दिशा झा लिपिका
मनोरंजन

मैं अपने विश्वास और अपने काम से हार नहीं मानती : दिशा झा

फिल्मकार प्रकाश झा की बेटी और फिल्म निर्माता दिशा झा से खास बातचीत

आप काफी समय से फिल्म इंडस्ट्री में हैं। अपने सफर के बारे में कुछ बताइए।

दिशा : मैंने अपने करियर की शुरुआत फिल्म राजनीति में कॉस्ट्यूम असिस्टेंट के तौर पर की थी। मेरा काम मुख्य रूप से कॉस्ट्यूम सुपरविजन और कंटिन्यूटी बनाए रखना था। यह मेरी पहली फिल्म थी और इसमें बहुत बड़ा स्टारकास्ट था, इसलिए सीखने के लिए बहुत कुछ था। उसके बाद मैंने अलग-अलग विभागों में काम करने की कोशिश की-जैसे असिस्टेंट डायरेक्शन, कलाकारों को कॉल करना, आर्ट डिपार्टमेंट में थोड़ा-बहुत काम करना। फिर फिल्म 'चक्रव्यूह' के दौरान मैंने प्रोडक्शन में कदम रखा और मुझे महसूस हुआ कि मुझे फिल्ममेकिंग का यही हिस्सा सबसे ज्यादा पसंद है।

आज प्रोडक्शन सिर्फ बजट संभालने तक सीमित नहीं है। यह पूरी तरह एक क्रिएटिव प्रोसेस है-स्क्रिप्ट डेवलपमेंट से लेकर राइटर्स रूम बनाना, कास्टिंग करना, शूटिंग, पब्लिसिटी और अंत में कंटेंट को प्लेटफॉर्म तक पहुंचाने तक हर चरण में आपकी भागीदारी होती है। मुझे यह काम बेहद संतोष देता है और मैं इसे बहुत पसंद करती हूं।

पहले फिल्मों का निर्माण अलग तरीके से होता था। आज के कॉर्पोरेट प्रोडक्शन सिस्टम को आप कैसे देखती हैं ?

दिशा : पहले फिल्मों का निर्माण काफी अलग तरीके से होता था । एक निर्माता फिल्म को फाइनेंस करता था और डिस्ट्रीब्यूशन अलग से संभाला जाता था। लेकिन अब, खासकर वेब सीरीज के मामले में, स्टूडियो शुरुआत से ही प्रोजेक्ट का हिस्सा बन जाते हैं ।

जैसे हमारे शो संकल्प में जियो स्टूडियोज शुरू से ही जुड़ गया था। इस वजह से पूरा सफर एक सहयोगी प्रक्रिया बन जाता है। जब कोई बड़ा प्लेटफॉर्म शुरुआत से साथ होता है तो काम करना आसान हो जाता है, क्योंकि किसी भी क्रिएटिव या तकनीकी दिक्कत में वे मार्गदर्शन देते हैं ।

यह मेरा पहला वेब शो था और मैं जियो की टीम की आभारी हूं कि उन्होंने मुझ पर भरोसा किया। इस प्रक्रिया में मैंने बहुत कुछ सीखा और कई अच्छे रिश्ते भी बने।

आपने फिल्मों और वेब सीरीज दोनों में काम किया है। दोनों में प्रोडक्शन का अनुभव कितना अलग होता है ?

दिशा : असल में कंटेंट बनाने की प्रक्रिया दोनों में काफी हद तक समान होती है। फर्क सिर्फ इस बात का है कि दर्शक उसे कहां देखते हैं। फिल्म के मामले में सबसे बड़ी खुशी यह होती है कि उसे थिएटर में बड़े पर्दे पर देखा जाएगा। वहीं वेब शो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होते हैं। अगर किसी स्टूडियो का सहयोग होता है, तो कुछ तय नियम और प्रक्रियाएं होती हैं-जैसे ब्रांड का इस्तेमाल, कानूनी पहलू और कुछ कंटेंट गाइडलाइंस लेकिन ये नियम रचनात्मकता में ज्यादा दखल नहीं देते, बल्कि कानूनी समस्याओं से बचाने के लिए होते हैं।

आपके पिता की फिल्मों में सामाजिक-राजनीतिक विषयों की गहरी झलक होती है। 'संकल्प' की कहानी किस तरह की है?

दिशा : 'संकल्प' पूरी तरह राजनीतिक कहानी नहीं है। यह कुछ हद तक चाणक्य और चंद्रगुप्त की कहानी से प्रेरित है।

इस शो की लेखिका ने एक दिलचस्प दुनिया और मजबूत किरदार रचे हैं। मूल रूप से यह बदले की कहानी है, जिसमें राजनीति सिर्फ एक पृष्ठभूमि के रूप में मौजूद है। जब दर्शक इसे देखेंगे तो उन्हें महसूस होगा कि यह एक अलग तरह की कहानी है।

शो में बदले की भावना एक अहम विषय है। व्यक्तिगत जीवन में आप बदले को कैसे देखती हैं ?

दिशा : शो में बदले की भावना इसलिए जरूरी है क्योंकि मुख्य किरदार, जिसे नाना पाटेकर निभा रहे हैं, एक समय पर अपमान और धोखे का सामना करता है। उसी के बाद वह बदले की भावना के साथ लौटता है और पूरी ताकत जुटाता है। लेकिन असल जिंदगी में मैं मानती हूं कि बदले की भावना से दूर रहना चाहिए। यह इंसान को भीतर से खा जाती है। सकारात्मक सोच और आगे बढ़ना ज्यादा जरूरी है।

नाना पाटेकर को एक मजबूत व्यक्तित्व वाले अभिनेता के रूप में जाना जाता है। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा ?

दिशा : नाना सर को लेकर अक्सर गलत धारणाएं बना ली जाती हैं। असल में वे बहुत मजाकिया और मिलनसार इंसान हैं।

उनका और मेरे पिता का रिश्ता कई साल पुराना है। जब उन्होंने स्क्रिप्ट सुनी तो उन्हें भरोसा था कि यह एक अच्छा प्रोजेक्ट होगा, इसलिए उन्होंने ज्यादा समय नहीं लिया । सेट पर वे बहुत समर्पित थे और अक्सर मजाक भी करते रहते थे। हर इंसान की तरह कभी-कभी उन्हें भी गुस्सा आ सकता है, लेकिन वह बिल्कुल सामान्य बात है। कुल मिलाकर उनके साथ काम करना बहुत अच्छा अनुभव रहा।

कुब्रा सैत भी इस शो में नजर आती हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा ?

दिशा : कुब्रा बेहद शानदार कलाकार हैं। शुरुआत में उनका किरदार सिर्फ एक गेस्ट अपीयरेंस था और हमें यह भी नहीं पता था कि वे इतनी छोटी भूमिका स्वीकार करेंगी या नहीं, लेकिन जब वे प्रोजेक्ट से जुड़ीं और हमने उनका काम देखा, तो हमें लगा कि उनका किरदार और बड़ा होना चाहिए। इसलिए लेखन के दौरान ही उनके रोल को विस्तार दिया गया। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस बहुत मजबूत है और वे अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि असल जिंदगी में वे अपने किरदार से बिल्कुल अलग हैं।

आजकल कुछ नए कलाकार गेस्ट अपीयरेंस करने से बचते हैं। इस बारे में आपकी क्या राय है?

दिशा : मुझे लगता है कि यह पूरी तरह व्यक्तिगत निर्णय है। हर कलाकार अपने करियर को लेकर एक अलग दृष्टिकोण रखता है। कुछ लोग मानते हैं कि लगातार काम करते रहना जरूरी है, चाहे भूमिका छोटी ही क्यों न हो। वहीं कुछ लोग बड़े और महत्वपूर्ण किरदारों का इंतजार करना पसंद करते हैं। हर किसी का करियर पथ अलग होता है, इसलिए यह फैसला कलाकारों पर छोड़ देना चाहिए।

आप एक “इंडस्ट्री इनसाइडर” मानी जाती हैं। इस बहस को आप कैसे देखती हैं?

दिशा : इंडस्ट्री में इनसाइडर होने से आपको शुरुआत में एक मौका जरूर मिल सकता है-जैसे टेबल पर एक सीट।

लेकिन उसके बाद की मेहनत और संघर्ष पूरी तरह आपका अपना होता है। पिछले दो सालों में मैंने और मेरी टीम ने कई स्टूडियो को अपनी कहानियां सुनाईं और कई बार हमें रिजेक्शन भी मिला । इस अनुभव से मैंने यही सीखा कि आपको अपनी कहानियों पर भरोसा रखना चाहिए । अगर एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुल सकता है। धैर्य और लगातार कोशिश करना बेहद जरूरी है।

आज आपकी सबसे बड़ी ताकत क्या है?

दिशा : मेरी सबसे बड़ी ताकत यह है कि मैं अपने विश्वास और अपने काम से हार नहीं मानती । इसके अलावा मुझे खुद पर, अपने काम पर और भगवान पर बहुत भरोसा है। यही विश्वास मुझे आगे बढ़ने की ताकत देता है।

आपने अपने माता-पिता से क्या-क्या सीखा है ?

दिशा : अपने पिता से मैंने अनुशासन और निरंतरता सीखी है। वे हर दिन एक तय दिनचर्या का पालन करते हैं-एक ही समय पर उठना, वही खाना, वही काम करने का तरीका। मैं अभी पूरी तरह वैसी नहीं बन पाई हूं, लेकिन कोशिश कर रही हूं । अपनी मां से मैंने यह सीखा है कि काम तभी करना चाहिए जब वह दिल से जुड़ता हो। वे कम काम करती हैं, लेकिन जो भी करती हैं, पूरी ईमानदारी और भावनात्मक जुड़ाव के साथ करती हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है-मैं वही काम चुनती हूं जो मुझे भीतर से छूता है।

आने वाले समय में आपके क्या प्लान हैं? आगे कौन-कौन से प्रोजेक्ट्स पर काम हो रहा है?

दिशा : आने वाले समय में कई प्रोजेक्ट्स लाइन-अप में हैं। बहुत जल्द 'आश्रम 4' आने वाला है। इसके अलावा 'राजनीति 2' पर भी काम शुरू होने वाला है। कुछ और वेब शो भी डेवलपमेंट के प्रोसेस में हैं और एक-दो छोटी फिल्में इस समय प्रोडक्शन में हैं । फिलहाल हमारी टीम काफी व्यस्त है, लेकिन इस समय मेरा पूरा ध्यान 'संकल्प' पर है। मैं उम्मीद करती हूं कि दर्शक इसे उतना ही प्यार देंगे जितना उन्होंने 'आश्रम' को दिया था, बल्कि उससे भी ज्यादा।

आपके पिता एक बड़े और अनुभवी फिल्मकार हैं। वे आपके काम से कितने संतुष्ट हैं?

दिशा : मुझे लगता है कि वे अभी मेरे काम से काफी संतुष्ट हैं। वे हमेशा मुझे यही कहते हैं कि जो भी काम करो, उसमें खुश रहो और स्वस्थ रहो।

जहाँ तक प्रोडक्शन की बात है, मैं बहुत सख्त प्रोड्यूसर नहीं हूं। कई बार जब बिल आते हैं तो मैं तुरंत साइन कर देती हूं और मेरी प्रोडक्शन टीम मुझे कहती है कि मुझे थोड़ा ज्यादा सावधान होना चाहिए। लेकिन मैं मानती हूं कि अगर काम अच्छा हो रहा है तो उसे सपोर्ट करना चाहिए।

अंत में दर्शकों से 'संकल्प' के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?

दिशा : 'संकल्प' ओटीटी पर चल रहे बाकी शोज़ से काफी अलग है। इसमें बहुत ज्यादा हिंसा या मार-धाड़ नहीं है। यह एक साफ-सुथरी और पारिवारिक कहानी है जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देख सकता है। मैं बस यही चाहूंगी कि दर्शक इस शो को देखें और इसे उतना ही प्यार दें जितना उन्होंने 'आश्रम' को दिया था-शायद उससे भी थोड़ा ज्यादा। -लिपिका वर्मा

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