मेघा, सन्मार्ग संवाददाता
हावड़ा : हावड़ा जिले की 16 विधानसभा सीटों में से 7 पर भाजपा की जीत ने इस बार के चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है। खासकर शहरी क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन चौंकाने वाला रहा, जहां बाली, हावड़ा उत्तर और शिवपुर जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को पराजित किया। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इन नतीजों के पीछे केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा स्थानीय असंतोष भी एक बड़ा कारण रहा। सबसे अहम मुद्दा रहा नगर निगम और पालिका चुनावों का लंबे समय तक नहीं होना। 2018 के बाद से हावड़ा नगर निगम और बाली नगर क्षेत्र के बीच परिसीमन (डिलिमिटेशन) को लेकर चल रहे विवाद ने प्रशासनिक कामकाज को प्रभावित किया। इसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ा।
मूलभूत सुविधाओं की कमी बनी बड़ा मुद्दा : शहर के कई इलाकों में टूटी सड़कें, जलजमाव और कचरे की समस्या लगातार बनी रही। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बार-बार शिकायत के बावजूद समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं किया गया। चुनाव के दौरान ये मुद्दे जनाक्रोश में बदलते दिखे।
हिंदीभाषी वोटर्स का निर्णायक रोल : हावड़ा उत्तर और बाली जैसे क्षेत्रों में हिंदीभाषी मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है। करीब 40 से लेकर 50 प्रतिशत हिंदीभाषी लोग रहते हैं। हालांकि कोई भी खुलकर कुछ भी नहीं कह रहा था परंतु इस बार के नतीजों से इन इलाकों में उनका झुकाव भाजपा की ओर साफ नजर आया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ पहचान और प्रतिनिधित्व की भावना ने भी इस वोटिंग पैटर्न को प्रभावित किया। वहीं शिवपुर इलाके में भी हिंदीभािषयों ने जमकर वोट डाले।
उम्मीदवारों के प्रयास भी पड़े हल्के : तृणमूल के उम्मीदवार कैलाश मिश्रा ने बाली क्षेत्र में टिकट मिलने के बाद सफाई अभियान और सड़क निर्माण जैसे कई कार्य शुरू किए थे लेकिन ये प्रयास देर से शुरू हुए और मतदाताओं के गुस्से को पूरी तरह शांत नहीं कर सके। हालांकि हावड़ा उत्तर के तृणमूल उम्मीदवार गौतम चौधरी ने भी लोगों के लिए कई परियोजनाओं पर काम किया परंतु हावड़ा उत्तर के रोड पर जगह जगह फैली गंदगी और टूटी सड़कों ने लोगों के वोटों असर डाल दिया।
सांसद की भूमिका पर भी उठे सवाल : हावड़ा के सांसद प्रसून बनर्जी को लेकर भी लोगों में नाराजगी देखी गई। विपक्ष का आरोप है कि सांसद क्षेत्र में सक्रिय नहीं रहे और विकास कार्यों में उनकी भागीदारी नजर नहीं आई। हालांकि तृणमूल समर्थकों का कहना है चुनाव प्रचार में भी सांसद कम नजर आ रहे थे। हालांकि कई योजनाएं प्रक्रियाधीन थीं, जिनका लाभ आने वाले समय में दिखेगा।
शहरी बनाम ग्रामीण वोटिंग पैटर्न : जहां शहरी क्षेत्रों में भाजपा को बढ़त मिली, वहीं ग्रामीण इलाकों में तृणमूल ने अपनी पकड़ बनाए रखी। इससे साफ होता है कि शहरी समस्याएं इस चुनाव में निर्णायक कारक बन गईं। दरअसल हावड़ा के नतीजे इस बात का संकेत हैं कि सिर्फ बड़े वादे नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सुविधाएं भी चुनावी जीत-हार तय करती हैं। निगम चुनावों में देरी, स्थानीय समस्याओं की अनदेखी और मतदाताओं के बदलते रुझान ने मिलकर इस बार का चुनावी समीकरण बदल दिया।