कोलकाता : तकिया, सीटी, एयर कंडीशनर, प्रेशर कुकर, फ्रिज, ब्लैकबोर्ड, अलमारी, कैंची, बांसुरी, माइक्रोफोन और कोल्हापुरी चप्पल—चुनाव आयोग की ‘फ्री सिंबल’ सूची में रोजमर्रा के इस्तेमाल की कई वस्तुएं शामिल हैं। इस सूची में कुल 184 चुनाव चिह्न हैं, जिनमें घरेलू सामान से लेकर उपकरण और संगीत वाद्ययंत्र तक शामिल हैं।
जिन उम्मीदवारों या राजनीतिक दलों के पास कोई आरक्षित चुनाव चिह्न नहीं है, उनके लिए चुनाव चिह्न काफी महत्वपूर्ण होता है। चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, कोई भी चुनाव चिह्न ऐसा होना चाहिए, जिसे मतदाता तुरंत पहचान सकें, चुनाव प्रचार सामग्री पर आसानी से इस्तेमाल किया जा सके और अन्य चिह्नों से अलग पहचाना जा सके।
आयोग की सूची में कुर्सी, सोफा, प्रेशर कुकर, रेफ्रिजरेटर, डस्टबिन और रोड रोलर जैसे चिह्न शामिल हैं। इसके अलावा पारंपरिक रबर स्टांप के साथ आधुनिक कंप्यूटर माउस को भी सूची में जगह दी गई है।
चुनाव आयोग ने ऐसे प्रतीकों को सूची से दूर रखा है, जिनसे विवाद की संभावना हो सकती है। अधिकारियों के मुताबिक सूची में किसी भी जानवर का चित्र शामिल नहीं है। ऐसे सामान या वस्तुओं को भी शामिल नहीं किया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध तो हैं, लेकिन भारत में आम लोगों के बीच ज्यादा परिचित नहीं हैं। आयोग के अनुसार, चुनाव चिह्न का मुख्य उद्देश्य उम्मीदवार और मतदाता के बीच आसान दृश्य संवाद स्थापित करना है।
आयोग के अधिकारियों के मुताबिक बांसुरी ऐसा चिह्न है, जिसे कम से कम विवरण के साथ भी आसानी से पहचाना जा सकता है। माइक्रोफोन का संबंध सार्वजनिक भाषण से जोड़ा जा सकता है, जबकि टेलीस्कोप भविष्य की ओर देखने या नई संभावनाओं की खोज जैसे विचारों से जुड़ सकता है।
इसी तरह कैंची का आकार देखते ही आसानी से पहचाना जा सकता है। वहीं कंप्यूटर माउस आधुनिक वस्तु होने के कारण तकनीक आधारित छवि चाहने वाले चुनाव अभियानों के लिए उपयोगी दृश्य प्रतीक बन सकता है। आयोग समय-समय पर विशेषज्ञों की मदद से इन चुनाव चिह्नों की समीक्षा भी करता है।
हालांकि 184 चिह्नों की सूची में शामिल हर प्रतीक को हर उम्मीदवार किसी भी राज्य में चुन नहीं सकता। कुछ चिह्नों के इस्तेमाल पर विशेष राज्यों में प्रतिबंध हो सकता है। किसी चुनाव में किसी चिह्न की उपलब्धता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह पहले से किसी मान्यता प्राप्त या पंजीकृत राजनीतिक दल को आवंटित है या नहीं।
उम्मीदवारों और दलों को आमतौर पर अपनी पसंद के कई चुनाव चिह्नों का विकल्प देना होता है। इसके बाद चुनाव आयोग नियमों, उपलब्धता और मतदाताओं के बीच संभावित भ्रम जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अंतिम चुनाव चिह्न आवंटित करता है।