सनी देओल अभिनीत फिल्म ‘सूर्या: अंत से आरंभ तक’ के टीजर को लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) और एम्स दिल्ली के रेजिडेंट डॉक्टरों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि टीजर में पूरे चिकित्सा पेशे को भ्रष्टाचार से जोड़कर दिखाया गया है और इससे डॉक्टरों तथा स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसा को सही ठहराने का खतरा है। उन्होंने सामग्री की निष्पक्ष समीक्षा करने और लागू कानूनों के तहत तत्काल उचित सुधारात्मक कार्रवाई की मांग की है।
फिल्म में रवि किशन सहित कई अन्य कलाकार भी हैं। इसका टीजर सोमवार को जारी किया गया था, जबकि फिल्म 20 नवंबर को रिलीज होने वाली है। आईएमए ने अपने बयान में कहा, “डॉक्टर उपचार करने वाले हैं, न कि नफरत और हिंसा का निशाना।” संगठन के वित्त सचिव डॉ. पीयूष जैन ने कहा कि हजारों समर्पित डॉक्टर हर दिन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में करुणा, प्रतिबद्धता और त्याग के साथ मानवता की सेवा करते हैं।
डॉ. जैन ने कहा कि जहां भी किसी व्यक्ति की गलती या कदाचार साबित होता है, उसकी जांच कर कानून के अनुसार सजा दी जानी चाहिए। लेकिन कुछ लोगों के कृत्यों के लिए पूरे पेशे को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि रचनात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक है, लेकिन इसका इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। उन्होंने कहा, “डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा का महिमामंडन अस्वीकार्य है। इससे डॉक्टर और मरीज के रिश्ते की नींव माने जाने वाले भरोसे को नुकसान पहुंचने का खतरा है।” उन्होंने कहा, “डॉक्टरों को बदनाम करना बंद करें। उन लोगों की रक्षा करें, जो जीवन बचाते हैं।”
एम्स दिल्ली की रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) ने आरोप लगाया कि फिल्म का टीजर स्वास्थ्यकर्मियों पर शारीरिक हमलों को दिखाता और बढ़ावा देता है। संगठन के बयान के अनुसार, टीजर में नायक को अस्पताल परिसर के भीतर चिकित्सा कर्मियों पर गंभीर शारीरिक हमला करते हुए दिखाया गया है। एसोसिएशन ने यह भी आरोप लगाया कि टीजर के संवाद ऐसे कृत्यों को उचित ठहराते और बढ़ावा देते हैं।
आरडीए ने कहा कि सिनेमा जनधारणा और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करने का एक सशक्त माध्यम है। डॉक्टरों के खिलाफ भीड़ के न्याय और शारीरिक हमलों को सामान्य या महिमामंडित रूप में दिखाना जनता को खतरनाक संदेश देता है। एसोसिएशन के मुताबिक, इस तरह के सनसनीखेज चित्रण लोगों को गुमराह कर सकते हैं और देशभर में स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ पहले से ही चिंताजनक स्तर पर हो रही हिंसा को और बढ़ा सकते हैं। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी जीवन बचाने के लिए अत्यधिक तनावपूर्ण परिस्थितियों में काम करते हैं। ऐसे में हमलों को चिकित्सा संबंधी असंतोष की स्वीकार्य प्रतिक्रिया के रूप में दिखाना उनकी सुरक्षा, गरिमा और मनोबल को सीधे प्रभावित करता है।
एसोसिएशन ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और फिल्म निर्माताओं से तत्काल इन चिंताओं पर ध्यान देने और यह सुनिश्चित करने की अपील की कि फिल्म की सामग्री चिकित्सा समुदाय के खिलाफ हिंसा को न तो उकसाए और न ही उसे उचित ठहराए।
इस बीच, आईएमए की गुजरात शाखा ने भी केंद्र सरकार और सीबीएफसी से फिल्म की 20 नवंबर को प्रस्तावित रिलीज से पहले उसकी पूरी सामग्री की समीक्षा करने की मांग की है। इसमें संवाद, डॉक्टरों और स्वास्थ्य संस्थानों को दर्शाने वाले दृश्य तथा प्रचार सामग्री शामिल हैं। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में संगठन ने स्पष्ट किया कि उसे वास्तविक चिकित्सा लापरवाही दिखाए जाने पर आपत्ति नहीं है, बल्कि पूरे चिकित्सा पेशे को पूर्वाग्रहपूर्ण नजरिये से पेश किए जाने पर विरोध है।
गुजरात शाखा ने चेतावनी दी कि डॉक्टर पहले से ही अपने कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान धमकियों, डराने-धमकाने और शारीरिक हिंसा का सामना करते हैं। इस तरह का चित्रण स्वास्थ्य सेवाओं पर जनता के भरोसे को कमजोर कर सकता है और चिकित्सा पेशेवरों के प्रति शत्रुता बढ़ा सकता है। संगठन ने यह जांचने की मांग की कि फिल्म प्रमाणन संबंधी लागू दिशानिर्देशों का पालन करती है या नहीं। उसने आपत्तिजनक सामग्री में बदलाव और ऐसा डिस्क्लेमर जोड़ने जैसे कानूनी रूप से उचित कदम उठाने की मांग की, जिसमें स्पष्ट हो कि काल्पनिक आरोपों को स्थापित तथ्य न माना जाए। आईएमए की गुजरात शाखा ने यह भी कहा कि यदि कानून के तहत कार्रवाई के पर्याप्त आधार मिलते हैं, तो संबंधित अधिकारियों को आगे की कार्रवाई पर विचार करना चाहिए।