श्यामू सियार नदी के किनारे-किनारे टहल रहा था। उसे बड़े जोर की भूख लग रही थी।
वह खाने की तलाश में जुटा हुआ था। घूमते हुए उसे दातादीन के खरबूजों की
क्यारियां दिखाई दे गईं। कितने बड़े क्षेत्र में बेलें फैलीं हुई थीं। पीले-हरे, मोटे, गोल,
मीठे खरबूजे चारों तरफ लगे हुए थे।
उनकी मीठी, सौंधी सुगंध श्यामू के नथनों में पहुंची तो उसके मुंह में पानी भर गया।
उसने खरबूजे खाने का फैसला कर लिया पर उसके सामने एक भयंकर समस्या थी
कि खरबूजों के खेत तक कैसे पहुंचे? बीच में नदी थी। इस पार वह और उस पार
खरबूजे। बीच में गहरी नदी और उसे तैरना आता नहीं था।
श्यामू एक पेड़ के नीचे बैठ गया। वह नदी पार करने की तरकीब सोचने लगा। कुछ ही
देर में उसने एक योजना बना ली। वह उठा और दौड़ता हुआ अपने मित्र लंबू ऊंट के
पास पहुंचा और बोला, ’लंबू भाई, चलो मेरे साथ। आज मैं तुम्हें खूब मीठे मीठे रसीले
खरबूजों की दावत दूंगा।
क्या कोई खास बात है, मित्र? ऊंट ने कहा। श्यामू बोला,’अरे, यार मित्र के साथ खाने में
जो मजा आता है, वह अकेले में कहां? लंबूजी प्रसन्न हो गए। दोनों मित्र नदी के
किनारे पहुंचे। लंबू ने श्यामू को पीठ पर बैठाया और लंबे-लंबे डग भरकर नदी पार
कर ली। वास्तव में श्यामू ने लंबू की पीठ पर सवार होकर नदी पार करने के लिए ही
लंबू को खरबूजे खाने का निमंत्रण दिया था।
उस पार पहुंचते ही श्यामू लंबू की पीठ से कूदा और खरबूजों के खेत में घुस गया। फिर
वह झटपट खरबूजे खाने लगा। लंबू ने अपनी गीली टांगों को फटकारा और फिर
आराम से खरबूजे खाने में जुट गया। श्यामू का पेट बहुत छोटा था। जहां दो-चार
खरबूजे अंदर गए, वह भर गया। श्यामू ने डकार ली। पांव से मुँह को पोंछा। फिर वह
लंबू के पास आकर बोला, ’चलो, लंबू यार।’लंबू ने कहा,’अभी तो मैंने खाना शुरू किया
है। इतनी जल्दी क्या है?’श्यामू बोला,’मेरा पेट तो भर गया है। ’लंबू ने कहा,’ पर मेरा
तो अभी खाली हैं।’
‘यार, पेट भर खाना खाकर मेरा मन गाना गाने को कर रहा है,’ कहकर श्यामू ने अपना
मुँह ऊपर उठा लिया। जैसे ही वह गाना गाने को हुआ, लंबू घबराकर बोला, ’ऐसा
गजब मत करना, श्यामू। अगर तुमने गाना गाया तो दातादीन आ जाएगा और हम
दोनों की डंडे से वह खातिर करेगा कि नानी याद आ जाएगी।
यार, लंबू, मैं क्या करूं? मैं तो आदत से लाचार हूं’, कहकर श्यामू ने
हुआ..........हुआ........हुआ’ का बेसुरा राग छेड़ दिया। दातादीन ने सियार की आवाज
सुनी तो उसकी नींद खुल गई। वह अपनी झोंपड़ी से बाहर आया। उसने अपना डंडा
उठाया और चारों तरफ देखा।
श्यामू सियार तो खिसककर नदी किनारे पहुँच गया था। उसे सियार तो नहीं, हां, लंबू
ऊंट दिखाई दे गया। दातादीन डंडा लेकर लंबू की ओर तेजी से झपटा। लंबू ने भागने
की बहुत कोशिश की लेकिन दातादीन के दो-तीन डंडे उसकी पीठ पर पड़ ही गए।
उसकी पीठ में दर्द हो रहा था। वह कराहता हुआ नदी से किनारे पहुंचा तो देखा
सियार मजे में रेत में लेटा हुआ है। एक तो पेट नहीं भरा, ऊपर से पीठ पर मार।
लंबू को श्यामू की धूर्तता तथा स्वार्थ पर क्रोध आ रहा था। उसकी समझ में आ चुका
था कि श्यामू असली मित्र नहीं है। उसने श्यामू को सबक सिखाने का फैसला कर
लिया। लंबू नीचे बैठ गया। श्यामू उसकी पीठ पर सवार हो गया। लंबू नदी पार करने
लगा। बीच धार में पहुंचकर वह बोला,’ श्यामू खरबूजे खाकर मुझे नदी में नहाना बड़ा
अच्छा लगता है।’ यह कहकर वह थोड़ा झुका तो श्यामू की जान निकल गई। वह
घबराकर बोला, ’ मित्र, ऐसा गजब मत करना वरना मैं तो डूब जाऊंगा।
’ मित्र, श्यामू, मैं क्या करूं? मैं तो अपनी आदत से लाचार हूं’, यह कहकर लंबू ने एक
गोता लिया तो श्यामू पानी में डुबकियां लेने लगा।
’बचाओ....बचाओ....मैं डूब रहा हूं’, श्यामू की चीख-पुकार सुनकर लंबू हंसा और बोला,
‘क्या बात है?’ श्यामू ने कहा, ‘तुम्हारी आदत से मेरी जान को खतरा हो गया है।’लंबू
बोला,’श्यामू, तुमने उस समय यह नहीं सोचा था कि तुम्हारे गाने की आदत के
कारण साथी की जान खतरे में पड़ सकती है।’ श्यामू गिड़गिड़ाया, ’मुझ से गलती हो
गई, मित्र । अब मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा।’
लंबू सीधा तनकर खड़ा हो गया। श्यामू पानी से ऊपर आ गया तो उसकी जान में जान
आई। लंबू बोला, ’मैं तुम्हें डुबाना नहीं चाहता था। मैं तो तुम्हें धमका कर तुम से यह
वादा कराना चाहता था कि मित्रों के साथ कभी विश्वासघात नहीं करना चाहिए।
’मैं समझ गया, मित्र। अब ऐसी गलती कभी नहीं करूंगा,’ सियार ने उत्तर दिया।
नरेंद्र देवांगन(उर्वशी)