सन्मार्ग संवाददाता
श्री विजय पुरम - हॉर्नबिल नेस्ट के पास अनावरण की गई भगवान शिव की भव्य प्रतिमा तेजी से शहर के एक प्रमुख नए आकर्षण के रूप में उभर रही है। समुद्र की पृष्ठभूमि में खड़ी इस विशाल प्रतिमा की एक झलक पाने के लिए सैकड़ों लोग यहां रुक रहे हैं। अपने विशाल आकार, विशिष्ट रूप और आध्यात्मिक आभा के कारण यह प्रतिमा यहां आने वाले लोगों को काफी आकर्षित कर रही है।
सन्मार्ग संवाददाता से बातचीत करते हुए मूर्तिकार राघेश ससी ने बताया कि प्रतिमा के निर्माण के दौरान इसके पीछे की मूल कल्पना में काफी बदलाव आया। उन्होंने कहा कि परियोजना के लिए संपर्क किए जाने के बाद अप्रैल 2025 में इस कार्य की शुरुआत हुई थी और इसे लगभग 17 से 18 महीनों में पूरा किया गया। शुरुआत में उन्होंने भगवान शिव की अलग-अलग मुद्राओं में दो चित्र तैयार किए थे, जिसके बाद वर्तमान डिजाइन का चयन किया गया।
राघेश ने बताया कि प्रतिमा के अंतिम स्वरूप को तैयार करने में आसपास के वातावरण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चूंकि यह प्रतिमा समुद्र के काफी करीब स्थित है, इसलिए वह भगवान शिव को पूरी तरह स्थिर रूप में दिखाने के बजाय उसमें गति का भाव देना चाहते थे। उन्होंने बताया, “सामने समुद्र है, इसलिए हवा चलेगी। मैंने सोचा कि प्रतिमा में भी कुछ गति होनी चाहिए।”
इसी रचनात्मक सोच के चलते त्रिशूल से जुड़ा हुआ लहराता वस्त्र जोड़ा गया, जबकि प्रतिमा के आसपास के अन्य तत्वों को भी संतुलित ढंग से तैयार किया गया। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य एक ओर प्रतिमा में संतुलन और समरूपता बनाए रखना था, वहीं दूसरी ओर ऐसा प्रभाव पैदा करना था कि दिव्य स्वरूप प्राकृतिक वातावरण के साथ हल्के ढंग से जुड़ा हुआ प्रतीत हो।
प्रतिमा की रंग योजना भी इसके स्थान से प्रेरित रही। पारंपरिक चमकीले या अत्यधिक उभरे हुए रंगों के बजाय राघेश ने ग्रे और गहरे रंगों के अलग-अलग शेड्स का इस्तेमाल किया, ताकि प्रतिमा समुद्र, चट्टानों और आसपास के प्राकृतिक परिदृश्य के साथ स्वाभाविक रूप से घुल-मिल सके। उन्होंने बताया कि समुद्र के रंग और स्थानीय पत्थरों ने रंगों के चयन को प्रभावित किया और इससे प्रतिमा को ऐसा स्वरूप देने में मदद मिली, मानो वह इसी स्थान का स्वाभाविक हिस्सा हो।
भगवान शिव की प्रतिमा स्वयं 20 फीट ऊंची है, जबकि आधार सहित पूरी संरचना की ऊंचाई लगभग 32 फीट है। इस विशाल प्रतिमा को सीमेंट और रेत से तैयार किया गया है, जिसके भीतर मजबूती के लिए सुदृढ़ीकरण किया गया है, जबकि मुख्य संरचना अंदर से खोखली रखी गई है। राघेश ने बताया कि सामग्री का चयन मजबूती और टिकाऊपन को ध्यान में रखते हुए किया गया, विशेषकर द्वीपों के वातावरण की परिस्थितियों को देखते हुए।
इस विशाल प्रतिमा का निर्माण अकेले संभव नहीं था। राघेश के साथ इस चुनौतीपूर्ण मूर्तिकला यात्रा में प्रजीश पीपी, निथिन ई, निथिश गोपीनाथ, नंदकुमार, अनीश कुंजुमोन, श्रीराग और डिबिन भी शामिल रहे। पूरी टीम ने कई महीनों तक मिलकर मूल कलात्मक अवधारणा को एक विशाल संरचना में बदलने का काम किया। इस दौरान प्रतिमा के आकार, अनुपात और बारीकियों को सावधानीपूर्वक विकसित किया गया तथा इतने बड़े पैमाने की मूर्ति के निर्माण से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों का भी सामना किया गया।
केरल के कासरगोड से आने वाले मूर्तिकार राघेश ने मावेलिक्कारा स्थित राजा रवि वर्मा कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स से ललित कला में बीएफए की डिग्री प्राप्त की है। उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों पर कई मूर्तियों पर कार्य किया है, जिनमें जबलपुर के एक सेना शिविर में निर्मित युद्ध स्मारक भी शामिल है। इसके अलावा उन्होंने नागपुर, चंद्रपुर और पंजाब में भी विभिन्न परियोजनाओं पर काम किया है।
उनका अनुभव भारत तक सीमित नहीं रहा है। राघेश ने बताया कि उन्होंने लगभग आठ वर्षों तक दुबई में भी काम किया, जहां दुबई शॉपिंग फेस्टिवल और ग्लोबल विलेज से जुड़ी परियोजनाओं सहित कई बड़े पैमाने की मूर्तियों और स्थापनाओं पर उन्होंने कार्य किया।
हालांकि उनके लिए हॉर्नबिल नेस्ट के पास भगवान शिव की यह प्रतिमा केवल एक और विशाल कलाकृति नहीं है। सावधानीपूर्वक तैयार की गई मुद्रा, समुद्र से प्रेरित रंग और हवा में लहराते तत्व भगवान शिव के दिव्य स्वरूप को एक विशिष्ट पहचान देते हैं। प्रतिमा की विशाल उपस्थिति ने पहले ही शहर के अलग-अलग हिस्सों से लोगों को यहां आकर्षित करना शुरू कर दिया है।
महादेव की इस विशाल प्रतिमा के सामने श्रद्धालु और आगंतुक कुछ क्षण रुककर इसे निहार रहे हैं। यह प्रतिमा तेजी से ऐसा स्थान बनती जा रही है जहां कला, प्रकृति और आस्था एक साथ दिखाई देती हैं। शहर को यह केवल एक भव्य संरचना ही नहीं दे रही, बल्कि भगवान शिव की शाश्वत आध्यात्मिक उपस्थिति की एक प्रभावशाली दृश्य स्मृति भी प्रस्तुत कर रही है।