सर्जना शर्मा
आजकल आम तौर ये माना जाता है कि संसद में पक्ष- विपक्ष केवल आपस में लड़ता है वॉक आउट करता है नारेबाजी करता है सदन बार बार स्थगित होता है। ये काफी हद तक सही है लेकिन साथ ही काम भी होता है और केवल राजनीति नहीं उससे इतर भी कुछ मुद्दे हैं जो संसद के सामने लाए जाते हैं। राज्यसभा में (जो कि संसद का उच्च सदन है) सुबह सदन शुरू होते ही एक घंटे का शून्यकाल होता है जिसमें सांसद अपने इलाके परिवार समाज से जुड़े मुद्दे भी रखते हैं। बजट सत्र के दूसरे चरण में देखने में आ रहा है कि सांसद विदेशों में रहने वाले युवकों युवतियों के माता पिता की आर्थिक सुरक्षा, माता पिता की मृत्यु पर हिंदुओं को 13 दिन की वेतन सहित छुट्टी, अति गंभीर रोगियों को इच्छा मृत्यु की अनुमति देने के लिए कानून बनाना, महिलाओं के घर के कामकाज का आर्थिक मूल्य तय करना , सोशल मीडिया का प्रयोग स्कूलों और 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रतिबंधित करना , स्विगी , जोमैटो आदि में डिलीवरी करने वालों की हितों की रक्षा करना, बीमा कंपनियों की नकेल कसना आदि विषय भी शून्य काल में उठाए जा रहे हैं।
भाजपा सांसद दिनेश शर्मा ने इस बार शून्य काल में विषय रखा कि सनातन धर्म में परिवार में किसी की भी मृत्यु पर 13 दिन का शोक होता है। नौकरीपेशा लोगों के सामने बहुत मुश्किलें हैं उनको दो या तीन दिन में 13 दिन के धार्मिक अनुष्ठान करने पड़ते हैं। जबकि सनातन धर्म में माना जाता है कि 13 दिन तक आत्मा घर में रहती है। दिनेश शर्मा ने अनुरोध किया कि माता पिता की मृत्यु पर नौकरीपेशा लोगों को 13 दिन का अवकाश वेतन सहित दिया जाना चाहिए सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। सरकार इस पर कितना विचार करती है ये तो बाद की बात है लेकिन सांसद महोदय ने ऐसा विषय उठाया जिसके कारण हिंदू परिवारों में मुश्किलें आ रही हैं और ये भावनाओं से जुड़ा मामला भी है। दिनेश शर्मा ने हॉवर्ड बिजनेस रिपोर्ट का हवाला दिया कि शोक में डूबा हुआ व्यक्ति केवल 25 फीसदी काम कर पाता है। भले ही वो अपनी नौकरी पर लौट जाते हैं लेकिन उनका मन शोक में डूबा रहता है। उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले का हवाला भी दिया जिसमें अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत इसे अर्न्ड लीव में रखा है।
भाजपा के ही अन्य सांसद राधा मोहन अग्रवाल ने उन माता पिता की व्यथा को समझा जिनके बच्चे विदेशों में जाकर बस गए हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे वहां जा कर अपनी दुनिया में इतने मस्त हो जाते हैं कि माता पिता का ध्यान नहीं रखते। राधा मोहन अग्रवाल ने शून्यकाल में कहा कि माता पिता अपना घर जमीन बेच कर अपने बच्चों को विदेश भेजते हैं ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो सके। लेकिन यह बच्चे जब वहां नौकरी करने लगते हैं और नागरिकता ले लेते हैं फिर अपने माता को भूल जाते हैं। राधा मोहन ने कहा कि सरकार को ऐसे बच्चों के लिए कड़े कानून बनाने चाहिए हर 6 महीने बाद माता पिता स्थानीय प्रशासन को सर्टिफिकेट दें कि उनके बच्चे उनका ख्याल रख रहे हैं वृद्धावस्था में उनको किसी दूसरे से मदद नहीं लेनी पड़ रही है। जो बच्चे अपने माता पिता को पूरी तरह भूल जाते उनकी सुध नहीं लेते उनका पासपोर्ट सरकार को रदद कर देना चाहिए।
ये मामले किसी दल विशेष के नहीं है हर दल के नेताओं और समर्थकों को प्रभावित करते हैं ये मुद्दे धर्म से परिवार से समाज से जुड़े हैं। क्योंकि सांसद भी समाज से ही संसद में जाते हैं परिवार समाज की पीड़ा वे अच्छे से महसूस कर सकते हैं। अब ये नहीं पता कि जो मुद्दे वे संसद में रखते हैं उन पर सरकार कार्रवाई करती है या नहीं।