क्या बचपन से ही अभिनेत्री बनने का सपना था? आपकी शुरुआत कैसे हुई?
जी हाँ , मैं बचपन से ही अभिनेत्री बनना चाहती थी। यह मेरा सपना था, लेकिन मैं बहुत शर्मीली बच्ची थी। मुझमें कभी इतनी हिम्मत नहीं थी कि खुलकर कह स सकूँ कि मैं एक्ट्रेस बनना चाहती हूँ। अभिनय एक ऐसा पेशा है जिसमें सफलता की कोई गारंटी नहीं होती। मैंने यूके जाकर पॉलिटिक्स और लिटरेचर की पढ़ाई की। ग्रेजुएशन के बाद मुझे लगा कि अगर अब कोशिश नहीं की तो शायद कभी नहीं कर पाऊँगी। इसलिए 2017 में मुंबई लौटकर ऑडिशन देना शुरू किया।
आपका म्यूजिक वीडियो लिग्गी जबरदस्त हिट हुआ। क्या उससे आपकी जिंदगी बदल गई ?
बिलकुल। लिग्गी काफी वायरल हुआ और आज भी लोग मुझे "लिग्गी गर्ल" के नाम से पहचानते हैं। इंडस्ट्री में यही मेरी पहली पहचान बनी। इसके बाद कोविड आ गया। फिर मैंने ऑपरेशन रोमियो से फिल्मों में शुरुआत की, उसके बाद गुमराह की और फिर अनुराग कश्यप की फिल्म निशांची की। अब मुसाफिर कैफे ने मुझे दर्शकों का प्यार और पहचान दिलाई है।
अनुराग कश्यप की फिल्म का हिस्सा होना अपने आप में एक पहचान है
आपने बिना किसी गॉडफादर के बॉलीवुड में अपनी जगह बनाई। यह सफर कितना मुश्किल रहा ?
बहुत मुश्किल रहा। मैंने 2017 में शुरुआत की थी और लगभग नौ साल बाद मुसाफिर कैफे के जरिए पहली बार दर्शकों से इतनी पहचान मिली है। निशांची की वजह से मुझे इंडस्ट्री में काफी सम्मान मिला क्योंकि अनुराग कश्यप की फिल्म का हिस्सा होना अपने आप में एक पहचान है। लोगों को भरोसा होता है कि उनकी फिल्मों के कलाकार अच्छे परफॉर्मर होते हैं। उस फिल्म से मैंने बहुत कुछ सीखा।
बचपन में मैं तब तक खाना नहीं खाती थी जब तक मुझे कोई कहानी नहीं सुनाई जाती थी। शायद इसलिए मुझे कहानियों से इतना प्यार है।
आज आप किस तरह के किरदार करना चाहती हैं? क्या रोल की लंबाई मायने रखती है ?
बिलकुल नहीं । मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण कहानी होती है। बचपन में मैं तब तक खाना नहीं खाती थी जब तक मुझे कोई कहानी नहीं सुनाई जाती थी। शायद इसलिए मुझे कहानियों से इतना प्यार है। रोल छोटा हो या बड़ा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसा कि महान थिएटर गुरु स्टैनिस्लावस्की ने कहा था-"छोटे रोल नहीं होते, छोटे कलाकार होते हैं।" निशांची में मेरा स्क्रीन टाइम कम था, लेकिन अगर दर्शकों पर असर छोड़ पाए तो वही सबसे बड़ी बात है।
क्या आप खुद को एक वर्सेटाइल अभिनेत्री के रूप में स्थापित करना चाहती हैं ?
बिलकुल। मैं खुद को किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं रखना चाहती । कुछ साल बाद जब मैं पीछे मुड़कर देखूँ, तो मुझे लगे कि मैंने हर तरह की फिल्में और किरदार किए हैं। मैं खुद को लगातार चैलेंज करना चाहती हूँ।
एक दिन सेट पर उन्होंने मुझसे कहा था-"जितना प्यार तू मुझसे करती है ना, अपने आप से भी किया कर।" यह बात मेरे दिल में हमेशा के लिए बस गई और उसने मुझे खुद से प्यार करना सिखाया।
आपने नीरज पांडे, अनुराग कश्यप और रुचिर अरुण जैसे निर्देशकों के साथ काम किया । उनसे क्या सीख मिली ?
नीरज सर मेरे निर्देशक नहीं, बल्कि मेरे पहले निर्माता थे। उनसे मैंने सबसे बड़ी सीख यह ली कि अभिनय करते समय खुद को छोड़ देना चाहिए। अगर आप हर वक्त परफॉर्म करने की कोशिश में लगे रहेंगे तो किरदार में पूरी तरह नहीं उतर पाएंगे। अनुराग कश्यप के साथ काम करना मेरे लिए सिर्फ फिल्ममेकिंग नहीं, बल्कि जिंदगी की भी मास्टरक्लास था। उन्होंने मुझे खुद को स्वीकार करना सिखाया । एक दिन सेट पर उन्होंने मुझसे कहा था-"जितना प्यार तू मुझसे करती है ना, अपने आप से भी किया कर।" यह बात मेरे दिल में हमेशा के लिए बस गई और उसने मुझे खुद से प्यार करना सिखाया। रुचिर ने मेरी सोच बदल दी। मुझे लगता था कि मुझे अपने हर किरदार से खुद को पूरी तरह अलग रखना चाहिए। लेकिन उन्होंने कहा कि अपने व्यक्तित्व के कुछ हिस्से किरदार में शामिल करो। उन्होंने कहा कि मैं स्वभाव से चंचल और सहज हूँ और मुझे वही गुण अपने किरदार 'सुधा' में भी लाने चाहिए। इससे मेरे अभिनय का नजरिया बदल गया।
एक अभिनेत्री के तौर पर आप खुद को कितने नंबर देंगी?
मैं खुद की सबसे बड़ी आलोचक हूँ । मुझे हमेशा अपनी कमियाँ दिखाई देती हैं। अभिनय एक ऐसा हुनर है जिसे सीखने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती। अगर 100 में नंबर देने हों तो मैं खुद को सिर्फ 10 दूँगी क्योंकि मुझे अभी बहुत लंबा सफर तय करना है।
आपके माता-पिता का सहयोग आपके लिए कितना महत्वपूर्ण रहा ?
अगर मेरे माता-पिता का साथ नहीं होता तो आज मैं यहाँ नहीं होती। उन्होंने हमेशा मुझ पर भरोसा किया। अभिनय जैसे अनिश्चित पेशे में उन्होंने मुझे हर कदम पर सहारा दिया। लंबे समय तक मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं थी और उन्होंने कभी मुझे इसका एहसास नहीं होने दिया।
मुंबई आकर अपने दम पर संघर्ष करने वाले कलाकारों के लिए आपका क्या कहना है?
मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है । मेरे पास अपने माता-पिता का घर और उनका सहारा था। लेकिन जो लोग सब कुछ छोड़कर इस शहर में अपने दम पर संघर्ष करते हैं, मैं उनसे बेहद प्रेरित होती हूँ।
मैं मीडिया की दुनिया के करीब जरूर रही, लेकिन फिल्मों में कोई सीधा फायदा नहीं मिला
क्या आप खुद को इंडस्ट्री का इनसाइडर मानती हैं या आउटसाइडर ?
मैं खुद को इनसाइडर नहीं मानती। मेरे पिता जॉनी पिंटो विज्ञापन फिल्में बनाते थे और मेरी माँ मोनिया पिंटो नॉन-फिक्शन टेलीविजन शो लिखती और प्रोड्यूस करती थीं। मैं मीडिया की दुनिया के करीब जरूर रही, लेकिन फिल्मों में कोई सीधा फायदा नहीं मिला। आखिरकार आपकी पहचान आपका टैलेंट और आपकी मेहनत ही बनाती है।
इस इंडस्ट्री में मेहनत के साथ-साथ सही समय और किस्मत भी बहुत मायने रखते हैं।
क्या आप किस्मत पर विश्वास करती हैं?
हाँ, करती हूँ । मुझे लगा था कि मीडिया बैकग्राउंड होने से शायद कुछ आसान होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस इंडस्ट्री में मेहनत के साथ-साथ सही समय और किस्मत भी बहुत मायने रखते हैं।
फिलहाल सबसे खुशी की बात यह है कि आज मैं उस मुकाम पर हूँ जहाँ मेरे पास स्क्रिप्ट्स आ रही हैं और मैं उन्हें पढ़कर अपने अगले प्रोजेक्ट का चुनाव कर रही हूँ।
क्या भविष्य में आप किसी फिल्म की मुख्य नायिका बनकर पूरी फिल्म अपने कंधों पर उठाना चाहेंगी ?
बिलकुल। ऐसा कौन नहीं चाहेगा ? जब मैं ऐसी फिल्में देखती हूँ जिनमें एक महिला पूरी कहानी को अपने दम पर आगे बढ़ाती है, तो मुझे भी लगता है कि एक दिन मैं भी ऐसा करूँ। फिलहाल सबसे खुशी की बात यह है कि आज मैं उस मुकाम पर हूँ जहाँ मेरे पास स्क्रिप्ट्स आ रही हैं और मैं उन्हें पढ़कर अपने अगले प्रोजेक्ट का चुनाव कर रही हूँ।
इन दिनों किस तरह की फिल्मों में आपकी सबसे ज्यादा दिलचस्पी है?
हाल ही में मैंने कई हॉरर स्क्रिप्ट्स पढ़ी हैं । खासकर साइकोलॉजिकल हॉरर मुझे बहुत रोमांचक लग रहा है। मैं हर नए किरदार के साथ खुद को सरप्राइज करना चाहती हूँ।
एक मिलेनियल होने के नाते आप मिलेनियल और जेन-ज़ी के बीच क्या अंतर मानती हैं ?
एक लाइन मुझे बहुत पसंद है-"मिलेनियल्स चले थे, ताकि जेन-ज़ी दौड़ सके।" मुझे लगता है कि यह दोनों पीढ़ियों के रिश्ते को बहुत खूबसूरती से बयान करती है।
आखिर में देशभर से अभिनेता बनने का सपना लेकर आने वाले युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
बस एक ही बात कहना चाहूँगी-रुकिए मत, आगे बढ़ते रहिए। यह सफर मुश्किल होगा। कई बार निराशा भी मिलेगी। लेकिन अगर आपका सपना सच्चा है, तो हार मत मानिए। लगातार मेहनत करते रहिए। एक दिन आपकी मेहनत जरूर रंग लाएगी। -लिपिका वर्मा