्षमता पर अब तक सीमित वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं। अध्ययन के दौरान कियाड के दो नमूनों से प्रमुख यीस्ट को अलग किया गया और आनुवंशिक विश्लेषण के जरिए इसकी पहचान Saccharomyces cerevisiae के रूप में हुई। जब यीस्ट को पौधे से निकाले गए पॉलीसेकेराइड के संपर्क में रखा गया तो कुछ सांद्रता पर बायोफिल्म निर्माण में वृद्धि देखी गई। हालांकि, शोधकर्ताओं ने इस परिणाम को निर्णायक नहीं माना है। क्रिस्टल-वायलेट एसे में दर्ज वृद्धि सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं थी (p=0.593)। इसलिए अध्ययन में इसे संभावित प्रभाव का संकेत माना गया है, न कि पक्के निष्कर्ष के रूप में। वहीं, प्रयोगशाला में ग्रोथ मीडिया में पौधे का अर्क मिलाने पर यीस्ट की वृद्धि अधिक घनी देखी गई।

दोनों नमूनों की रासायनिक संरचना में अंतर

शोध में सोहरा और टायरसाड से लिए गए कियाड के नमूनों की रासायनिक विशेषताओं में भी अंतर पाया गया। सोहरा के नमूने का pH 3.82 था, जबकि टायरसाड के नमूने का pH 4.05 दर्ज किया गया। सोहरा के नमूने में टाइट्रेबल एसिडिटी भी अधिक रही, जो क्रमशः 0.943% और 0.303% थी। एंटीऑक्सीडेंट क्षमता मापने के लिए किए गए DPPH टेस्ट में सोहरा के नमूने ने 94.88% फ्री-रैडिकल-स्कैवेंजिंग गतिविधि दर्ज की, जबकि टायरसाड के नमूने में यह 86.38% रही। पौधे से निकाले गए पॉलीसेकेराइड में भी 74.13% गतिविधि दर्ज की गई।

स्थानीय फर्मेंटेशन से बदलती है कियाड की केमिस्ट्री

शोध में GC-MS विश्लेषण के जरिए दोनों नमूनों में अलग-अलग वाष्पशील रासायनिक प्रोफाइल पाए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि स्थानीय स्तर पर अपनाई जाने वाली प्रसंस्करण विधियां और फर्मेंटेशन का वातावरण कियाड के स्वाद और रासायनिक संरचना को प्रभावित कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि अध्ययन के आधार पर A. aromaticum के अर्क को निश्चित रूप से प्रीबायोटिक नहीं कहा जा सकता। अध्ययन में इनके यौगिकों को ‘प्रीबायोटिक जैसे पॉलीसेकेराइड’ के रूप में वर्णित किया गया है और आगे विस्तृत शोध की जरूरत बताई गई है। भविष्य के अध्ययन में इन पॉलीसेकेराइड में मौजूद अलग-अलग शर्कराओं की पहचान, यीस्ट पर इनके आणविक स्तर के प्रभाव और आंतों के माइक्रोबायोटा पर उनकी संभावित गतिविधि की जांच की जरूरत बताई गई है।

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