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हावड़ा ब्रिज : कोलकाता और हावड़ा को जोड़ने वाली दोस्ती की ऐतिहासिक कड़ी

मेघा, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : हावड़ा स्टेशन का नाम सुनते ही जिस भव्य संरचना की छवि सबसे पहले मानस पटल पर बनती है, वह है हावड़ा ब्रिज। आधिकारिक रूप से रवींद्र सेतु कहलाने वाला यह ब्रिज हुगली नदी पर स्थित है और दशकों से कोलकाता तथा हावड़ा के बीच संपर्क की सबसे मज़बूत कड़ी बना हुआ है। यह केवल एक यातायात मार्ग नहीं, बल्कि शहर की पहचान, इतिहास और विरासत का प्रतीक भी है।

नदी ही थी जीवनरेखा : प्रारंभिक दौर में हुगली नदी ही हावड़ा और तत्कालीन कलकत्ता को जोड़ने का मुख्य साधन थी। यात्रियों और माल की आवाजाही नौकाओं, घाटों और फेरी सेवाओं के माध्यम से होती थी। किंतु समय के साथ आबादी और व्यापार में वृद्धि हुई, जिससे नदी के पार एक स्थायी सड़क मार्ग की आवश्यकता महसूस होने लगी।

1854 में पड़ी स्थायी ब्रिज की नींव : वर्ष 1854 में पूर्वी भारत में पहली रेल सेवा के परीक्षण के दौरान अंग्रेज़ प्रशासन ने यह स्पष्ट किया कि हावड़ा और कलकत्ता के बीच एक स्थायी ब्रिज का निर्माण समय की मांग है। रेलवे यात्रियों की बढ़ती संख्या और असुविधा ने इस आवश्यकता को और अधिक गंभीर बना दिया।

पॉन्टून ब्रिज : एक अस्थायी समाधान : स्थायी ब्रिज के निर्माण से पहले हुगली नदी पर ‘पॉन्टून ब्रिज’ या ‘ब्रिज ऑफ बोट्स’ का उपयोग किया जाता था। वर्ष 1874 में ईस्ट इंडियन रेलवे के मुख्य अभियंता सर ब्रैडफोर्ड लेस्ली द्वारा डिजाइन किया गया यह ब्रिज कुछ समय तक यातायात का भार संभालता रहा, लेकिन 20वीं सदी के आरंभ तक यह व्यवस्था अपर्याप्त साबित होने लगी।

आधुनिक हावड़ा ब्रिज की योजना : बढ़ते यातायात दबाव को देखते हुए एक नए, मज़बूत और आधुनिक ब्रिज के निर्माण का निर्णय लिया गया। इसके लिए कैंटिलीवर तकनीक को चुना गया, जो उस समय इंजीनियरिंग की एक उन्नत मिसाल मानी जाती थी। ब्रिज का डिजाइन ब्रिटेन की प्रसिद्ध इंजीनियरिंग संस्था रेंडेल, पामर एंड ट्रिटन ने तैयार किया।

इंजीनियरिंग का अनोखा उदाहरण : हावड़ा ब्रिज अपनी निर्माण तकनीक के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है।

ब्रिज की कुल लंबाई लगभग 705 मीटर है।

मुख्य स्पैन की लंबाई 457 मीटर है।

इसमें दो लेन का चौड़ा सड़क मार्ग और दोनों ओर पैदल यात्रियों के लिए रास्ते हैं।

इस ब्रिज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके निर्माण में एक भी नट-बोल्ट का उपयोग नहीं किया गया, बल्कि पूरी संरचना को रिवेट्स से जोड़ा गया है। स्टील संरचना का निर्माण ब्रैथवेट, बर्न एंड जेसप कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा किया गया।

1943 में मिला नया सेतु : लगभग 3.33 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित हावड़ा ब्रिज को फरवरी 1943 में यातायात के लिए खोल दिया गया। तभी से यह ब्रिज कोलकाता और हावड़ा के बीच आवागमन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बना हुआ है और प्रतिदिन लाखों वाहन तथा पैदल यात्री इससे होकर गुजरते हैं।

फ़ेरी सेवा : नदी से अटूट रिश्ता : हावड़ा स्टेशन और हुगली नदी का संबंध केवल ब्रिज तक सीमित नहीं है। वर्ष 1854 से चली आ रही फेरी सेवा आज भी हजारों यात्रियों के लिए जीवनरेखा बनी हुई है। नदी के दोनों किनारों के घाटों को जोड़ने वाली यह सेवा उस बहु-मॉडल परिवहन व्यवस्था का उदाहरण है, जिसकी नींव डेढ़ सौ वर्ष पहले ही रख दी गई थी।

दो शहरों को जोड़ता एक सजीव सेतु : आज भी हावड़ा ब्रिज कोलकाता और हावड़ा के बीच न केवल भौगोलिक दूरी पाटता है, बल्कि यह समय, संस्कृति और लोगों के दिलों को जोड़ने वाला एक सजीव सेतु बना हुआ है। आगे जारी रहेगा।


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