सन्मार्ग संवाददाता
श्री विजयपुरम : अंडमान एवं निकोबार प्रशासन के पशुपालन एवं पशु चिकित्सा सेवा विभाग ने पिछले कुछ सप्ताह के दौरान श्री विजयापुरम तथा आसपास के क्षेत्रों में कुत्तों में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस संक्रमण के मामलों की पुष्टि होने की जानकारी दी है। विभाग ने बताया कि यह एक अत्यंत संक्रामक तथा जानलेवा वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से उन कुत्तों को प्रभावित करती है जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है अथवा जिनका टीकाकरण निर्धारित समय और उचित तरीके से नहीं कराया गया है। विभाग के अनुसार कैनाइन डिस्टेंपर मॉर्बिलीवायरस नामक वायरस के कारण होता है, जो पिल्लों तथा वयस्क कुत्तों के श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र पर गंभीर प्रभाव डालता है। इस बीमारी के सामान्य लक्षणों में 103 से 104 डिग्री फारेनहाइट तक तेज बुखार, नाक का सूख जाना, आंखों में संक्रमण एवं लालिमा, आंख और नाक से स्राव होना, निमोनिया, भूख में कमी, उल्टी, पेट दर्द, बेचैनी, अत्यधिक उत्तेजना, जबड़ों का लगातार चलना या चबाने जैसी गतिविधि, अत्यधिक लार आना, दौरे पड़ना, मिर्गी जैसे लक्षण, कोरिया (मांसपेशियों में अनियंत्रित झटके), तथा पैरों के तलवों की त्वचा का असामान्य रूप से मोटा हो जाना (हाइपरकेराटिनाइजेशन), जिसके कारण चलने में कठिनाई या लंगड़ापन शामिल हैं। विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस बीमारी से बचाव का एकमात्र प्रभावी उपाय समय पर टीकाकरण है। एक बार कुत्ता इस वायरस से संक्रमित हो जाए तो इसका कोई विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। उपचार केवल सहायक चिकित्सा तक सीमित रहता है, जिसमें द्वितीयक संक्रमणों का उपचार, उल्टी, दस्त एवं तंत्रिका संबंधी लक्षणों का नियंत्रण तथा शरीर में पानी की कमी को दूर करने के लिए आवश्यकतानुसार तरल पदार्थ देना शामिल है। पशुपालन एवं पशु चिकित्सा सेवा विभाग ने पालतू कुत्तों के मालिकों से अपील की है कि वे बीमारी के प्रसार को रोकने तथा अपने पालतू पशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल आवश्यक एहतियाती कदम उठाएं। विभाग ने सलाह दी है कि पालतू कुत्तों को रखने वाले स्थानों की नियमित रूप से हल्के कीटाणुनाशकों तथा एंटीसेप्टिक लोशन से अच्छी तरह सफाई की जाए। यदि कोई कुत्ता संक्रमित पाया जाता है तो उसे तुरंत अन्य कुत्तों से अलग रखा जाए ताकि संक्रमण आगे न फैले। विभाग ने यह भी कहा है कि प्रत्येक कुत्ते का निर्धारित समय पर टीकाकरण अवश्य कराया जाना चाहिए। सामान्यतः पहला टीका 6 से 8 सप्ताह की आयु के बीच लगाया जाता है, जिसके बाद पिल्ले की आयु 16 से 20 सप्ताह होने तक प्रत्येक 3 से 4 सप्ताह के अंतराल पर बूस्टर डोज देना आवश्यक होता है। समय पर टीकाकरण ही इस गंभीर बीमारी से प्रभावी सुरक्षा प्रदान कर सकता है।
इसके अतिरिक्त विभाग ने सलाह दी है कि जिन कुत्तों का टीकाकरण नहीं हुआ है, उन्हें विशेष रूप से सार्वजनिक स्थानों या अन्य कुत्तों के संपर्क में आने से बचाया जाए। उनके भोजन एवं पानी के बर्तनों की नियमित सफाई की जाए। विभाग ने बताया कि घरेलू उपयोग में आने वाले अधिकांश कीटाणुनाशक, विशेष रूप से पानी में 1:20 के अनुपात में मिलाया गया ब्लीच, इस वायरस को प्रभावी रूप से नष्ट करने में सक्षम है। यदि किसी कुत्ते में बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो उसे अर्ध-ठोस, मुलायम अथवा तरल आहार दिया जाना चाहिए। साथ ही शरीर में पानी, इलेक्ट्रोलाइट्स तथा प्रोबायोटिक्स का संतुलन बनाए रखने के लिए दही खिलाने की भी सलाह दी गई है। गंभीर उल्टी और दस्त की स्थिति में पशु चिकित्सक की देखरेख में तरल चिकित्सा कराना अत्यंत आवश्यक है ताकि निर्जलीकरण से बचाया जा सके।