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हावड़ा के बाली में छिपा ऐतिहासिक रत्न : कुमार शिव मंदिर

दो प्राचीन अटचाला शैली में बने हैं जगदीश्वर शिव मंदिर और नकुलेश्वर शिव मंदिर क्रिस्टल-स्वच्छ पानी के लिए प्रसिद्ध था 146 साल पहले बने मंदिर के निकट मौजूद तालाब

मेघा, सन्मार्ग संवाददाता

हावड़ा : हावड़ा जिले के बाली क्षेत्र में स्थित कुमार शिव मंदिर आज भी बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक मंदिर वास्तुकला का जीवंत उदाहरण है। हुगली नदी के निकट पुराने मोहल्लों के बीच 15, काली प्रसन्न कुमार स्ट्रीट (पूर्व नाम सेन पाड़ा) पर एक ऊंचे चबूतरे पर बने ये जुड़वां मंदिर श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों को समान रूप से आकर्षित करते हैं। प्राचीन अटचाला शैली में बने हैं जगदीश्वर शिव मंदिर और नकुलेश्वर शिव मंदिर। मंदिरों के सामने स्थित विशाल तालाब को कुमार झील के नाम से जाना जाता है, जो कभी अपने क्रिस्टल-स्वच्छ पानी के लिए प्रसिद्ध था। स्थापत्य अभिलेख के अनुसार, इन मंदिरों की स्थापना करीब 146 साल पहले अर्थात 24 वैशाख 1286 बंगाब्द (8 मई 1879) को हुई थी। इस प्रकार ये मंदिर लगभग डेढ़ शताब्दी पुराने हैं। इनका निर्माण भैरव चंद्र कुमार के पुत्रों रामधन कुमार और कृष्णधन कुमार द्वारा कराया गया था और दोनों मंदिरों का उद्घाटन एक ही दिन संपन्न हुआ। पारंपरिक बंगाली अटचाला शैली में बने ये मंदिर अपनी अनूठी ईंट संरचना के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। मंदिर निर्माण में प्रयुक्त ईंटें अलग-अलग आकार और साइज की हैं, जिन्हें आवश्यकता के अनुसार विशेष रूप से ढाला गया था। यह विशेषता बंगाल के अन्य मंदिरों में विरले ही देखने को मिलती है। मंदिरों के भीतर कस्ठी पत्थर से निर्मित शिवलिंग स्थापित हैं, जिनकी पूजा केवल पुजारी द्वारा ही की जाती है। शिवरात्रि के अवसर पर भक्त लकड़ी के पात्र पर जल अर्पित करते हैं, लेकिन शिवलिंग को स्पर्श करने की अनुमति नहीं होती। समय के साथ मंदिरों की स्थिति कुछ हद तक जीर्ण-शीर्ण हो गई है। दीवारों पर वनस्पतियां उग आई हैं, हालांकि स्थानीय लोग हर वर्ष सफाई और रखरखाव का प्रयास करते हैं। इन मंदिरों से जुड़ी लोककथाएं भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि मंदिर के पीछे एक सफेद ‘वास्तु सांप’ रहता है, जो रक्षक की तरह है और किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। वहीं, कुमार झील के चारों ओर दीवार बनाने के प्रयास तीन बार विफल होने की कहानी भी लोगों के बीच रहस्य के रूप में प्रचलित है। आज भी बाली की गलियों में जब शाम ढलती है, तो दूर से घंटियों की आवाज आती है। पुराने लोग कहते हैं – ये मंदिर सिर्फ पत्थर के नहीं, ये जीवित हैं। यहां आकर मन को एक अजीब सी शांति मिलती है। शहर की भागदौड़ से दूर, समय जैसे ठहर सा जाता है। बाली की यात्रा कुमार शिव मंदिर के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। ये मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र हैं, बल्कि बंगाल की ऐतिहासिक विरासत, लोकविश्वास और पारंपरिक वास्तुकला की अनमोल धरोहर भी हैं।

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