बन गई बिगड़ी बात बन गई बिगड़ी बात
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बन गई बिगड़ी बात

बाल कहानी

नीरज के पिताजी कंजूस प्रवृत्ति के थे। यद्यपि उनकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी, फिर भी वे अपने नौकरों को बहुत कम वेतन देते थे। इसके साथ ही वे किसी पर विश्वास भी नहीं करते थे। एक दिन उन्हें कुछ आवश्यक काम से बाहर जाना पड़ा, उन्होंने नीरज से कहा-’मैं कल बाहर जा रहा हूं, इसीलिए तुम दुकान पर होशियारी से बैठना। दुकान छोड़कर इधर उधर मत घूमना।'

दूसरे दिन नीरज ने समय से दुकान खोली और होशियारी से लेन-देन करने लगा। शाम को अचानक उसे कुछ जरूरी काम से घर जाना पड़ा। घर जाते समय उसने दुकान के सबसे पुराने नौकर राजू से कहा-’तुम दुकान देखते रहो। मैं कुछ देर में आता हूं। वह घर गया और जल्दी ही वापस आकर दुकान पर बैठ गया। पिताजी बाहर से लौटे तो उसने एक परिचित ने उनसे कहा-'क्या कल आप बाहर गए थे?'

'हां, क्यों पूछ रहे हो?' पिताजी ने पूछा। उस आदमी ने कहा कि कल दुकान पर कोई नहीं बैठा था। यह सुनकर पिताजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि दुकान पर नीरज जरूर रहा होगा परन्तु उस आदमी ने कहा कि उसे अच्छी तरह से याद है कि दुकान पर उन दोनों में तो कोई नहीं था।

उस आदमी के जाने के बाद पिताजी ने राजू से पूछा। वह चुप रह गया। इस पर उन्होंने डांटते हुआ पूछा तो उसने बताया कि एक बार नीरज कुछ देर के लिए घर गया था। यह सुनकर पिताजी को नीरज पर बहुत गुस्सा आया। रात को दुकान बन्द करके वे घर गये तो नीरज से पूछा, 'उस दिन तुमसे दुकान पर बैठने के लिए कहा था या घूमने के लिए ?

नीरज ने बताया कि जरूरी काम होने की वजह से वह कुछ देर के लिए घर आया था परन्तु पिताजी उसकी बात से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने उसे फिर डांटा तो मां ने कहा, 'लड़का है। अगर कुछ देर के लिए घर चला आया तो क्या हो गया।'

पिताजी ने कहा, 'पता नहीं, राजू ने उतनी देर में कितना सामान बेचा और कितना रुपया बक्से में न रखकर अपने पास रख लिया।' मां ने कहा, 'आप बेकार परेशान हैं। राजू एक सच्चा और पुराना नौकर है। आज तक उसने कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे इसकी ईमानदारी पर शंक की जा सके।'

पिताजी चुप हो गए। दूसरे दिन उन्होंने राजू से पूछा कि उस दिन कितने रुपये का सामान बेचा था तो उसने कहा कि अब याद नहीं है। राजू के इस उत्तर से उनका शक और बढ़ गया। उन्होंने सोचा कि राजू ने जरूर कोई गड़बड़ी की होगी। अब वे इस बात को सोचकर दिन भर परेशान होते रहे। उन्होंने सोचा कि बेकार ही उस दिन मैं बाहर चला गया।

एक दिन पिताजी को बुखार आ गया परन्तु उन्होंने घर में किसी को नहीं बताया। वे सोचते थे कि डॉक्टर के पास जाऊंगा तो पैसा खर्च होगा परन्तु दो दिन बाद कमजोरी के कारण उन्हें सुबह उठने में देर हुई तो नीरज उनको जगाने गया। उसने देखा कि पिताजी का शरीर गर्म था। उसने कहा-’पिता जी, आपको बुखार है, परन्तु आपने हम लोगों को नहीं बताया।'

'अगर मैं बताता तो तुम लोग परेशान होते। बुखार है, दो-तीन दिन में अपने आप ही उतर जाएगा।‘ पिताजी ने कहा। नीरज ने डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा परन्तु पिताजी ने मना कर दिया। कुछ देर बाद उसने दुकान खोलने के बारे में पूछा तो पिताजी ने कहा कि दुकान बन्द रहेगी।

नीरज ने कहा, 'चाभी दे दीजिए, दुकान पर मैं बैठूंगा।' पिताजी ने कहा-'उस दिन जब मैं बाहर गया था तो तुम नहीं बैठ सके। अब क्या बैठोगे? जब मैं ठीक हो जाऊंगा तब बैठूंगा।' दूसरे दिन जब तबीयत और बिगड़ने लगी तो नीरज चुपचाप एक डॉक्टर को बुला लया। डॉक्टर साहब ने उन्हेें देखने के बाद कहा-'अगर एक दो दिन और नहीं दिखाते तो बीमारी काफी बढ़ जाती।' डॉक्टर ने दवा लिख दी। दूसरे दिन डॉक्टर साहब फिर देखने आए तो पिताजी ने उनसे पूछा 'आपने इतनी मंहगी दवा क्यों लिख दी ?'

'अगर आप पहले दिखा लेते तो सस्ती दवा से आराम मिल जाता। आपकी लापरवाही से बीमारी बढ़ गई और ऐसी दवा लिखनी पड़ी।' डॉक्टर साहब ने बताया।

डॉक्टर साहब की बात सुनकर पिताजी उदास हो गए। उनके जाने के बाद नीरज ने कहा, ’पिताजी, मैं कब से डॉक्टर को दिखाने के लिए कह रहा था, परन्तु आप नहीं माने। उधर कई दिनों से दुकान भी बंद है। अगर आप कहें तो कल से मैं दुकान खोलकर बैठा करूं। आप मुझ पर विश्वास कीजिए। मैं दुकान छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।‘‘

अब नीरज की मां ने कहा-'आपके अविश्वास के कारण कई दिनों से दुकान बन्द है जिससे नुकसान हो रहा है। इसी तरह कंजूसी के कारण आप कमजोर हो गए हैं। अगर शुरू में ही डॉक्टर को दिखाकर दवा ले लेते तो बीमारी नहीं बढ़ती। नौकरों पर अविश्वास करने से दुकान नहीं चल सकती। दूसरों पर विश्वास करना चाहिए।' अब पिताजी को उनकी बात समझ में आ गई और उन्होंने नीरज को दुकान खोलने की अनुमति दे दी। उन्होंने कहा कि बेकार ही राजू पर शक किया था। दुर्गा प्रसाद शुक्ल ’आज़ाद‘(उर्वशी)

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