चतुर लकड़हारा चतुर लकड़हारा
मनोरंजन

चतुर लकड़हारा

बाल कथा

एक गांव में एक लकड़हारा था, जो लकडि़यां काटकर अपने परिवार का भरण पोषण करता था। वह रोज सुबह जंगल में जाता और दिन भर लकडि़यां काटता। शाम को लकड़ियों का गट्ठर बांधता व शहर बेचने चल देता और फिर खाने का राशन लेकर घर लौटता।

जंगल में जाते वक्त उसे काफी राहगीर मिलते, जो जंगल के रास्ते दूसरे गांव जाते थे। रोजाना कितने ही राहगीर उससे रास्ता पूछते और वह उन्हें रास्ता बताता।

एक दिन एक राहगीर ऐसा आया, जिसने लकड़हारे से रास्ता पूछने के बजाय उससे पूछा, ’’तुम जीवन में क्या चाहते हो?‘‘

लकड़हारे ने आश्चर्य से पीछे मुड़कर देखा तो एक लम्बे कद का बूढ़ापा, जिसकी बड़ी-बड़ी सफेद दाढ़ी, सफेद कपड़े व मुख पर तेज़ था। उसके इस प्रश्न ने लकड़हारे को हैरानी में डाल दिया।

जब लकड़हारे ने उस बूढ़े के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया तो उसने फिर पूछा, ’बोला, क्या चाहते हो तुम। जितना धन मांगोगे, तुम्हें मिलेगा।‘

लकड़हारे ने पूछा, ’कौन हैं आप?‘

’मैं इस जंगल का देवता हूं और तुम्हारे काम से बहुत खुश हूं। तुम मेहनती हो, ईमानदार हो, इसलिए मैं तुम्हें इन सबका इनाम देना चाहता हूं। बोलो कितनी दौलत चाहिए तुम्हें।‘

लकड़हारे ने जंगल के देवता को हाथ जोड़कर प्रणाम किया व बोला, ’बाबा, धन-दौलत का क्या है, आज है तो कल नहीं। फिर उसका क्या लालच करना।‘

’तो फिर अपने बच्चों के लिए अच्छा घर बार मांग लो।‘

’नहीं बाबा। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे मेहनत से काम करें। अगर आप उन्हें अच्छा घरबार दे देंगे तो वे कामचोर हो जाएंगे, इसलिए मैं यह आपसे नहीं मांगूगा।‘

’और क्या चाहिए तुम्हें।‘ बूढ़े ने उत्सुकतापूर्वक पूछा।

’बाबा, मुझे सब्र, संतोष व सुख समृद्धि दीजिए।‘

लकड़हारे की यह बात सुनकर जंगल का देवता बोला, ’तुमने तो मुझे ठग लिया। सब कुछ तो मांग लिया। खैर, तुम घर जाओ व सुखी रहो।‘ (उर्वशी)

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