गुवाहाटी : असम की पांच वर्षीय हथिनी दुर्गा को तमिलनाडु के मदुरै स्थित मीनाक्षी अम्मन मंदिर ले जाया जा रहा है। उसके रविवार, 13 सितंबर की देर रात तक मदुरै पहुंचने की उम्मीद थी। तमिलनाडु वन विभाग ने पिछले सप्ताह दुर्गा को मंदिर ले जाने की अनुमति दी थी। हालांकि, इस स्थानांतरण को लेकर पशु कल्याण संगठनों और कार्यकर्ताओं ने गंभीर चिंता जताई है। दुर्गा के मंदिर पहुंचने से पहले जिला कैप्टिव एलिफेंट मैनेजमेंट कमेटी ने मंदिर परिसर का निरीक्षण किया था। समिति ने यह सुनिश्चित किया कि मंदिर में हथिनी के लिए कीचड़ में स्नान, पानी में नहाने और पर्याप्त घूमने-फिरने जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। निरीक्षण के बाद दुर्गा को मंदिर ले जाने के लिए नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किया गया।
असम से तमिलनाडु भेजे जाने वाले पांच हाथियों का मामला
दुर्गा का स्थानांतरण ऐसे समय हुआ है जब मद्रास हाई कोर्ट में असम से तमिलनाडु के विभिन्न मंदिरों को पांच हाथियों के दान और स्थानांतरण से संबंधित मामला चल रहा है। अदालत में बताया गया कि दुर्गा को मदुरै मीनाक्षी अम्मन मंदिर ले जाने की अनुमति मिल चुकी है। वहीं, चार अन्य हाथियों को तमिलनाडु के अलग-अलग धार्मिक संस्थानों में भेजने से जुड़े आवेदन अभी समीक्षा के अधीन हैं। इनमें तिरुवन्नामलाई के अरुणाचलेश्वर मंदिर, कांचीपुरम मठ, मयिलादुथुराई के वैद्यनाथ स्वामी मंदिर और रामेश्वरम के रामनाथस्वामी मंदिर शामिल हैं। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को इन चारों आवेदनों पर एक सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को निर्धारित की गई है।
कैप्टिव हाथियों को लेकर हाई कोर्ट का अहम फैसला
बंदी हाथियों के मंदिरों में रखे जाने को लेकर विवाद के बीच हाई कोर्ट ने इस महीने की शुरुआत में राज्य स्तर पर जारी उन निर्देशों को रद्द कर दिया था, जिनके तहत मंदिरों में कैप्टिव हाथियों को रखने पर रोक लगाने का प्रयास किया गया था। अदालत ने कहा था कि तमिलनाडु कैप्टिव एलिफेंट्स (मैनेजमेंट एंड मेंटेनेंस) रूल्स, 2011 में पहले से ही हाथियों के रखरखाव, सुरक्षा और स्थानांतरण के संबंध में आवश्यक प्रावधान मौजूद हैं। यह फैसला ललिता नाम की हथिनी से जुड़े मामले तथा तिरुचेंदूर मंदिर और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE) की ओर से दायर अपीलों के आधार पर आया था।
पशु कल्याण कार्यकर्ताओं ने जताई चिंता
हालांकि, दुर्गा के स्थानांतरण को लेकर पशु कल्याण कार्यकर्ताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं। पीपल फॉर कैटल इन इंडिया (PFCI) से जुड़े अरुण प्रसन्ना ने हथिनी के स्थानांतरण की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि दुर्गा का मालिक उसकी उचित देखभाल करने में सक्षम नहीं था, तो उसे जंगल जैसे क्षेत्र में फिल्माया क्यों गया था। कार्यकर्ताओं का कहना है कि पांच से दस वर्ष की उम्र के युवा हाथियों को लंबी दूरी तक स्थानांतरित करना उनके स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर असर डाल सकता है। उन्होंने हाथियों को मंदिरों को दान किए जाने के पीछे संभावित व्यावसायिक हितों की भी जांच की मांग की है।
युवा हाथियों के कल्याण पर उठे सवाल
पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यदि हाथियों की देखभाल करने वाले लोग युवा हाथियों को संभालने में सक्षम नहीं हैं, तो इससे उनकी माताओं और वयस्क हाथियों की देखभाल को लेकर भी चिंता पैदा होती है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी हाथी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने से पहले उसके स्वास्थ्य, उम्र, व्यवहार और दीर्घकालिक कल्याण का विस्तृत मूल्यांकन जरूरी है। लंबी दूरी का परिवहन विशेष रूप से कम उम्र के हाथियों के लिए तनावपूर्ण हो सकता है।
परंपरा बनाम पशु कल्याण की बहस
दुर्गा का मदुरै स्थानांतरण एक व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है, जिसमें एक ओर मंदिरों में हाथियों को रखने की धार्मिक परंपराएं हैं और दूसरी ओर बंदी हाथियों के अधिकार एवं कल्याण से जुड़े सवाल हैं। मंदिर प्रबंधन और समर्थकों का जोर हाथियों के लिए निर्धारित सुविधाओं और नियमों के पालन पर है, जबकि पशु कल्याण संगठन यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या केवल निर्धारित सुविधाएं पर्याप्त हैं या हाथियों के प्राकृतिक व्यवहार, सामाजिक जरूरतों और दीर्घकालिक स्वास्थ्य को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। दुर्गा के मदुरै पहुंचने के साथ ही अब उसकी देखभाल और मंदिर परिसर में रहने की व्यवस्था पर भी नजर रहेगी। वहीं, 16 सितंबर को मद्रास हाई कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई से असम से तमिलनाडु के अन्य चार हाथियों के प्रस्तावित स्थानांतरण को लेकर स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।