गुरुग्राम में बनायी गयी आल्पना  
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कोलकाता की दुर्गा पूजा में बढ़ा आल्पना बनाने का ट्रेंड

दूसरे राज्यों में भी बंगाल के कलाकारों ने बनायी आल्पना

कोलकाता : दुर्गा पूजा की तैयारी के बीच पिछले कुछ वर्षों से कोलकाता में एक नया चलन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, आल्पना बनाने का। पारंपरिक आल्पना, जो चावल के घोल या रंग-बिरंगे पाउडर से बनाई जाती है, अब पंडालों और घरों की सजावट में एक खास पहचान बना रही है। पहले आल्पना मुख्य रूप से घर की देहरी, आंगन या पूजा स्थल तक सीमित रहती थी, लेकिन अब बड़े-बड़े पूजा पंडालों की थीम में भी इसका उपयोग किया जा रहा है। कई पूजा समितियों ने अपने पूरे पंडाल परिसर को आल्पना डिज़ाइन से सजाने की योजना बनाई है। न्यूटाउन सार्वजनिन पूजा पण्डाल के सामने बनायी गयी 500 फीट की आल्पना काफी सुर्खियां बटोर रही हैं। वहीं कोलकाता में टाला पार्क प्रत्यय के सामने भी आल्पना बनायी गयी है। केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी पण्डालों के सामने आल्पना बनाने के लिए बंगाल के कलाकारों की मांग बढ़ गयी है।

एआई जनरेटेड आल्पना ने खूब बटोरी सुर्खियां

न्यूटाउन सार्वजनिन पूजा पण्डाल के सामने एआई जनरेटेड आल्पना बनाकर अनिंदिता देव और उनकी टीम ने सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरी हैं। अनिंदिता देव समेत 20 कलाकारों की टीम ने मिलकर 5 दिनों में 500 फीट की आल्पना बनायी। अनिंदिता देव ने सन्मार्ग से कहा, ‘मैं पिछले 7 वर्षों से इस प्रोफेशन में हूं और हर तरह के स्ट्रीट आर्ट वर्क में इंटरेस्टेड हूं। एआई से डिजाइन का लेआउट और कांसेप्ट लिया गया और उसके बाद मेरी टीम ने लेआउट के आधार पर पेंटिंग की।’ हावड़ा के बाली की रहने वाली अनिंदिता देव ने बताया कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत इंटीरियर डिजाइनर के तौर पर की थी, लेकिन प्रोफेशन में आने के बाद उन्हें यह बात समझ में आयी कि असल में उनकी प्राथमिकता पेंटिंग है।

गुरुग्राम में बनायी गयी आल्पना

बंगीय परिषद गुरुग्राम (बीपीजी) ने सेक्टर 56 के पास वज़ीराबाद चौक को बंगाली परंपरा के रंगों से सजा दिया। इस वर्ष की दुर्गा पूजा के उपलक्ष्य में यहां विशाल अल्पना बनाई गई, जो बंगाल की पारंपरिक लोककला है और रंगोली से मिलती-जुलती है। करीब 15 फीट की इस कलाकृति को शुक्रवार रात 12 बजे से लेकर तड़के 3 बजे तक तैयार किया गया। इसे बनाने में करीब 100 स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया, जिनमें बच्चे, बुजुर्ग और युवा पेशेवर शामिल थे। बीरभूम के शांतिनिकेतन से गये आर्ट टीचर्स कल्याण और संगीता रॉय के मार्गदर्शन में ब्रश और रंगों से जटिल आकृतियों वाली यह अल्पना बनाई गई।

कलाकारों की बढ़ी मांग

स्थानीय कलाकार और कला-छात्रों की मांग इस कारण बढ़ गई है। कला महाविद्यालयों और डिज़ाइन इंस्टिट्यूट्स से जुड़े छात्र इस बार विभिन्न पूजा समितियों से जुड़े हैं और आधुनिक डिज़ाइन के साथ पारंपरिक आल्पना का संगम प्रस्तुत कर रहे हैं। सफेद पृष्ठभूमि पर रंग-बिरंगे फूल, पत्ते और पारंपरिक आकृतियों से सजे पंडाल न सिर्फ भक्तों बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित कर रहे हैं। कई जगहों पर लाइव आल्पना बनाने की प्रतियोगिताएं भी आयोजित हो रही हैं। ऐसा मानना है कि आल्पना का यह बढ़ता ट्रेंड बंगाल की सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का संकेत है। पहले जहां लाइटिंग और फैंसी सजावट का दबदबा था, वहीं अब लोग अपनी परंपरा से जुड़कर उसे आधुनिक रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

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