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कोलकाता की यादों में जीवित रहेंगी आशा भोसले

बंगाल की मिट्टी में रची-बसी थीं स्वर सरस्वती की जीवन

प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : स्वर कोकिला आशा भोंसले का बंगाल से रिश्ता केवल संगीत तक सीमित नहीं था, बल्कि यह शहर, संस्कृति और स्वाद से जुड़ा एक गहरा भावनात्मक संबंध था। आशा भोंसले का बंगाली संगीत से जुड़ाव 1950 के दशक से शुरू हुआ। उन्होंने बांग्ला गीतों और फिल्मों में अपनी आवाज़ दी और सचिन देव बर्मन, राहुल देव बर्मन, मान्ना दे और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। “चोखे चोखे कथा बोलो”, “आमार स्वप्नो तुमी” और “गुनगुना रहे हैं भंवरे” जैसे गीतों में उनकी बहुमुखी प्रतिभा झलकती है, जहां हिंदी और बांग्ला संगीत की सीमाएं घुलती नजर आती हैं।

राहुल देव बर्मन के साथ उनका रिश्ता खास था। कोलकाता में बिताए उनके दिनों की यादें—ढाकुरिया लेक के किनारे टहलना, गंगा किनारे बैठना और ‘झाल मुरी’ का स्वाद लेना—उनके जीवन के अनमोल पल थे। इन्हीं अनुभवों ने उनके संगीत को एक अलग गहराई दी।कोलकाता के मंचों पर उनका जादू हमेशा अलग नजर आता था। ‘बियॉन्ड बर्रिएरस’ जैसे आयोजनों में उन्होंने “ये मेरा दिल” से लेकर बांग्ला गीतों तक, हर अंदाज़ में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। इस शहर के दर्शकों के साथ उनका रिश्ता आत्मीय था, जहां हर प्रस्तुति एक उत्सव बन जाती थी।

बंगाल का खानपान भी उन्हें बेहद प्रिय था—मुरी, रसगुल्ला और संदेश का जिक्र वे बड़े चाव से करती थीं। उनके लिए कोलकाता एक ऐसा ठिकाना था, जहां कला, संस्कृति और जीवन एक साथ बहते हैं। आज जब उनकी आवाज़ खामोश हो गई है, तो कोलकाता की गलियों, गंगा की हवाओं और बंगाल के सुरों में उनकी यादें हमेशा गूंजती रहेंगी—एक ऐसी कलाकार की, जिसने इस शहर को सिर्फ गाया नहीं, बल्कि जिया।

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