सनी और मनी नाम की दो बतखें तालाब में तैर रहीं थीं। ‘कितना सुहावना मौसम है। गुनगुनी धूप, हरीहरी घास और तालाब के आसपास खिले फूल मुझे तो सनी दीदी, अपना यह तालाब बहुत अच्छा लगता है।
हां, मनी, तुम्हारा खयाल ठीक है, पूरे इलाके में इस तालाब का कोई जबाव नहीं, सनी बतख ने बताया।
लेकिन दीदी, गनी बतख तो हर समय इस तालाब की बुराई करती रहती है। कहती है ऐसे तालाब में क्या रहना जहां दिन रात मेंढक टर्र टर्र लगाए रहते हों।
लेकिन बिना मेंढक का तालाब मिलेगा कहां? ‘सनी ने पूछा।
इसी बीच गनी बतख तैरती आती दिखाई दी। उस के करीब आने पर सनी बोली, ‘क्यों गनी, सुना है तुम और कहीं जा रही हो?
ठीक ही सुना है सनी, मैं तो एकांत में रहना चाहती हूं। मुझे न तो मेंढकों की टर्र टर्र पसंद है और न तुम लोगों की क्वाक क्वाक, गनी ने मुंह बना कर कहा।
‘लेकिन तुम जाओगी कहां? मनी पूछ बठी।
अच्छी जगहों की कमी नहीं है। मैं कहीं भी अपना घर आसानी से बना कर मजे से रहूंगी, गनी बोली और चली गई।
गनी एक बाग में पहुंची। उस ने सोचा, इस बाग में किसी पेड़ के नीचे घर बनाना ठीक रहेगा।
वह जगह खोज ही रही थी कि सुन्नी गिलहरी आ धमकी। बोली, ‘यहां क्या कर रही हो, बतख रानी?’
‘मैं यहां अपना घर बनाऊंगी, बहन’, गनी ने बताया।
यहां? अरे, गनी बहन, यह तुम्हारा तालाब नहीं है। यहां तो चालाक लोमड़ी रात दिन चक्कर काटती है। तुम्हें पेड़ पर घर बनाना चाहिए।
लेकिन मैं तो आज तक जमीन पर ही घर बनाती आई हूं, गनी बोली।
ठीक है, लेकिन यहां तो तुम पेड़ पर ही अपना घर बनाओ, नहीं तो लोमड़ी तुम्हें खा जाएंगी। सुन्नी ने गनी को समझाया।
गनी मान गई। वह पेड़ पर चढ़ने का प्रयास करने लगी लेकिन चढ़ नहीं पाई, गिर गई।
बोली, नहीं, सुन्नी बहन, मैं पेड़ पर अपना घर नहीं बना सकती। लगता है मुझे कोई और जगह तलाश करनी होगी, और वहां से चली गई।
वह एक खेत में पहुंची।
‘हां’ यह खेत अच्छा है। यहीं घर बनाऊंगी, गनी ने सोचा।
वह खेत में खड़ी इधर उधर देख रहीं थी। तभी टैटू चूहा दिखाई दिया।
बतख रानी इस खेत में क्या कर रही हो? टैटू दूर से चिल्लाया।
‘मैं इस खेत में अपना घर बनाऊंगी, टैटू भाई, गनी ने बताया।
घर और इस खेत में? क्या कहती हो गनी बहन। यहां तो तुम्हें चालाक लोमड़ी चट कर जाएगी, टैटूू ने उसे सतर्क किया।
सभी जगह लोमड़ी का डर है। फिर कहां घर बनाऊं, गनी ने मुंह फुल्लाकर कहा।
तुम्हें घर जमीन के अंदर बनाना चाहिए। आओ, मैं तुम्हें अपने बिल में ले चलूं।
गनी उस के पीछे पीछे गई। टैटू बिल में घुस गया। गनी ने बिल में घुसने की बहुत कोशिश की लेकिन केवल उस का सिर ही घुस पाया।
तभी पीछे से आवाज आई, यहां क्या हो रहा है, गनी?
गनी ने देखा, चालाक लोमड़ी दांत निकाले खड़ी थी।
गनी के रोंगटे खड़े हो गए। हिम्मत कर के बोली, मैं अपना घर बना रही हूं, मौसी।
‘हां, हां, बनाओ। यहां तो बड़ी अच्छी जगह है, कहती हुई लोमड़ी आगे बढ़ गई।
लेकिन अब मैंने अपना विचार बदल दिया है, कहती हुई गनी वहां से भाग खड़ी हुई।
तालाब ही सब से अच्छी जगह है, वह सोच रही थी। गनी हांफती हुई तालाब में उतरी। तभी सनी और मनी बोली, क्यों, गनी, तुम लौट क्यों आई?
क्या कहूं दीदी, बाहर तो हर जगह खतरा है। सचमुच अपने तालाब जैसी कोई जगह नहीं।
देखो, मनी, मैंने कहा था न कि अपने इस तालाब का कोई मुकाबला नहीं, सनी बोली। नरेंद्र देवांगन(उर्वशी)