नाना पाटेकर (फाइल फोटो) 
मनोरंजन

अलविदा नाना !

अभिनय की दुनिया का अनमोल सितारा, जिसने हर किरदार को जीवंत किया

Om Prakash Mishra

कुछ अभिनेता पर्दे पर आते हैं,  संवाद बोलते हैं और चले जाते हैं लेकिन कुछ संवाद बोलते-बोलते दर्शक के भीतर तक उतर जाते हैं। नाना पाटेकर ऐसे ही बेजोड़ अभिनेता थे जिनकी तुलना किसी से भी न उनके जीते जी की जा सकी और न मरने के बाद करना संभव होगा। रफ-टफ चेहरा, बोलती हुई आंखें, साधारण कद काठी और आवाज में गहराई के साथ-साथ किसी सुपरफास्ट ट्रेन की तरह द्रुतगामी संवाद अदायगी नाना की विशेष पहचान थे। 

1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में विश्वनाथ पाटेकर के रूप में जन्मे बहुमुखी प्रतिभा के धनी नाना पाटेकर  75 वर्ष की उम्र में अपने पीछे अभिनय की शानदार विरासत छोड़कर दिवंगत हुए हैं तो ऐसा लगता है जैसे पर्दे पर अचानक कोई रोशनी बुझ गई हो।    करीब पांच दशक के अभिनय जीवन में उन्होंने नायक, खलनायक, पुलिस अधिकारी, सैनिक, अपराधी, किसान, पिता, राजनेता-सरीखे किरदार और हास्य चरित्र-सब किए, लेकिन किसी एक खाने में नहीं अपितु सब में एकदम फिट हुए और यही उनकी असली पहचान थी। वे भूमिका नहीं निभाते थे, भूमिका को अपनी देह, आवाज़ और बेचैनी दे देते थे।उनका चेहरा पहले बोलता था, संवाद बाद में।

नाना की आवाज़ खुरदरी थी, लेकिन उनकी संवाद-अदायगी में गजब का प्रवाह था। वे लंबे-लंबे संवाद इस तरह बोलते थे कि शब्दों का बोझ महसूस नहीं होता था। वाक्य लंबा होता, आवाज़ कभी ऊपर जाती, कभी अचानक नीचे उतरती, बीच में ठहरती और फिर एकाएक विस्फोट करती। लगता था जैसे संवाद लिखा नहीं गया, अभी-अभी उनके भीतर पैदा हुआ है और यह केवल आवाज़ का कमाल नहीं था।

उनका चेहरा संवाद बोलता था, आंखें चुनौती देतीं,सवाल करतीं, भीतर का दुख छिपातीं तो  होंठों का हल्का-सा खिंचाव व्यंग्य बन जाता वे चिल्लाते थे तो भी अभिनय करते थे और चुप रहते थे तो भी। आज के तकनीकी वर्चस्व वाले सिनेमा में कैमरा चेहरे को बड़ा कर देता हैं मगर नाना पाटेकर चेहरे को अभिनय से बड़ा बना देते थे। उनके संवादों की ताकत शब्दों में जितनी थी, उतनी ही उन शब्दों के बीच की खामोशी में भी।  ‘एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है’ जैसा संवाद हो या ‘सौ में से अस्सी बेईमान...’ जैसा व्यंग्य-वे संवाद नहीं, चरित्र की आवाज़ बन गए।

नाना सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़े और रंगमंच से अभिनय की जमीन तैयार की। 1978 की ‘गमन’ से शुरू हुए फिल्मी सफर में ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘अंधा युद्ध’, ‘सलाम बॉम्बे!’ जैसी फिल्मों ने उन्हें उस अभिनेता के रूप में स्थापित किया जो चमकदार नायक बनने के बजाय समाज की खुरदरी सच्चाइयों से जूझते किरदार चुनता था। ‘प्रतिघात’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उस दौर में व्यवस्था, अपराध और आम आदमी के आक्रोश को जिस सिनेमाई भाषा में सामने लाया जा रहा था, उसमें नाना की उपस्थिति अलग से पहचानी जाती थी। ‘अंकुश’ और ‘प्रतिघात’ के किरदारों में उनका गुस्सा निजी नहीं उस आदमी का गुस्सा लगा था जिसे व्यवस्था ने बहुत देर तक चुप रहने को कहा हो। प्रतिघात का वह कांस्टेबल जो सड़क पर नग्न बैठी एक बलात्कृता स्त्री के ऊपर तिरंगा डालकर इस कदर रोता है कि उसके मुंह से लार टपकने लगती है कौन भूल सकता है।

अन्ना के रूप में उनकी निर्ममता में भी एक विचित्र मानवीय ताप था।

रिंदा’ से तो नाना का अभिनय राष्ट्रीय पहचान बन गया। अन्ना के रूप में उनकी निर्ममता में भी एक विचित्र मानवीय ताप था। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। ‘क्रांतिवीर’ में प्रताप के रूप में उनका आक्रोश चरम पर पहुंचा और उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। ‘अग्निसाक्षी’ के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार उनके हिस्से आया। तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ अनेक फिल्मफेयर और अन्य सम्मान उनके खाते में आए। 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। नाना की खूबी यह नहीं थी कि वे गुस्सा बहुत अच्छा करते थे। खूबी यह थी कि वे गुस्से के भीतर छिपी असहायता भी दिखा सकते थे।

‘अब तक छप्पन’ का साधु अगाशे कम बोलता है, लेकिन उसका चेहरा बहुत कुछ कहता है। ‘खामोशी’ में आवाज़ की जगह शरीर और आंखों से अभिनय करना पड़ा तो उन्होंने सिद्ध कर दिया कि उनका अभिनय उनकी आवाज़ का मोहताज नहीं। ‘नटसम्राट’ में उम्र, अकेलापन, अहंकार, स्मृति और टूटन-सब उनके चेहरे पर एक साथ दिखाई देते हैं और फिर ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी! जिस अभिनेता को दर्शक वर्षों से गुस्से और त्रासदी का पर्याय मानते रहे, उसी ने हास्य में ऐसा रंग भरा कि उदय शेट्टी स्वयं एक मुहावरा बन गया।  1991 में ‘प्रहार : द फाइनल अटैक’ बनाकर उन्होंने निर्देशन भी किया।

राजनीति पर बोलते थे, राजनीति में गए नहीं

 सेना और अनुशासन से उनका लगाव केवल फिल्म तक सीमित नहीं था। वे प्रादेशिक सेना से जुड़े और मानद लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंचे। उनकी जिंदगी में खेत भी था, गांव भी, खाना पकाने का शौक भी और सादगी भी। शायद इसीलिए उनकी अभिनय-भाषा में महानगरीय चमक से ज्यादा मिट्टी की गंध थी। राजनीति पर बोलते थे, राजनीति में गए नहीं । नाना राजनीतिक आदमी नहीं थे, लेकिन राजनीतिक चेतना से दूर भी नहीं। किसानों, सरकार, व्यवस्था और सामाजिक अन्याय पर वे खुलकर बोलते रहे। राजनीति में आने की चर्चाएं होती रहीं, लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी रखी। उनकी स्पष्टवादिता  उनकी ताकत भी थी और शायद राजनीति से दूरी का कारण भी। वे सत्ता के मंच पर खड़े होकर बोलने से ज्यादा सत्ता से सवाल करने में सहज थे। किसानों और ग्रामीण समाज के प्रति उनका सरोकार महज भाषण नहीं था। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने नाम फाउंडेशन की स्थापना की, जिसने महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों, किसान परिवारों, जल-संरक्षण और ग्रामीण विकास के लिए काम किया।

नाना के निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि उनकी जगह कौन लेगा। सवाल यह है कि क्या वह जगह भरी भी जा सकती है ?

अच्छा अभिनेता मिल जाएगा। अच्छी आवाज़ भी मिल जाएगी। लंबे संवाद बोलने वाले भी मिल जाएंगे। मगर आवाज़ में वह खुरदरापन, शब्दों के बीच वह बेचैन ठहराव, आंखों में वह अचानक उतरता गुस्सा, चेहरे पर क्षण भर में बदलती करुणा और संवाद को अपने अनुभव की आग से भर देने की क्षमता-यह सब एक साथ कहां मिलेगा?

उनका चेहरा पारंपरिक अर्थों में नायक का चेहरा नहीं था। शायद इसीलिए वह आम आदमी के ज्यादा करीब था। वह जब व्यवस्था पर बरसते थे तो लगता था कि हमारी अपनी नाराजगी बोल रही है। जब टूटते थे तो लगता था कि हमारे भीतर का अकेलापन सामने आ गया है। और जब हंसाते थे तो लगता था कि यह वही आदमी है जो अभी थोड़ी देर पहले पर्दे पर आग उगल रहा था।

उनके जाने से पैदा हुआ शून्य केवल फिल्म उद्योग का शून्य नहीं है। यह अभिनय की उस परंपरा का शून्य है जिसमें अभिनेता स्टार बनने से पहले कलाकार होता था। जब उनकी कोई फिल्म देखी जाएगी तब शायद कुछ क्षण के लिए हमें लगेगा-नाना गए नहीं हैं, बस पर्दे के पीछे चले गए हैं।पर्दा गिर गया है, आवाज़ थम गई है, चेहरा ओझल हो गया है। नाना की आवाज़,उनका अभिनय, उनकी संवाद अदायगी और समाज सेवा में उनका ‘नाम’ हमेशा हमेशा बोलता रहेगा। (युव.) डॉ. घनश्याम बादल

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