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चकमा छात्र संगठन ने CHT और डेमागिरी के इतिहास पर रखी अपनी बात

ऐतिहासिक नक्शों, ब्रिटिश प्रशासनिक रिकॉर्ड और सरकारी अधिसूचनाओं का हवाला; डेमागिरी के नाम परिवर्तन पर भी दावा

आइजोल: ऑल-इंडिया चकमा स्टूडेंट्स यूनियन (AICSU) ने चिट्टागोंग हिल ट्रैक्ट्स (CHT) और मिजोरम के लुंगलेई जिले में स्थित त्लाबुंग के पुराने नाम डेमागिरी से जुड़े ऐतिहासिक और प्रशासनिक तथ्यों को लेकर एक बयान जारी किया है। संगठन ने कहा है कि इन दोनों मुद्दों पर जारी चर्चाओं को सोशल मीडिया दावों के बजाय ऐतिहासिक दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और प्रकाशित शोध के आधार पर देखा जाना चाहिए। AICSU ने अपने बयान में कहा कि ब्रिटिश काल में चिट्टागोंग हिल ट्रैक्ट्स का प्रशासन ऐतिहासिक रूप से तीन मान्यता प्राप्त प्रमुखों या राजाओं—चकमा, मोंग और बोहमांग—के अधीन था। संगठन के अनुसार, चकमा इस क्षेत्र की सबसे बड़ी पहाड़ी जनजाति थी, जबकि अन्य छोटे पहाड़ी समुदाय इन मान्यता प्राप्त राजाओं की प्रजा के रूप में रहते थे और कर अदा करते थे। संगठन ने कहा कि CHT के इतिहास को समझने के लिए उस दौर के प्रशासनिक ढांचे और विभिन्न समुदायों के बीच संबंधों को दस्तावेजों के आधार पर देखना जरूरी है।

16वीं सदी के नक्शे में ‘Chacomas’ का उल्लेख

AICSU ने चकमा समुदाय के ऐतिहासिक अस्तित्व से जुड़े पुराने कार्टोग्राफिक संदर्भों का भी हवाला दिया। संगठन के अनुसार, 1525 से 1550 के बीच पुर्तगाली नक्शानवीस डिएगो डी एस्टोर द्वारा तैयार बंगाल के एक नक्शे में कर्णफुली नदी के पूर्वी तट पर ‘Chacomas’ नाम दर्ज था। संगठन ने कहा कि यह नक्शा बाद में 1615 में जोआओ डी बैरोस की पुस्तक ‘Quarta Decada da Asia’ में प्रकाशित हुआ। AICSU के अनुसार, यह संदर्भ चकमा लोगों की ऐतिहासिक उपस्थिति से संबंधित शुरुआती कार्टोग्राफिक प्रमाणों में शामिल है। AICSU ने मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जांगखोंगम डौंगेल के शोध का हवाला देते हुए कहा कि ब्रिटिश हस्तक्षेप के बाद चकमा साम्राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक स्थिति में धीरे-धीरे बदलाव आया। संगठन के अनुसार, 1860 में ब्रिटिश प्रशासन ने प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए चकमा साम्राज्य को दो इकाइयों—चिट्टागोंग और चिट्टागोंग हिल ट्रैक्ट्स—में विभाजित किया। AICSU ने दावा किया कि चिट्टागोंग को बंगाल में एक नियंत्रित (regulated) जिले के रूप में शामिल किया गया, जबकि CHT को गैर-नियंत्रित (non-regulated) जिला बनाए रखा गया। संगठन के अनुसार, दोनों प्रशासनिक इकाइयों में उस समय चकमा आबादी वाले क्षेत्र मौजूद थे।

डेमागिरी नाम को लेकर भी ऐतिहासिक दावा

डेमागिरी के इतिहास को लेकर AICSU ने दावा किया कि यह शब्द मूल रूप से मिजो शब्द नहीं था। संगठन के अनुसार, डेमागिरी नाम ‘देवगिरी’ से निकला था, जिसे पाली के ‘देवा’ और ‘गिरी’ शब्दों से जोड़कर देखा जाता है। संगठन ने कहा कि ब्रिटिश प्रशासनिक दस्तावेजों में इस नाम की अलग-अलग वर्तनी मिलती है, जिनमें ‘Demagri’ और ‘Demagiri’ शामिल हैं। AICSU का दावा है कि ‘डेमागिरी’ नाम बाद में इस्तेमाल किए गए ‘तलाबुंग’ नाम से पुराना है। AICSU ने कहा कि 27 सितंबर 1973 को मिजोरम विधानसभा के चौथे सत्र के दौरान विधायक सैतलाउमा ने एक निजी सदस्य प्रस्ताव पेश किया था। संगठन के मुताबिक, इसी प्रस्ताव के बाद डेमागिरी का आधिकारिक नाम बदलकर तलाबुंग किया गया। संगठन ने इस दावे को ऐतिहासिक प्रशासनिक रिकॉर्ड के संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए कहा कि नाम परिवर्तन को भी उस समय के सरकारी दस्तावेजों के आधार पर समझा जाना चाहिए।

19वीं सदी में लुशाई कबीलों के विस्तार का उल्लेख

AICSU ने डेमागिरी क्षेत्र में लुशाई कबीलों की मौजूदगी से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों का भी उल्लेख किया। संगठन ने मेजर एंथनी गिलक्रिस्ट मैककॉल की 1949 में प्रकाशित पुस्तक Lushai Chrysalis का हवाला देते हुए कहा कि 19वीं सदी की शुरुआत तक सैलो लोगों का प्रवास और उसके बाद लुशाई कबीलों का एकीकरण डेमागिरी क्षेत्र तक फैल चुका था। इसके अलावा संगठन ने असम के पूर्व गवर्नर सर रॉबर्ट रीड की पुस्तक The Lushai Hills: Called from History of the Frontier Areas Bordering on Assam from 1883–1941 में दर्ज विवरण का भी उल्लेख किया। AICSU के अनुसार, रॉबर्ट रीड के विवरण में कहा गया है कि भौगोलिक रूप से डेमागिरी चिट्टागोंग हिल ट्रैक्ट्स के दायरे में आता था, लेकिन प्रशासनिक कारणों से 1892 में जारी एक आदेश के तहत इसे साउथ लुशाई हिल्स के अधिकार क्षेत्र में रखा गया। संगठन ने कहा कि बाद में 1 अप्रैल 1898 को भारत सरकार की घोषणा के माध्यम से डेमागिरी और आसपास के इलाकों को असम प्रशासन के अधीन कर दिया गया।

1879 की अधिसूचना का भी दिया हवाला

AICSU ने इतिहासकार अलेक्जेंडर मैकेंज़ी की पुस्तक The North-East Frontier of India और 30 जून 1879 को बंगाल सरकार की ओर से जारी इनर लाइन संबंधी अधिसूचना का भी उल्लेख किया। संगठन के अनुसार, उस अधिसूचना में निर्धारित सीमा तुलेनपुई या सुज्जुक नदी के साथ-साथ कर्णफुली नदी के संगम तक जाती थी। यह स्थान डेमागिरी के थोड़ा उत्तर में बताया गया था। AICSU का दावा है कि इस विवरण से उस समय डेमागिरी के CHT की भौगोलिक सीमा के भीतर होने का संकेत मिलता है। AICSU ने कहा कि उसके बयान में दिए गए सभी ऐतिहासिक संदर्भ प्रकाशित पुस्तकों, ब्रिटिश प्रशासनिक रिकॉर्ड और सरकारी अधिसूचनाओं पर आधारित हैं और ये सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। संगठन ने कहा कि CHT और डेमागिरी से जुड़े इन दोनों मुद्दों को लेकर उसके अनुसार कोई विवाद नहीं होना चाहिए। AICSU ने दावा किया कि इन ऐतिहासिक स्थितियों को दस्तावेजी प्रमाणों का समर्थन प्राप्त है और मिजोरम सरकार ने भी इन्हें स्वीकार किया है।

संगठन ने सभी संबंधित पक्षों से अपील की कि CHT और डेमागिरी के इतिहास को लेकर किसी भी चर्चा या दावे के दौरान उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड को प्राथमिक आधार बनाया जाए।

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