पीले पत्ते Ai
मनोरंजन

पीले पत्ते

कहानी

होली के बाद आज सुबह सवेरे पार्क में फिर से पहले जैसी चहल पहल थीं। कई दिन बाद हमेशा की तरह महिलाओं का ग्रुप पार्क में वॉक करने के लिए आया हुआ था। ये सभी पार्क के आस पास ही अपने फ्लैट्स या घरों में रहती थीं और ज्यादातर सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिक थीं। इसलिए उन्हें सुबह के समय काम की ज्यादा चिंता नहीं रहती थी। वे एक साथ घूमने के अलावा किताबों की, कविताओं की, फिल्मों की, कहानियों की, शहर में होने वाली हर साहित्यिक, मनोरंजक गतिविधि की या फिर प्रतियोगिताओं और एग्जीबिशन की बातें साझा करने के साथ-साथ एक दूसरे के सुख दुख की साथी भी थीं। ये महिलाएं हर त्यौहार के बाद यहीं पर मिलजुल कर उस पर्व का आनंद लेती थीं। इनमें से ज्यादातर के बच्चे शहर से दूर या विदेश रहते थे इसलिए इस उम्र में वे अपने पति के साथ या फिर अकेले ही रह रहीं थीं। 

अभी दो दिन पहले ही होली का त्यौहार सभी के घरों में पूरे उल्लास से मनाया गया था। रीता, शालिनी, माधुरी जी के अलावा और भी कई महिलाओं के घर में बच्चों के आने से पूरी रौनक हो गई थी। बच्चों के आने की तैयारी और उनकी पसंद की मिठाई बनाने जैसे कामों की व्यस्तताओं में कुछ दिन से उन सभी को पार्क में आने का समय नहीं मिला था। लेकिन त्यौहार खत्म होते ही बच्चे वापस चले गए और घर फिर पहले जैसे ही सूने हो गए थे। त्यौहार के बाद होली मिलन के लिए, अपनी बनाई मिठाई और थोड़े से सूखे रंग साथ ले कर आईं इन महिलाओं के चेहरे पर, एक दूसरे से मिल कर, थकान की जगह उत्साह फिर से लौट आया था। एक दूसरे को गुलाल लगाते, गुझिया, मठरी, कांजी बड़े के साथ घर की बनी मिठाइयों का स्वाद लेते हुए अचानक शालिनी को याद आया कि लता जी को बहुत दिनों से नहीं देखा। ‘वे अकेली रहती हैं ना, शायद उनके बच्चे भी होली पर नहीं आए थे ‘रमा जी ने बताया।’ कहीं तबीयत तो खराब नहीं है, उन्हें तो अस्थमा भी है। चलो उनके घर चलते हैं’ रीता के चिंता प्रकट करते ही सभी उठकर तुरंत लता जी के घर के लिए चल दिए। 

घंटी बजाने के कुछ देर बाद जब दरवाजा खुला तो रीता की आशंका सही साबित हुई। लता जी को अस्थमा का अटैक हुआ था। ‘तुम इतनी बीमार हो, बताना चाहिए था ना, हम लोग आकर सम्भाल लेते। एक फोन तो कर सकतीं थीं, हम सब इतने पराए तो नहीं हैं’ माधुरी जी ने अपने से उम्र में काफी छोटी लता जी के बीमार और पीले पड़े चेहरे को देख कर प्यार से झिड़की देते हुए कहा। लता जी को बहुत कमजोरी आ गई थी और अभी भी सांस लेने में काफी तकलीफ थी। सभी महिलाओं ने मिलकर घर का मोर्चा संभाल लिया। घर की हालत देख कर लग रहा था कि कई दिन से कामवाली बाई भी नहीं आई थी। कुछ ही देर में घर और रसोई को व्यवस्थित करके लता जी के लिए गरमा गरम खिचड़ी और सब के लिए चाय तैयार हो गई। इतने में मीता ने ड्रेसिंग टेबल से कंघा उठाया और लता जी के बालों को सुलझा कर ढीली सी चोटी बना दी। माधुरी जी ने लता जी को गुलाल का छोटा सा टीका लगाया और फिर उदासी में लिपटे उनके घर को, सबकी हंसी ने गुलजार कर दिया। माहौल बदलने से कुछ देर पहले की मायूस लता जी के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई। 

इन सब के बीच, अब लता जी खुद को काफी स्वस्थ महसूस कर रही थीं। मैंने तो मान लिया था कि मैं पतझड़ के पीले पत्ते के समान हो गई हूं। बस, अब कभी भी, अपनी तन्हाई और बीमारी में बेआवाज झड़ जाऊंगी। किसी को पता भी नहीं चलेगा। पर आप लोगों ने मिलकर मुझे फिर से जीवंत कर दिया ‘आंसू भरी आंखों से कहते हुए लता जी के चेहरे पर कृतज्ञता का भाव साफ दिखाई दे रहा था।’ आगे से कभी खुद को अकेला और पीला पत्ता मत समझना, अभी तो हम स्वस्थ हैं। ये तो जीवन के उतार चढ़ाव हैं, आते जाते रहते हैं। अपनी परेशानियों और बीमारियों से घबराकर अगर दिल को छोटा करोगी तो सचमुच ही असमय मुरझा जाओगी। हम सब हैं ना। होली पर थोड़े व्यस्त जरूर हो गए थे पर अलग थोड़े ना हुए थे। फोन कर के बता दिया होता तो पहले ही आ जाते। याद है ना, जब मेरे पांव में फ्रैक्चर हो गया था तो तुम सब ने मुझे कैसे संभाला था। मुझे कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि मैं अकेली हूं। मेरे बेटे बहू तो आज भी तुम लोगों की तारीफ करते हुए कहते हैं कि मम्मी, आप की फ्रेंड्स के कारण हमें आपकी चिंता नहीं रहती। फिर हर छोटी समस्या में बच्चों को परेशान भी नहीं किया जा सकता ना। उनकी भी अपनी नौकरी और व्यस्तताएं हैं। वो लोग भी कितने दिन आकर रह सकते हैं हमारे पास। ये तो सच है कि अपना कोई साथ हो तो हौसला बना रहता है, जीने का भी और खुश रहने का भी। पर हम सब भी तो परिवार की तरह ही हैं। अब तुम्हारी देखभाल करना हम सब की जिम्मेदारी है। आओ सखियों, सभी मिल कर इस पीले पत्ते को कसकर पकड़ लें, कहीं गिर ना जाए‘ कहते हुए माधुरी जी ने लता जी से मजाक किया। ‘और हां, जल्दी से स्वस्थ हो जाओ, आपके हाथ के बने बढ़िया दही बड़े खाने का इंतजार रहेगा’ रमा ने कहा।’ आपकी मधुर आवाज में गीत भी तो सुनना है’ नीलिमा जी ने गीत गुनगुनाते हुए याद किया। फिर माधुरी जी के साथ सभी महिलाओं ने लता जी का हाथ प्यार से थाम लिया और पूरे घर में उन सब की खिलखिलाती हंसी बिखर गई। -डॉ.शिखा अग्रवाल-सुमन सागर

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