सन्मार्ग संवाददाता
श्री विजयपुरम : लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को कहा कि वह ग्रेट निकोबार द्वीप “बोलने नहीं, सुनने आए हैं” और निकोबारी आदिवासी समुदाय को आश्वस्त किया कि उनकी जमीन, पहचान और भविष्य की रक्षा के लिए वह उनके साथ खड़े रहेंगे। कैंपबेल बे के राजीव नगर स्थित कम्युनिटी हॉल में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने जोर दिया कि लोगों की इच्छा के विरुद्ध थोपे गए किसी भी विकास परियोजना को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि उन्हें बताया गया है कि यह परियोजना लोगों की इच्छा के खिलाफ लागू की जा रही है और इससे उनके जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि पहले भी लोगों ने अपनी चिंताएं उनके सामने रखी थीं, लेकिन ऐसे मुद्दों को पूरी तरह समझने के लिए मौके पर जाकर देखना जरूरी होता है, इसलिए वह यहां वास्तविक स्थिति को समझने के लिए आए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह पूरे दिन स्थानीय निवासियों से बातचीत कर उनकी समस्याओं को विस्तार से समझेंगे। उन्होंने सभा को आश्वस्त करते हुए कहा कि वह और उनकी पार्टी आदिवासी समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करेंगे और लोगों से चिंता न करने का आग्रह किया। उन्होंने गर्म मौसम के बावजूद बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों का आभार भी व्यक्त किया। इससे पहले, आदिवासी नेताओं ने पारंपरिक तरीके से राहुल गांधी का स्वागत किया और उनके दौरे को द्वीप के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि समुदाय लंबे समय से जंगलों और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षक रहा है और बड़े पैमाने की आधारभूत परियोजनाएं उनके जीवन शैली को प्रभावित कर सकती हैं। समुदाय के प्रतिनिधियों ने प्रस्तावित मेगा विकास परियोजना पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे उनकी पैतृक जमीन, जैव विविधता और सांस्कृतिक पहचान को खतरा है। उन्होंने मांग की कि वन्यजीव और पर्यावरण विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति गठित कर परियोजना के प्रभाव का गहन आकलन किया जाए। कई वक्ताओं ने कहा कि जंगल और तटीय क्षेत्र उनकी आजीविका और अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने आशंका जताई कि विस्थापन और पारंपरिक गतिविधियों जैसे मछली पकड़ने तथा वन आधारित कार्यों पर प्रतिबंध उनके जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। पुनर्वास क्षेत्रों में पानी, बिजली, संचार और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। आदिवासी सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया कि परियोजना शुरू करने से पहले उनसे पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया और निर्णय प्रक्रिया में उनकी आवाज शामिल नहीं की गई, जिसमें वन स्वीकृति प्रक्रिया भी शामिल है। उन्होंने अपने भूमि से जुड़े निर्णयों में सम्मान, गरिमा और उचित भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया।