मानवीय संवेदनाओं का यादगार स्वर। गीत और गजलों के बादशाह। मरुधरा कहे जाने वाले राजस्थान का लाल। और अपनी गायकी के चलते लोगों के दिलों पर राज करने वाली आवाज। गजल सम्राट कहे जाने वाले जगजीत सिंह की आज पुण्यतिथि है। आज ही के दिन आवाज के जादूगर जगजीत सिंह ने इस दुनिया को अलविदा कहा था।
पारंपरिक रूप से महफिलों और शाही दरबारों तक सीमित ग़ज़ल की विधा को उन्होंने आम आदमी की भाषा और भावनाओं से जोड़ा। यही वजह रही कि गजल "खास" के साथ-साथ हर "आम" लोगों के जीवन का हिस्सा बनी और आम लोग भी गजल को गुनगुना उठे। वीर प्रसूता कही जाने वाली धरती राजस्थान के श्रीगंगानगर से निकले सरदार जगजीत सिंह ने देश और दुनिया में अपनी गायकी से मरुधरा का नाम रोशन किया। यह अलग बात है कि जगजीत सिंह के लिए "रण क्षेत्र" युद्ध के मैदान के वजाय संगीत की दुनिया रही।
आवाज के जादूगर सरदार जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से पंजाब के रोपड़ जिले से था। जगजीत सिंह के पिता सरदार अमर सिंह सार्वजनिक निर्माण विभाग में एक सरकारी कर्मचारी थे और संगीत में रुचि रखते थे। जगजीत सिंह को संगीत उनके पिता से ही विरासत में मिला हालांकि उनके पिता चाहते थे कि जगजीत इंजीनियर बने। जगजीत सिंह की शुरुआती पढ़ाई गंगानगर में हुई और बाद में आगे की पढ़ाई करने के लिए वह जालंधर चले गए। वहां के खालसा कॉलेज से पढ़ाई के बाद जगजीत सिंह ने ऑल इंडिया रेडियो जालंधर में एक सिंगर और म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में काम शुरू कर दिया। उसके बाद कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी हरियाणा से पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई भी की। यही नहीं जगजीत सिंह ने गुरुद्वारे में पंडित छगनलाल मिश्रा और उस्ताद जमाल खान से क्लासिकल संगीत की शिक्षा भी ली।
सरदार जगजीत सिंह की गायकी की शुरुआत की बात करें तो वर्ष 1961 में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, जालंधर स्टेशन पर गायन शुरू किया था। इसके बाद वर्ष 1965 में जगजीत सिंह अपने परिवार को बिना बताए मुंबई चले आए और स्ट्रगल शुरू कर दिया। मुंबई में ही जगजीत सिंह की मुलाकात एक बंगाली महिला गजल गायिका चित्रा दत्ता से हुई। आपसी संपर्क में आने के दो साल बाद वर्ष 1969 में दोनों शादी कर ली। उनके एक बेटा विवेक भी हुआ। उनकी पहली एलबम 'द अनफॉरगेटेबल्स' साल 1976 में आई थी जो काफी हिट साबित रही थी। इसकी वजह से ये दोनों कपल स्टार बन गए। एल्बम का गीत 'बात निकलेगी' काफी पसंद किया गया। उसके बाद गीत और संगीत की दुनिया में उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने जब फिल्मों के लिए गजल गानी शुरू की तो देखते-देखते वह हर किसी की पहली पसंद बन गए। तब जगजीत सिंह और चित्रा सिंह एक साथ कई सारे कॉन्सर्ट किया करते थे।
वर्ष 1980 में आया हुआ जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का एल्बम 'वो कागज की कश्ती' बेस्ट सेलिंग एल्बम बन गया था। जिसके चलते ही उस जमाने में जगजीत सिंह गजल किंग बन गए थे। इसके बाद सरदार जगजीत सिंह ने पार्श्व गायन के क्षेत्र में भी अपना कदम रखा और वर्ष 1982 में फिल्म अर्थ से इसकी शुरुआत हुई। जगजीत सिंह ने 'प्रेम गीत', 'अर्थ', 'जिस्म', 'तुम बिन' तथा'जॉगर्स पार्क' जैसी फिल्मों में भी गजलों की बेहतरीन प्रस्तुति दी और लोगों के दोनों पर छा गए। जगजीत सिंह द्वारा गई कुछ गजलें "झुकी-झुकी सी नजर बेकरार है कि नहीं", "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या गम है जिसको छुपा रहे हो", "तुमको देखा तो ये ख्याल आया", "प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है", "होश वालों को", "होठों से छू लो तुम", "ये दौलत भी ले लो" और "चिठ्ठी न कोई संदेश" लोगों की जुबान पर हैं। जगजीत सिंह ने अपनी आवाज के जादू से 150 से ज्यादा एल्बम और गजलों को खूबसूरत बनाया था।
जगजीत सिंह पर 27 जनवरी 1990 को दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब उनके बेटे विवेक की मात्र 18 साल की उम्र में एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। इस हादसे की वजह से उनकी पत्नी चित्रा सिंह काफी अपसेट रहने लगी थीं और एक वक्त के बाद उन्होंने गाना छोड़ दिया था। इस हादसे ने जगजीत सिंह को भी टूटने पर मजबूर कर दिया। सरदार जगजीत सिंह की बेजोड़ गायक की और संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए वर्ष 1998 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा "लता मंगेशकर" पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1998 में ही राजस्थान सरकार द्वारा साहित्य कला अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मिर्जा गालिब के कार्य को लोकप्रिय बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें वर्ष 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2003 में भारत सरकार द्वारा "पद्म भूषण" के साथ सम्मानित किया गया। वर्ष 2011 में जगजीत सिंह को यूके में गुलाम अली के साथ परफॉर्म करना था लेकिन हेमरेज की वजह से उन्हें 23 सितम्बर 2011 को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया।
उनकी हालत बिगड़ती गई और जगजीत सिंह कोमा में चले गए। मुंबई के लीलावती अस्पताल में इस गंभीर बीमारी से लड़ते हुए 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह ने आखिरी सांसें ली और गजल की दुनिया के इस बादशाह की रूहानी आवाज हमेशा के लिए थम गई। सरदार जगजीत सिंह की आवाज की खासियत यह रही कि उन्होंने पारंपरिक रूप से महफिलों और शाही दरबारों तक सीमित ग़ज़ल विधा को आम आदमी की भाषा और भावनाओं से जोड़ा। उन्होंने गायकी में शब्दों और उनके अर्थ को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी, ताकि सुनने वाला एक-एक शब्द की गहराई को महसूस कर सके। यही नहीं जगजीत सिंह ने गजल गायकी में पारंपरिक हारमोनियम और तबला के साथ-साथ गिटार, की-बोर्ड और पश्चिमी धुनों का सहज तालमेल बैठाकर ग़ज़ल को नया आयाम दिया। आज सरदार जगजीत सिंह हमारे बीच में नहीं है। लेकिन जगजीत सिंह अपनी गायकी के जरिए लोगों के दिलों में जिंदा है। उनकी आवाज सदियों तक देश और दुनिया में संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करेगी। (युवराज)प्रदीप कुमार वर्मा