कोलकाता : नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान की गिरफ्तारी के बाद चुनाव लड़ने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। पुराने हत्या के मामले में शुक्रवार को गिरफ्तार किए गए मिलन प्रधान को शनिवार को अदालत में पेश किया गया। हालांकि, गिरफ्तारी के बावजूद उनका नामांकन रद्द नहीं होगा और जमानत नहीं मिलने की स्थिति में भी वह चुनाव लड़ सकते हैं।
चुनाव नियमों के अनुसार, केवल किसी मामले में गिरफ्तारी या जेल में होने से उम्मीदवार चुनाव लड़ने के अयोग्य नहीं हो जाता। यदि किसी उम्मीदवार को दो वर्ष या उससे अधिक की सजा नहीं हुई है, तो केवल लंबित आपराधिक मामले या गिरफ्तारी के आधार पर नामांकन खारिज नहीं किया जाता। ऐसे में मिलन प्रधान की गिरफ्तारी से उनकी उम्मीदवारी पर तत्काल कोई असर नहीं पड़ेगा।
उम्मीदवार के जेल में होने की स्थिति में पार्टी के नेता और कार्यकर्ता बाहर रहकर उसके पक्ष में प्रचार कर सकते हैं। इसके अलावा, जेल में बंद उम्मीदवार का रिकॉर्ड किया हुआ संदेश या भाषण भी जनसभाओं में प्रसारित किया जा सकता है, बशर्ते वह संबंधित चुनावी नियमों और जेल प्रशासन की अनुमति के अनुरूप हो। उम्मीदवार स्वयं जेल से बाहर निकलकर प्रचार नहीं कर पाएंगे, जब तक उन्हें इसके लिए कानूनी अनुमति न मिले।
भारत में पहले भी कई उम्मीदवार जेल में रहते हुए चुनाव लड़ चुके हैं। 1977 में गोपीबल्लभपुर विधानसभा सीट से संतोष राणा ने जेल में रहते हुए निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी।
1996 में अधीर रंजन चौधरी ने मुर्शिदाबाद की नवग्राम विधानसभा सीट से जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा था। उन्होंने वामपंथी उम्मीदवार को हराकर पहली बार विधानसभा चुनाव जीता था।
2016 में कामारहाटी विधानसभा सीट से मदन मित्र ने जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा था। हालांकि, वह चुनाव में 4 हजार से अधिक मतों से हार गए थे।
इसके अलावा 2023 के पंचायत चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार अनारुल हक उर्फ बिप्लब को मतदान के दिन गिरफ्तार किया गया था। इसके बावजूद उन्होंने चुनाव जीता था।