सबसे पहले हमें राजनी की बारात के बारे में बताइए। यह कैसी फिल्म है?
उल्का गुप्ता : राजनी की बारात पूरी तरह बिहार और मिथिला की संस्कृति से जुड़ी हुई फिल्म है। मैं हमेशा कहती हूँ कि इस फिल्म में बिहार और मिथिला सिर्फ बैकड्रॉप नहीं हैं, बल्कि कहानी की आत्मा हैं। मिथिला की गर्मजोशी, परंपराएँ, सादगी और भावनाएँ ही इस फिल्म को खास बनाती हैं। मैं इसमें राजनी का किरदार निभा रही हूँ और उसके सफर के जरिए दर्शकों को मिथिला संस्कृति की खूबसूरती, ताकत और मिठास देखने को मिलेगी।
इस प्रोजेक्ट के लिए आपने हाँ क्यों कहा?
उल्का गुप्ता : मैंने हिंदी, तेलुगु, बंगाली और मराठी इंडस्ट्री में काम किया है, लेकिन लोग अक्सर पूछते थे कि मैंने बिहार से जुड़ा कोई प्रोजेक्ट क्यों नहीं किया। मैं हमेशा सोचती थी कि जब सही कहानी मिलेगी तभी करूँगी। जैसे ही यह प्रोजेक्ट मेरे पास आया, मैं उससे तुरंत जुड़ गई क्योंकि मेरी जड़ें मिथिला से हैं, भले ही मेरा जन्म और परवरिश मुंबई में हुई हो। इस फिल्म ने मेरी बचपन की कई यादें और भावनाएँ ताजा कर दीं।
आपने अलग-अलग इंडस्ट्री में काम किया है। बिहार में शूटिंग का अनुभव कैसा रहा?
तनाया आडारकर : सच कहूँ तो यह एक शानदार अनुभव था। लोग अक्सर बिहार को लेकर कई गलत धारणाएँ रखते हैं, लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग है। वहाँ के लोग बेहद गर्मजोशी वाले, मददगार और सीखने के इच्छुक हैं। हमने पूरी शूटिंग रियल लोकेशन्स पर की, यहाँ तक कि असली पुलिस स्टेशन में भी शूट किया। एक बार जब हम बाहर शूट कर रहे थे, तब लॉकअप में सचमुच चोर बंद थे! हमने वहीं मेरे बेटे का जन्मदिन भी मनाया और बाद में लॉकअप के अंदर के लोगों ने मजाक में केक भी माँगा।
बतौर प्रोड्यूसर यह आपका डेब्यू है। कितना चुनौतीपूर्ण रहा?
तनाया आडारकर : बहुत चुनौतीपूर्ण, क्योंकि इंडिपेंडेंट सिनेमा की अपनी अलग मुश्किलें होती हैं। हमारे पीछे कोई बड़ा बैनर नहीं था, इसलिए हर दिन और हर बजट मायने रखता था। इस फिल्म की खास बात यह भी है कि हमने इसे खुद प्रोड्यूस और डिस्ट्रीब्यूट किया। हमने इंडिपेंडेंट फिल्मों को सपोर्ट करने के लिए अपनी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी भी शुरू की, क्योंकि कई अच्छी फिल्में सिर्फ डिस्ट्रीब्यूशन सपोर्ट की कमी के कारण दर्शकों तक नहीं पहुँच पातीं।
शुरुआत में कहानी में ऐसा क्या था जिसने आपको आकर्षित किया?
तनाया आडारकर : हमारे डायरेक्टर आदित्य अमन ने मुझे कहानी की एक लाइन सुनाई - एक ऐसी प्रेम कहानी जहाँ लड़का अपने रिश्ते के लिए खड़ा नहीं हो पाता और तब लड़की खुद निडर होकर जिम्मेदारी उठाती है। बस वही सुनकर मैं तैयार हो गयी। यह कहानी नई, बोल्ड और वास्तविक लगी।
उल्का, आपका किरदार काफी निडर और मजबूत लगता है। क्या आप खुद उससे जुड़ाव महसूस करती हैं?
उल्का गुप्ता : हाँ, मुझे लगता है कि मैं असल जिंदगी में भी काफी बोल्ड हूँ। मेरा हमेशा मानना रहा है कि मजबूत महिला किरदारों को ईमानदारी से दिखाया जाना चाहिए। आज की महिलाएँ आत्मविश्वासी और निडर हैं, और दर्शक उसी सच्चाई से जुड़ते हैं।
आपने हाल ही में किसी दूसरे प्रोजेक्ट में पहली बार किसिंग सीन करने की बात कही थी। क्या वह फैसला मुश्किल था ?
उल्का गुप्ता : हाँ, क्योंकि मैं एक पारंपरिक परिवार से आती हूँ और पहले ऐसे सीन से हमेशा बचती थी। मैंने कुछ अच्छी स्क्रिप्ट्स भी सिर्फ इसी वजह से छोड़ दी थीं। लेकिन उस प्रोजेक्ट को नागेश कुकुनूर सर डायरेक्ट कर रहे थे और स्क्रिप्ट बेहद संवेदनशील और खूबसूरती से लिखी गई थी। मुझे सच में लगा कि वह सीन कहानी के लिए जरूरी था, सिर्फ सनसनी के लिए नहीं। संवेदनशीलता और अश्लीलता के बीच बहुत बारीक फर्क होता है, और उस स्क्रिप्ट ने उसे बहुत खूबसूरती से संभाला।
क्या आपके परिवार ने इस फैसले में आपका साथ दिया?
उल्का गुप्ता : बिल्कुल। मैंने हाँ कहने से पहले अपने पिता से बात की थी। मैं यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि मैं भावनात्मक और प्रोफेशनल तौर पर सहज हूँ। आखिरकार मुझे लगा कि उस कहानी के लिए यह सही क्रिएटिव फैसला था।
इंडिपेंडेंट फिल्म सेटअप में उल्का के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
तनाया आडारकर : वह शानदार थीं। इतनी स्थापित अभिनेत्री होने के बावजूद उनमें बिल्कुल भी स्टार वाला व्यवहार नहीं था। शूटिंग के दौरान पूरी टीम एक परिवार की तरह रही और सबने मिलकर एडजस्ट किया । कंट्रोल बजट होने के बावजूद उल्का बेहद सहयोगी और जमीन से जुड़ी रहीं।
फिल्म का स्थानीय संस्कृति और भाषा से गहरा जुड़ाव दिखता है। क्या यह जानबूझकर किया गया था ?
उल्का गुप्ता : बिल्कुल। लोग अक्सर मान लेते हैं कि बिहार का मतलब सिर्फ भोजपुरी है, लेकिन बिहार में मैथिली जैसी कई खूबसूरत सांस्कृतिक पहचान और भाषाएँ हैं। चूँकि मैं खुद मैथिली परिवार से हूँ, इसलिए फिल्म की भावनाओं, भाषा और परंपराओं से मेरा जुड़ाव बहुत स्वाभाविक था।
फिल्ममेकिंग प्रक्रिया में सबसे अलग क्या था?
तनाया आडारकर : हमने हर स्तर पर स्थानीय लोगों को शामिल किया। यहाँ तक कि हमारे क्रू और स्पॉट बॉय भी स्थानीय लोगों को ट्रेन करके बनाए गए, बजाय सबको मुंबई से लाने के। यह सिर्फ फिल्म की शूटिंग नहीं रही, बल्कि बिहार के लोगों के साथ एक सहयोगात्मक अनुभव बन गया।
आजकल इंडस्ट्री में सस्टेनेबल फिल्ममेकिंग की काफी चर्चा हो रही है। क्या आपने भी इस सोच को अपनाया ?
तनाया आडारकर : हाँ, बिल्कुल। हमने फिल्ममेकिंग को व्यावहारिक और जमीन से जुड़ा रखने की कोशिश की। रियल लोकेशन इस्तेमाल कीं, स्थानीय प्रतिभाओं के साथ काम किया और अनावश्यक खर्च से बचा। मेरे लिए सस्टेनेबल फिल्ममेकिंग सिर्फ बजट नहीं, बल्कि लोगों, जगहों और संसाधनों का सम्मान करना भी है।
राजनी की बारात कब रिलीज हुई है ?
तनाया आडारकर : फिल्म 29 मई 2026 को रिलीज है। इसे मुंबई, दिल्ली, यूपी, बिहार और बंगाल समेत कई शहरों में मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन पर रिलीज किया जाएगा।
आखिर में, आप चाहते हैं कि दर्शक फिल्म से क्या लेकर जाएँ?
उल्का गुप्ता : मैं चाहती हूँ कि दर्शक कहानी की भावनाओं, संस्कृति और ईमानदारी से जुड़ें। यह एक जमीनी, मनोरंजक और दिल को छू लेने वाली फिल्म है।
तनाया आडारकर : और मैं चाहती हूँ कि लोग इंडिपेंडेंट सिनेमा को सपोर्ट करें। ऐसी फिल्में बहुत जुनून से बनाई जाती हैं और जब दर्शक इन्हें अपनाते हैं तो फिल्ममेकर्स को और सच्ची कहानियाँ कहने का हौसला मिलता है।
इतनी छोटी उम्र से इंडस्ट्री में होने के बावजूद आप बेहद आत्मविश्वासी और जमीन से जुड़ी लगती हैं। क्या कभी इंडस्ट्री में असहज अनुभव हुए?
उल्का गुप्ता : ईमानदारी से कहूँ तो नहीं। मुझे लगता है कि यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आप खुद को कैसे पेश करते हैं और खुद का कितना सम्मान करते हैं। जब आपके अंदर आत्मविश्वास और स्पष्टता होती है, तो लोग भी वैसा ही सम्मान बनाए रखते हैं। मैंने बहुत छोटी उम्र में काम शुरू किया था और मेरे पहले बड़े शो ने मुझे एक मजबूत पहचान दी। उसी नींव ने मुझे इंडस्ट्री में सकारात्मक तरीके से आगे बढ़ने में मदद की।
आप इस समय कई तेलुगु फिल्मों में काम कर रही हैं। उनके बारे में बताइए।
उल्का गुप्ता : हाँ, बिल्कुल। एक फिल्म लोकप्रिय तेलुगु कॉमेडियन सप्तगिरी के साथ है, जिसे मालिनी राघव डायरेक्ट कर रही हैं। उसका नाम 'ॐ शांति डिस्को शांति' है और उसमें मेरा किरदार काफी मनोरंजक है। इसके अलावा एक और फिल्म 'अगाधा' है, जिसे दिग्गज प्रोड्यूसर एम. एस. राजू सर बना रहे हैं, जिन्होंने प्रभास और तृषा कृष्णन जैसे कलाकारों को लॉन्च किया था। मेरे लिए यह बहुत बड़ा अवसर है।
आपने कम उम्र में काफी कुछ हासिल किया है। पर्सनल लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ में संतुलन कैसे बनाती हैं?
उल्का गुप्ता : मेरी पर्सनल लाइफ काफी संतुलित है। मेरा परिवार बहुत खूबसूरत है। मेरे पिता भी अभिनेता हैं और मेरे तीन भाई-बहन हैं। मैं पूरी तरह मुंबई की लड़की हूँ । यहीं जन्म हुआ और यहीं परवरिश हुई। सच कहूँ तो मैं अपने गाँव की भाषा से ज्यादा धाराप्रवाह मराठी बोलती हूँ।
हमने सुना है कि आप अपनी फिल्मों की डबिंग खुद करती हैं?
उल्का गुप्ता : हाँ, और इसके लिए मेरे पिता ने हमेशा मुझे प्रेरित किया। बचपन से वह कहते थे कि अगर अभिनेता अपनी आवाज में डबिंग करे तो अभिनय और ज्यादा असली लगता है। मैंने अपने बंगाली, मराठी और तेलुगु प्रोजेक्ट्स की डबिंग खुद की है और मुझे यह प्रक्रिया बहुत पसंद है।
रजनी की बारात शादी के इर्द-गिर्द घूमती है। असल जिंदगी में शादी को लेकर आपके क्या विचार हैं?
उल्का गुप्ता : अभी उसके लिए काफी समय है। (हँसते हुए) हाँ, मैंने प्यार, दिल टूटना और ऐसी कई भावनाएँ महसूस की हैं। मुझे लगता है कि ये अनुभव जिंदगी का हिस्सा हैं और इंसान को बहुत कुछ सिखाते हैं।
क्या दिल टूटने के अनुभवों ने आपको बदला है?
उल्का गुप्ता : बिल्कुल। लेकिन मुझे नहीं लगता कि दिल टूटने के बाद इंसान को रुक जाना चाहिए। हर अनुभव आपको कुछ सिखाता है और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है।
आज की महिलाएँ ज्यादा मुखर और आत्मनिर्भर हो रही हैं। फेमिनिज्म और महिला सशक्तीकरण पर आपकी क्या राय है?
उल्का गुप्ता : मैं पूरी तरह समानता और बराबर अवसरों में विश्वास करती हूँ। असली मायने में फेमिनिज्म का मतलब समानता है, श्रेष्ठता नहीं। दुर्भाग्य से सोशल मीडिया कभी-कभी इन विचारों को बहुत अतिवादी रूप में दिखाता है, जिससे असली अर्थ बदल जाता है। लेकिन मैं पूरी तरह महिलाओं के अधिकारों और उनकी आर्थिक व भावनात्मक स्वतंत्रता के समर्थन में हूँ।
क्या आपको लगता है कि पुरुष और महिलाएँ एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं?
उल्का गुप्ता : बिल्कुल। जिंदगी संतुलन का नाम है। न पुरुष और न ही महिलाएँ अकेले समाज को आगे बढ़ा सकते हैं।
भारतीय संस्कृति में एक बेहद खूबसूरत अवधारणा है - अर्धनारीश्वर - जो स्त्री और पुरुष ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक है। मुझे लगता है कि यह बताने के लिए इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता कि समाज आपसी सम्मान और समानता से ही सबसे अच्छा चलता है।
आपको क्या लगता है कि आज दर्शक किस तरह के सिनेमा को मिस कर रहे हैं?
तनाया आडारकर : मुझे लगता है कि दर्शक आज सरल, जमीनी और छोटे शहरों की उन कहानियों को मिस कर रहे हैं जिन्हें पूरा परिवार साथ बैठकर देख सके। रजनी की बारात बिल्कुल वैसी ही फिल्म है। रजनी बिल्कुल पड़ोस की लड़की जैसी है - भावुक, निडर और बेहद रिलेटेबल। फिल्म में हास्य, भावना, संस्कृति और दिल सब कुछ है।
आखिर में दर्शकों के लिए आपका संदेश?
उल्का गुप्ता : मैं बस इतना कहना चाहूँगी कि ईमानदार और जमीनी सिनेमा को सपोर्ट करें। रजनी की बारात को बहुत प्यार और सच्चाई के साथ बनाया है। इस फिल्म के जरिए आपको बिहार और मिथिला का वह खूबसूरत पहलू देखने को मिलेगा जो स्क्रीन पर बहुत कम दिखाई देता है। मुझे उम्मीद है कि दर्शक हँसेंगे, रोएँगे, मुस्कुराएँगे और थिएटर से भावनात्मक रूप से जुड़कर बाहर निकलेंगे। -लिपिका वर्मा