राजकुमार संतोषी, प्रीति जिंटा और सनी देओल 
मनोरंजन

उनका आशीर्वाद और प्यार हमारे लिए बहुत मायने रखता है : सनी देओल

सनी देओल, प्रीति जिंटा और निर्देशक राजकुमार संतोषी से खास बातचीत | बंटवारा1947, करण देओल, धर्मेंद्र और फिल्म पर चर्चा

ट्रेलर को शानदार और भावुक प्रतिक्रिया मिली है, खासकर करण देओल के लिए। एक सह-कलाकार, निर्देशक और पिता के तौर पर आप उनकी इस यात्रा को कैसे देखते हैं?'

सनी देओल : करण एक अभिनेता के रूप में काफी निखर गया है। हर फिल्म के साथ एक कलाकार परिपक्व होता जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पुरानी व्हिस्की समय के साथ और बेहतर होती जाती है। उसने इस फिल्म में बहुत अच्छा काम किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि जब दर्शक फिल्म देखेंगे तो हर कोई उसके अभिनय की तारीफ करेगा ।

राजकुमार संतोषी : करण अब एक स्थापित अभिनेता बन चुका है। उसे निर्देशित करते समय मैं उसकी मेहनत, संवाद अदायगी और सटीकता से बेहद प्रभावित हुआ। जब दर्शकों ने उसके लिए तालियां बजाईं तो वह पल मेरे लिए भावुक कर देने वाला था। वह नई पीढ़ी की प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करता है और मुझे यकीन है कि उसका भविष्य बहुत उज्ज्वल है।

हम सिर्फ एक सही कहानी का इंतजार कर रहे थे। यह कहानी हमने 2009-10 में ही सुनी थी, लेकिन तब फिल्म बन नहीं पाई। आखिरकार अब सही समय आया और हम साथ आए।

सनी जी, लंबे समय बाद आपकी और राजकुमार संतोषी की जोड़ी फिर साथ आई है। क्या इसे आप कमबैक मानते हैं?

सनी देओल : बिल्कुल नहीं। मैं इसे कमबैक नहीं मानता। राज जी और मैं पहले भी तीन फिल्मों में साथ काम कर चुके हैं। हम सिर्फ एक सही कहानी का इंतजार कर रहे थे। यह कहानी हमने 2009-10 में ही सुनी थी, लेकिन तब फिल्म बन नहीं पाई। आखिरकार अब सही समय आया और हम साथ आए।

चूंकि फिल्म विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है, क्या आपने इसके लिए कोई ऐतिहासिक रिसर्च की?

सनी देओल : रिसर्च करना लेखक और निर्देशक की जिम्मेदारी होती है। एक अभिनेता के तौर पर हमारा काम अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाना है।

राजकुमार संतोषी : मैंने धर्म जी और उनके परिवार के साथ काफी समय बिताया। उन्होंने विभाजन के दौर की कई सच्ची घटनाएं सुनाईं। धर्म जी इतिहासकार की तरह उस दौर का वर्णन करते थे। उनके परिवार की यादों में दर्द भी था और इंसानियत भी । हिंसा और नफरत के बीच भी प्यार और मानवीय रिश्तों की कहानियां थीं। उन्हीं अनुभवों ने सनी के अभिनय को भी गहराई दी।

धर्म जी इतिहासकार की तरह उस दौर का वर्णन करते थे। उनके परिवार की यादों में दर्द भी था और इंसानियत भी । हिंसा और नफरत के बीच भी प्यार और मानवीय रिश्तों की कहानियां थीं। उन्हीं अनुभवों ने सनी के अभिनय को भी गहराई दी।- राजकुमार संतोषी

इस फिल्म के लिए हां कहने की सबसे बड़ी वजह क्या थी ?

सनी देओल : मेरे लिए सबसे अहम चीज कहानी होती है। अगर कहानी दिल को छू जाए तो मैं तुरंत फैसला कर लेता हूं कि मुझे यह फिल्म करनी है। इससे बड़ी कोई वजह नहीं होती ।

मुझे सबसे ज्यादा उन परिवारों की सच्ची कहानियों ने प्रभावित किया, जिन्हें लगा था कि वे कुछ दिनों बाद अपने घर वापस लौट आएंगे।-प्रीति जिंटा
सनी देओल और प्रीति जिंटा

क्या विभाजन के दौर के किरदार को निभाते समय जिम्मेदारी का एहसास हुआ?

सनी देओल : बिल्कुल। बचपन से मैंने अपने माता-पिता से विभाजन की कई कहानियां सुनी थीं। इसलिए जब मैंने यह स्क्रिप्ट सुनी तो उससे तुरंत जुड़ गया। मैंने 'गदर' जैसी फिल्म जरूर की है, लेकिन यह कहानी बिल्कुल अलग है। एक अभिनेता के रूप में जब मैं किसी किरदार से जुड़ जाता हूं तो पूरी तरह उसी में डूब जाता हूं और उसे पर्दे पर जीवंत करने की कोशिश करता हूं।

प्रीति जिंटा : मुझे सबसे ज्यादा उन परिवारों की सच्ची कहानियों ने प्रभावित किया, जिन्हें लगा था कि वे कुछ दिनों बाद अपने घर वापस लौट आएंगे। उन्होंने अपने गहने और कीमती सामान जमीन में दबा दिए थे, लेकिन उन्हें कभी लौटने का मौका नहीं मिला । यह पढ़कर दिल टूट गया। चूंकि यह मेरी पहली पीरियड फिल्म है, इसलिए मैंने उस दौर को समझने के लिए काफी रिसर्च की।

जब मैंने यह कहानी पढ़ी तो महसूस हुआ कि विभाजन की त्रासदी के बावजूद इसमें उम्मीद और इंसानियत का संदेश है। यही बात मुझे वापस फिल्मों में ले आई।

प्रीति, इतने लंबे ब्रेक के बाद आपने वापसी के लिए इसी फिल्म को क्यों चुना?

प्रीति जिंटा : मैं अपने परिवार और बच्चों के साथ समय बिताकर खुश थी, लेकिन मैं हमेशा राज जी के साथ काम करना चाहती थी और एक पीरियड फिल्म भी करना चाहती थी। जब मैंने यह कहानी पढ़ी तो महसूस हुआ कि विभाजन की त्रासदी के बावजूद इसमें उम्मीद और इंसानियत का संदेश है। यही बात मुझे वापस फिल्मों में ले आई।

हमारी टाइमिंग कभी नहीं मिल पाई

राज जी, प्रीति के साथ काम करने में इतना लंबा समय क्यों लग गया?

राजकुमार संतोषी : हमारी टाइमिंग कभी नहीं मिल पाई। मैंने 'दिल है तुम्हारा' की कहानी प्रीति को ध्यान में रखकर लिखी थी और उन्हें सुनाई भी थी। मैं खुद उसका निर्देशन करने वाला था, लेकिन दूसरी फिल्म की वजह से ऐसा नहीं हो पाया और बाद में कुंदन शाह ने उसे निर्देशित किया। उस फिल्म में सनी के लिए भी एक अलग भूमिका सोची गई थी। किस्मत को कुछ और मंजूर था, लेकिन खुशी है कि आखिरकार हम साथ काम कर पाए।

क्या फिल्म में देशभक्ति से जुड़े गाने भी हैं ?

राजकुमार संतोषी : फिल्म का हर गीत कहानी और उस दौर की जरूरत के मुताबिक रखा गया है। सिर्फ गाने जोड़ने के लिए कोई गीत नहीं डाला गया है।

कभी उम्मीद मत छोड़िए। मेहनत करते रहिए क्योंकि समय हर किसी का बदलता है।

अपने करियर के उतार-चढ़ाव के बाद आप नए कलाकारों को क्या संदेश देना चाहेंगे ?

सनी देओल : कभी उम्मीद मत छोड़िए। मेहनत करते रहिए क्योंकि समय हर किसी का बदलता है। जब आपका मौका आए तो आप पूरी तरह तैयार होने चाहिए। आज तकनीक की वजह से हमारी पुरानी फिल्में भी नई पीढ़ी तक पहुंच रही हैं और हमें दर्शकों से दोबारा जुड़ने का अवसर मिल रहा है।

राजकुमार संतोषी : हमें लगातार काम करते रहना चाहिए और खुद को दोहराने से बचना चाहिए। नए प्रयोग करना जरूरी है, चाहे उसमें नई गलतियां ही क्यों न हों। एक कलाकार इसी तरह आगे बढ़ता है ।

उम्मीद है कि वही पुराना जुनून फिर लौटेगा, क्योंकि उसी से कालजयी सिनेमा बनता है।

आपको क्या लगता है कि 90 के दशक के सितारे आज भी इतने लोकप्रिय क्यों हैं ?

राजकुमार संतोषी : इसका जवाब तो दर्शक ही बेहतर दे सकते हैं। पहले फिल्में जुनून और दिल से बनाई जाती थीं। आज कॉरपोरेट संस्कृति के आने से फिल्म निर्माण ज्यादा बिजनेस-केंद्रित हो गया है। उम्मीद है कि वही पुराना जुनून फिर लौटेगा, क्योंकि उसी से कालजयी सिनेमा बनता है।

आज सोशल मीडिया के कारण दर्शकों को कलाकारों की निजी जिंदगी तक सब कुछ पता होता है। वह रहस्य खत्म हो गया है।

आज के समय में स्टारडम को आप कैसे परिभाषित करती हैं ?

प्रीति जिंटा : पहले लोग कलाकारों को उनके निभाए गए किरदारों से पहचानते थे। आज सोशल मीडिया के कारण दर्शकों को कलाकारों की निजी जिंदगी तक सब कुछ पता होता है। वह रहस्य खत्म हो गया है। अब फिल्मों के अलावा मनोरंजन के कई विकल्प हैं। इसलिए लोगों को सिनेमाघरों तक लाने के लिए फिल्म का अनुभव असाधारण होना चाहिए। आज भी कई लोग मुझे नैना या ज़ारा कहकर बुलाते हैं और यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अब मैं मां भी हूं और गृहिणी भी, इसलिए इस किरदार को निभाने का नजरिया भी बदल गया। शूटिंग आसान नहीं थी। मेरे जुड़वां बच्चे तब सिर्फ दो साल के थे और सुबह छह बजे से शुरू होने वाली लंबी शूटिंग के साथ मां होने की जिम्मेदारी निभाना चुनौतीपूर्ण था।

मां बनने के बाद फिल्मों में वापसी करना कितना अलग अनुभव रहा ?

प्रीति जिंटा : बहुत अलग। अब मैं मां भी हूं और गृहिणी भी, इसलिए इस किरदार को निभाने का नजरिया भी बदल गया। शूटिंग आसान नहीं थी। मेरे जुड़वां बच्चे तब सिर्फ दो साल के थे और सुबह छह बजे से शुरू होने वाली लंबी शूटिंग के साथ मां होने की जिम्मेदारी निभाना चुनौतीपूर्ण था। लेकिन हमने लगभग पूरी फिल्म दो महीने के एक ही शेड्यूल में पूरी कर ली।

राजकुमार संतोषी : प्रीति पहले दिन से ही अपने किरदार में पूरी तरह ढल गई थीं। मैं वर्षों से उनके साथ काम करना चाहता था। वह उन चुनिंदा कलाकारों में हैं जो निर्देशक को भी प्रेरित करती हैं।

इतने वर्षों तक उनका फिल्मों से दूर रहना इंडस्ट्री के लिए नुकसान था और मुझे खुशी है कि वह वापस लौट आई हैं।

राज जी, आप हमेशा प्रीति के अभिनय की तारीफ करते रहे हैं। उनमें ऐसा क्या खास है?

राजकुमार संतोषी : मैं हमेशा से उनके अभिनय का प्रशंसक रहा हूं। मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी कोई बनावटी अभिनय किया हो। चाहे दिल से.., वीर-ज़ारा हो या चोरी चोरी चुपके चुपके, वह हमेशा बेहद स्वाभाविक लगी हैं। वह एक बेहतरीन कलाकार हैं। इतने वर्षों तक उनका फिल्मों से दूर रहना इंडस्ट्री के लिए नुकसान था और मुझे खुशी है कि वह वापस लौट आई हैं।

जिस दिन मुझे सच में लगेगा कि अब यह नहीं कर सकता, उस दिन रुक जाऊंगा।

सनी जी, आज भी आप अपने एक्शन दृश्य खुद करते हैं । इसकी प्रेरणा क्या है?

सनी देओल : मैंने कभी उम्र को अपनी सीमा नहीं बनने दिया। आज भी नियमित व्यायाम करता हूं और जहां तक संभव हो अपने एक्शन दृश्य खुद करता हूं। जिस दिन मुझे सच में लगेगा कि अब यह नहीं कर सकता, उस दिन रुक जाऊंगा।

राजकुमार संतोषी : सनी कभी मुश्किल एक्शन दृश्य करने से पीछे नहीं हटते। प्रीति ने भी घुड़सवारी जैसे कई चुनौतीपूर्ण दृश्य बिना बॉडी डबल के किए । उनकी प्रतिबद्धता ने फिल्म को और बेहतर बनाया।

सनी कभी मुश्किल एक्शन दृश्य करने से पीछे नहीं हटते -राजकुमार संतोषी :
धर्म जी ने फिल्म देखने के बाद मुझसे काफी देर तक बात की। लाहौर 1947 बनाते समय उन्होंने विभाजन के दौर की अपनी कई निजी यादें साझा की थीं। वह उन कठिन दिनों को एक छोटे बच्चे के रूप में जी चुके थे

धर्म जी फिल्म देख चुके हैं। उनकी क्या प्रतिक्रिया रही ?

सनी देओल : पापा को फिल्म बहुत पसंद आई। रिलीज में थोड़ा समय जरूर लगा, लेकिन जब उन्होंने फिल्म देखी तो हर पल की सराहना की। उनका आशीर्वाद और प्यार हमारे लिए बहुत मायने रखता है।

राजकुमार संतोषी : धर्म जी ने फिल्म देखने के बाद मुझसे काफी देर तक बात की। लाहौर 1947 बनाते समय उन्होंने विभाजन के दौर की अपनी कई निजी यादें साझा की थीं। वह उन कठिन दिनों को एक छोटे बच्चे के रूप में जी चुके थे। जब भी वह उन घटनाओं का जिक्र करते, भावुक हो जाते थे। वह बताते थे कि लोग कैसे अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए। धर्म जी बेहद संवेदनशील इंसान हैं और मुझे विश्वास है कि उनका आशीर्वाद इस फिल्म के साथ है।

आज महिलाओं के पास करियर बनाने, अपना जीवनसाथी चुनने, व्यवसाय करने, दुनिया घूमने और परिवार संभालने के साथ-साथ अपने सपने पूरे करने की आजादी है। यह फिल्म मुझे हर पल याद दिलाती रही कि हमें अपनी आजादी की कद्र करनी चाहिए।

फिल्म स्वतंत्रता दिवस के महीने में रिलीज हो रही है। खासकर एक महिला के तौर पर आपके लिए आजादी का क्या मतलब है ?

प्रीति जिंटा : इस फिल्म ने मुझे एहसास कराया कि आज के भारत में जन्म लेना कितने सौभाग्य की बात है। पहले मैं अक्सर सोचती थी कि काश मैं किसी पुराने दौर में रहती, लेकिन इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मुझे बार-बार याद दिलाया गया कि 1947 में महिलाओं को आज जैसी आजादी नहीं थी। वे घर संभालती थीं, खाना बनाती थीं, सिलाई करती थीं और समाज के बनाए नियमों का पालन करती थीं। आज महिलाओं के पास करियर बनाने, अपना जीवनसाथी चुनने, व्यवसाय करने, दुनिया घूमने और परिवार संभालने के साथ-साथ अपने सपने पूरे करने की आजादी है। यह फिल्म मुझे हर पल याद दिलाती रही कि हमें अपनी आजादी की कद्र करनी चाहिए।

मैं हमेशा से स्वतंत्र रही हूं, इसलिए इस किरदार ने मुझे एहसास कराया कि समाज ने कितनी लंबी यात्रा तय की है।

क्या उस दौर की महिला का किरदार निभाने से आपकी सोच बदली ?

प्रीति जिंटा : बिल्कुल। मेरी किरदार सिर्फ अपने पति के साथ अकेले में खुलकर अपनी बात कह पाती है, क्योंकि वही उसकी राय का सम्मान करता है। समाज में महिलाओं से उम्मीद की जाती थी कि वे सिर ढककर रहें, घर के भीतर रहें और सभी बड़े फैसले पुरुष ही लें । मैं हमेशा से स्वतंत्र रही हूं, इसलिए इस किरदार ने मुझे एहसास कराया कि समाज ने कितनी लंबी यात्रा तय की है।

मैं सभी कलाकारों का आभारी हूं क्योंकि उन्होंने मेरे लिखे किरदारों को बिल्कुल वैसा ही जीवन दिया जैसा मैंने कल्पना की थी।

राज जी, इस फिल्म का निर्देशन करते समय सबसे यादगार अनुभव क्या रहा?

राजकुमार संतोषी : फिल्म का हर दृश्य चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ भावनात्मक भी था। मैं सभी कलाकारों का आभारी हूं क्योंकि उन्होंने मेरे लिखे किरदारों को बिल्कुल वैसा ही जीवन दिया जैसा मैंने कल्पना की थी। लेखक और निर्देशक सिर्फ कागज पर पात्र रचते हैं, लेकिन उन्हें चेहरा, भावनाएं और आत्मा अभिनेता ही देते हैं।

क्या शूटिंग के दौरान प्रीति ने भी कोई रचनात्मक सुझाव दिया ?

राजकुमार संतोषी : हां, उन्होंने बातचीत के दौरान "हेकड़ी" जैसा पुराना शब्द सुझाया, जो उस दौर के हिसाब से बिल्कुल उपयुक्त लगा। उन्होंने पुराने नाटकों के भी कई संदर्भ दिए, जिससे संवाद और अधिक प्रामाणिक बन गए।

प्रीति जिंटा : यह शब्द मुझे एक पुराने नाटक से याद था, जिसके बारे में मेरी मां ने बताया था। मुझे लगा कि यह उस दौर की भाषा के लिए बिल्कुल सही रहेगा, इसलिए हमने इसे संवादों में स्वाभाविक रूप से शामिल किया।

फिल्म स्वतंत्रता दिवस के आसपास रिलीज हो रही है। क्या इससे यह रिलीज और भी खास बन जाती है?

राजकुमार संतोषी : बिल्कुल। हमारी फिल्म 14 अगस्त को रिलीज हो रही है, जो विभाजन की कहानी के लिए बेहद महत्वपूर्ण तारीख है। दिलचस्प बात यह है कि मेरे पिता की फिल्म शहनाई 15 अगस्त 1947 को, यानी भारत की आजादी के दिन रिलीज हुई थी। इसलिए यह रिलीज मेरे लिए भावनात्मक रूप से भी बेहद खास है।

-लिपिका वर्मा

SCROLL FOR NEXT