न्यूयॉर्क : अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में पाकिस्तान को जोर का झटका दिया है। उसने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और उसकी आत्मघाती यूनिट मजीद ब्रिगेड पर प्रतिबंध के प्रस्ताव पर अपने 'वीटो अधिकार' का इस्तेमाल कर इस संगठन को आतंकी संगठनों की सूची में शामिल करने से रोक लिया। सुरक्षा परिषद की बैठक में चीन और पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को रखा था। दोनों देशों ने बीएलए को प्रतिबंधित करने की मांग की थी। पाकिस्तान ने बैठक के दौरान दावा किया था कि बीएलए और उसकी मजीद ब्रिगेड, अल-कायदा और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे आतंकी संगठन अफगानिस्तान की जमीन से काम कर रहे हैं और पाकिस्तान की सीमा में हमले कर रहे हैं।
अफगानिस्तान से फैल रहा यह आतंकवाद पाकिस्तान के लिए चुनौती बना हुआ है। बैठक में अमेरिका के साथ ब्रिटेन और फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव का विरोध कर दिया। इससे पहले अमेरिका ने ही पिछले महीने बीएलए और मजीद ब्रिगेड को विदेशी आतंकी संगठन (एफटीओ) घोषित किया था। बैठक के दौरान अमेरिका ने कहा कि बीएलए को अल-कायदा से जोड़ने के लिए तत्काल पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं। इसलिए से इसे संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध सूची में नहीं डाला जा सकता। बताया गया कि अगर किसी संगठन को इस सूची में शामिल कर दिया जाता है तो उसके पदाधिकारियों पर यात्रा प्रतिबंध के अलावा संपत्ति फ्रीज और हथियार खरीद पर रोक लगा दिया जाता है।
क्यों बनी बलूच आर्मी ?
जानकारी हो कि बलूचिस्तान में आजादी की मांग करने वाले कई संगठन हैं मगर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी बीएलए सबसे ताकतवर संगठन है। ये संगठन 70 के दशक में अस्तित्व में आया लेकिन 21वीं सदी में इसका प्रभाव बढ़ा है। बलूचिस्तान में कई लोगों का मानना है कि भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद वे एक आजाद देश के तौर पर रहना चाहते थे। लेकिन बिना उनकी मर्जी से उन्हें पाकिस्तान में शामिल कर दिया गया था। ऐसा नहीं हुआ इस वजह से बलूचिस्तान में सेना और लोगों का संघर्ष आज भी जारी है। बीएलए बलूचिस्तान को पाकिस्तानी सरकार और चीन से मुक्ति दिलाना चाहता है। उनका मानना है कि बलूचिस्तान के संसाधनों पर उनका हक है। पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को 2007 में आतंकी संगठनों की सूची में शामिल किया था।