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चुनाव टालकर राष्ट्रपति शासन की साजिश: अभिषेक

भाजपा पर 'संवैधानिक संकट' पैदा करने का आरोप

प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने रविवार को एक पत्रकार सम्मेलन में भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव सिर्फ एक दिखावा है, भगवा पार्टी राज्य में संवैधानिक संकट पैदा कर चुनाव टालने की साजिश रच रही है। उनका दावा है कि न्यायपालिका के एक हिस्से का सहारा लेकर मतदान प्रक्रिया को बाधित करने और राष्ट्रपति शासन लागू करने की कोशिश की जा रही है।

अभिषेक ने आरोप लगाया कि SIR के तहत जानबूझकर 60 लाख से अधिक नाम ‘अंडर एडजुडिकेशन’ में रखे गए हैं, ताकि चुनाव में देरी हो सके। उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेताओं के विशेष वीडियो दिखाए और कहा कि भाजपा का लक्ष्य 1 करोड़ 25 लाख नाम हटाने का था, जिसमें वह आंशिक रूप से सफल रही है। कई विधानसभा क्षेत्रों में डेढ़ लाख तक नाम लंबित दिखाए जाने पर उन्होंने सवाल उठाया और इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया।

उन्होंने आशंका जताई कि यह सभी लंबित मामलों के निपटाने में 3-4 महीने लग सकते हैं, जिससे चुनाव जुलाई-अगस्त तक टल सकता है। यदि ऐसा होता है तो इस बात की प्रबल संभावना है कि विधानसभा भंग हो सकती है और संवैधानिक नीति के अनुसार राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ सकता है। चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए अभिषेक ने कहा कि यदि किसी का नाम ड्राफ्ट सूची में है तो उसकी नागरिकता स्थापित है और उसका मताधिकार छीना नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर वे सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल साक्ष्य पेश करेंगे। उन्होंने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि यदि हिम्मत है तो राष्ट्रपति शासन लागू कर दिखाएं, जनता जवाब देगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी तरह चुनाव आयोग ने इस बीच बंगाल में चुनाव तिथियों की घोषणा कर दी, तो इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी।

भाजपा की “सहायक एजेंसी” बन चुकी है आयोग

अभिषेक ने आरोप लगाया कि आयोग ने भारत का सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया और एकतरफा SOP बना दी। उन्होंने कहा कि विवाहित महिलाओं के मामले में आधार को पहचान प्रमाण नहीं माना जा रहा, जबकि अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक और महिलाओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। अभिषेक के मुताबिक, SIR के पहले चरण में 58 लाख नाम हटाए गए, इसके बाद ‘फॉर्म-7’ के माध्यम से करीब साढ़े पांच लाख नाम और हटाने की प्रक्रिया जारी है। सबसे गंभीर बात यह है कि 60,06,675 मतदाताओं के नाम ‘अंडर एडजुडिकेशन’ में रखे गए हैं। कुल मिलाकर संख्या लगभग 1.24 करोड़ तक पहुंच रही है।

उन्होंने यह भी बताया कि ‘अंडर एडजुडिकेशन’ सूची में मंत्री, विधायक और यहां तक कि सरकारी अधिकारियों के नाम भी हैं, जिससे प्रक्रिया की गंभीर खामियां उजागर होती हैं। कुछ जिलों—खासकर मालदा और मुर्शिदाबाद—में भारी संख्या में नाम लंबित रखे जाने के आंकड़े पेश करते हुए उन्होंने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया। बयान के अंत में अभिषेक ने कहा कि बंगाल के लोगों को रोहिंग्या या बांग्लादेशी बताकर बदनाम करने के लिए भाजपा और चुनाव आयोग को सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि इस कथित अन्याय के खिलाफ जरूरत पड़ी तो वह अकेले भी सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे।

जीवित मतदाताओं को ‘मृत’ दिखाने का आरोप

अभिषेक ने दावा किया कि उनके ‘एकडाके अभिषेक’ कार्यक्रम के तहत कम से कम 243 लोगों ने फोन कर शिकायत की है कि वे जीवित हैं, फिर भी उनके नाम के आगे ‘मृत’ लिखा गया है। उन्होंने इसे गंभीर आपराधिक कृत्य बताया और कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मसौदा सूची में नाम और नागरिकता प्रमाणित होने के बावजूद नाम हटाए गए हैं, तो वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाएंगे।

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