आर्कटिक स्कुआ की पहचान उसके अनोखे भोजन जुटाने के तरीके से होती है। यह अक्सर खुद शिकार करने के बजाय गल, टर्न और अन्य समुद्री पक्षियों का पीछा कर उन्हें पकड़ी हुई मछली या भोजन छोड़ने पर मजबूर करता है। इसके बाद स्कुआ तेजी से नीचे झपटकर वह भोजन उठा लेता है। इस व्यवहार को ‘क्लेप्टोपैरासिटिज्म’ कहा जाता है।
बर्डवॉचर्स सोसाइटी के कनाड बैद्य ने बताया कि देश के पश्चिमी तट पर इस पक्षी के कुछ रिकॉर्ड हैं, लेकिन पूर्वी तट पर यह बेहद दुर्लभ है। बंगाल में इससे पहले अक्टूबर 2019 में फ्रेजरगंज में बर्डर जयंत मन्ना ने इसे कैमरे में कैद किया था।
सुंदरवन के प्रकृतिविद और नाविक नित्यानंद चौकीदार ने बताया कि रविवार को पर्यटकों के साथ नाव से सुंदरवन की खाड़ियों में घूमने के दौरान उन्होंने इस पक्षी को मछली खाते देखा। बाद में तस्वीरों के आधार पर इसकी पहचान आर्कटिक स्कुआ के रूप में हुई।
फोटोग्राफर और टूर ऑपरेटर सौम्यजीत नंदी ने भी रविवार को पक्षी की तस्वीरें लीं। उन्होंने बताया कि सुंदरवन क्षेत्र में स्कुआ बेहद दुर्लभ है। मानसून और मानसून के बाद के शुरुआती दौर में ये पक्षी कभी-कभी प्रवासी पक्षी के रूप में या तूफान के कारण भटककर डेल्टा क्षेत्र में पहुंचते हैं।
आर्कटिक स्कुआ को ‘पैरासिटिक जेगर’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘जेगर’ जर्मन शब्द से आया है, जिसका अर्थ शिकारी होता है। यह नाम इसकी तेज और आक्रामक उड़ान के दौरान पीछा करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
यह पक्षी लंबी दूरी का प्रवासी है। इसका प्रजनन उत्तरी गोलार्ध के फेनोस्कैंडिया, स्कॉटलैंड, आइसलैंड, ग्रीनलैंड, उत्तरी कनाडा, अलास्का और साइबेरिया जैसे क्षेत्रों में होता है। इसके बाद यह दक्षिणी गोलार्ध के विभिन्न हिस्सों की ओर लंबी दूरी की यात्रा करता है।
सुंदरवन में इसका दिखना बंगाल के पक्षी प्रेमियों और प्रकृतिविदों के लिए खास महत्व रखता है, क्योंकि यह राज्य में आर्कटिक स्कुआ का अब तक का केवल दूसरा दस्तावेजीकृत रिकॉर्ड है।