कोलकाता : नाबालिग विवाह और किशोरियों के मातृत्व को लेकर बढ़ती चिंता के बीच राज्य स्वास्थ्य विभाग ने किशोरियों की गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद की देखभाल के लिए अलग मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने का फैसला किया है। स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखोपाध्याय के निर्देश पर इस एसओपी का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। इसके लिए नौ सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की गई है। समिति की पहली बैठक 18 सितंबर को स्वास्थ्य भवन में होगी।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, 19 वर्ष तक की गर्भवती महिलाओं को किशोरी प्रसूता के रूप में माना जाता है। कम उम्र में गर्भधारण करने पर प्रसूता में विभिन्न शारीरिक जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। इसका असर नवजात के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। ऐसे में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम करने के उद्देश्य से किशोरी प्रसूताओं के लिए अलग उपचार और निगरानी व्यवस्था तैयार करने की पहल की गई है।
हाल ही में मालदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 10 नवजातों की मौत की घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग के निरीक्षण में सामने आया कि मृत बच्चों की माताओं में पांच किशोरी प्रसूताएं थीं। इसके बाद किशोरियों में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान जोखिम को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने विशेष प्रोटोकॉल तैयार करने पर जोर दिया है।
प्रस्तावित एसओपी में गर्भवती किशोरी में जोखिम की समय रहते पहचान, नियमित एंटीनैटल जांच, एनीमिया और कुपोषण से निपटने, जरूरत पड़ने पर उच्च चिकित्सा केंद्र में रेफर करने, सुरक्षित प्रसव तथा प्रसव के बाद मां और नवजात की नियमित निगरानी जैसे विषयों को शामिल किए जाने की संभावना है।
एसओपी तैयार करने वाली समिति में कोलकाता मेडिकल कॉलेज अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के प्रमुख चिकित्सक देवाशीष दास के अलावा पांच स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ शामिल हैं। इनमें उलुबेरिया मेडिकल कॉलेज के संजय भट्टाचार्य, एनआरएस के सौरभ चट्टोपाध्याय, रायगंज मेडिकल कॉलेज की तुलिका झा, रामपुरहाट मेडिकल कॉलेज की शेली सेठ और अपोलो अस्पताल के भास्कर पाल शामिल हैं।
इसके अलावा मातृ स्वास्थ्य की उप-स्वास्थ्य निदेशक श्यामली रुद्र, परिवार नियोजन की प्रभारी अधिकारी शाश्वती नाग और पूर्व मेदिनीपुर की जनस्वास्थ्य एवं नर्सिंग अधिकारी सीमा माइती को भी समिति में रखा गया है।
समिति के सदस्यों के बीच विस्तृत चर्चा के बाद एसओपी को अंतिम रूप दिया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि किशोरी प्रसूताओं के लिए शुरुआती स्तर से जोखिम की पहचान और बेहतर निगरानी की व्यवस्था होने से मां और नवजात दोनों के स्वास्थ्य संबंधी जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।