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दिवाली

दीपावली : धर्म की लौ और प्रकाश की परंपरा का पर्व

Om Prakash Mishra

दीपावली पर अमावस्या की  रात को मनुष्य अपने घरों में असंख्य दीप जलाकर उजाले का पर्व बनाकर एक तरह से प्रकृति को चुनौती देता है। यह भारतीय संस्कृति की ऐसी अनूठी विशेषता को सामने लाता है जो अंधकार को कोसने के बजाय दीप जलाने की परंपरा लेकर आता है यही दीपावली का सबसे बड़ा दर्शन है । दीपावली का पर्व बताता है कि परिस्थितियां चाहे जितनी प्रतिकूल हों, मनुष्य को अपने हिस्से का प्रकाश पैदा करने का प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए।

राम की विजय का वास्तविक अर्थ

चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने और रावण पर विजय प्राप्त कर राम जब अयोध्या पहुंचे तो नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया। इस घटना का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि एक मर्यादावान व जनप्रिय राजकुमार अपने राज्य में लौटा था। महत्वपूर्ण यह है कि उनके साथ उस आदर्श की वापसी हुई थी जिसमें सत्ता से ऊपर मर्यादा, बल से ऊपर न्याय और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर लोकहित था। राम की विजय का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है जब समाज में कमजोर सुरक्षित हों, शासक उत्तरदायी हों और न्याय किसी की कृपा का मोहताज न हो। इस दृष्टि से दीपावली आज भी रामराज्य के आदर्शों को परखने का अवसर देती है।

नरकासुर के वध की कथा

श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की कथा भी दीपोत्सव की परंपरा से जुड़ी है। इस आख्यान में एक अत्याचारी के अंत के साथ भय और उत्पीड़न से मुक्ति का भाव निहित है। जैन परंपरा में भगवान महावीर के निर्वाण का संबंध दीपावली से है। वहां दीप का अर्थ आत्मज्ञान और मुक्ति की अनुभूति है। इन कथाओं को एक साथ देखें तो स्पष्ट होता है कि दीपावली किसी एक धार्मिक प्रसंग तक सीमित नहीं है। यह अन्याय से मुक्ति, आत्मिक जागरण और जीवन में शुभता की स्थापना का व्यापक उत्सव है।

लक्ष्मी और गणेश का संयुक्त पूजन

दीपावली के धार्मिक अनुष्ठानों में लक्ष्मी और गणेश का संयुक्त पूजन विशेष अर्थ रखता है। समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी के प्रकट होने की पौराणिक कथा समृद्धि की प्राप्ति का प्रतीक है। लक्ष्मी को धन और ऐश्वर्य की देवी कहा गया है, लेकिन समृद्धि की आध्यात्मिक अवधारणा केवल धन के संचय से पूरी नहीं होती। स्वस्थ शरीर, संतुष्ट मन, परिवार में प्रेम, आजीविका के साधन और दूसरों के प्रति उदारता भी जीवन की संपदा हैं। जिस व्यक्ति के पास अकूत धन है, लेकिन चैन की नींद नहीं, संबंधों में विश्वास नहीं और किसी जरूरतमंद के लिए संवेदना नहीं, क्या उसे वास्तव में समृद्ध कहा जा सकता है ?

दीपावली पूजन में लक्ष्मी के साथ गणेश की उपस्थिति इंगित करती है कि गणेश बुद्धि, विवेक और शुभारंभ के प्रतीक हैं। लक्ष्मी संसाधन उपलब्ध कराती हैं तो गणेश उन संसाधनों के सही इस्तेमाल की प्रेरणा देते हैं। धन कमाने की क्षमता महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे किस उद्देश्य के लिए और  किस तरीके से अर्जित किया गया है यह भी महत्वपूर्ण है। बुद्धि से रहित संपन्नता अहंकार पैदा कर सकती है और विवेक से जुड़ी संपन्नता समाज के लिए अवसरों का निर्माण कर सकती है। इसीलिए लक्ष्मी-गणेश का पूजन केवल धन प्राप्ति की कामना नहीं, बल्कि धन और सद्बुद्धि के संतुलन का आध्यात्मिक संदेश भी है।

मिट्टी का दीपक

दीपावली का सबसे जीवंत प्रतीक है मिट्टी का दीपक। मिट्टी, तेल, बाती और अग्नि के मेल से तैयार यह छोटा-सा प्रकाश स्रोत हमें बहुत कुछ सिखाता है। वह अपनी मिट्टी से अलग नहीं होता, सीमित साधनों में अपना काम करता है और आसपास के अंधकार को दूर करने में वैसा ही योगदान देता है जैसा राम सेतु बनाने में गिलहरी का योगदान था। उसकी लौ का आकार छोटा हो सकता है, लेकिन उसके उद्देश्य की सार्थकता छोटी नहीं होती। मनुष्य भी अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी दूसरे के जीवन में प्रकाश पहुंचा सकता है। किसी निराश व्यक्ति को हौंसला देना, किसी अशिक्षित बच्चे को पढ़ाना या किसी असहाय का हाथ थामना भी एक दीप जलाने जैसा ही है।

कठिन चुनौती

आज दीप पर्व के सामने पर्यावरण संरक्षण की  कठिन चुनौती भी है। पटाखों से निकलने वाला धुआं, तेज आवाज, प्लास्टिक और अन्य सजावटी कचरा तथा पशु-पक्षियों को होने वाली परेशानी उत्सव के आनंद पर प्रश्न उठाते हैं। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जिस जल से जीवन चलता है और जिस धरती पर हमारे पर्व मनाए जाते हैं, उसकी उपेक्षा करके हम कैसी समृद्धि का उत्सव मना रहे हैं ? 

दीपावली का अर्थ प्रकृति को असुविधा में डालकर कृत्रिम चमक पैदा करना नहीं हो सकता। मिट्टी के दीये, पुनः उपयोग योग्य सजावट, प्राकृतिक रंगों की रंगोली और आतिशबाजी में ग्रीन पटाखे जलाकर और आत्मसंयम अपनाकर हम परंपरा का आनंद भी ले सकते हैं और पर्यावरण के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी भी निभा सकते हैं।

खुशियों को घर से बाहर भी ले जाएं

दीपावली को मानवीय कल्याण से जोड़ने का एक व्यावहारिक रास्ता यह भी है कि हम उत्सव की खुशियों को अपने घर की चारदीवारी से बाहर ले जाएं। किसी जरूरतमंद परिवार के बच्चों के लिए कपड़े और पुस्तकें जुटाना, श्रमिकों को सम्मानपूर्वक उपहार देना, अकेले रह रहे बुजुर्गों के साथ समय बिताना और समाज में उपेक्षित लोगों को उत्सव में सहभागी बनाना इस पर्व को वास्तविक विस्तार दे सकता है। आखिर खुशियां जितनी बांटी जाती हैं, उतनी ही बढ़ती हैं।

समष्टि के कल्याण का पर्व

दीपावली का संदेश किसी एक रात तक सीमित नहीं रहना चाहिए। राम की कथा हमें मर्यादा का महत्व बताती है, कृष्ण का आख्यान अन्याय के प्रतिरोध की प्रेरणा देता है, महावीर का निर्वाण आत्मिक मुक्ति की राह दिखाता है, लक्ष्मी समृद्धि का बोध कराती हैं और गणेश विवेक की अनिवार्यता समझाते हैं तो नन्हे दीपक की लौ अपनी सामर्थ्य अनुसार समाज को प्रकाशित करने का संदेश देती है इन सबको जोड़ने वाला एक ही सूत्र है-मनुष्य अपने जीवन को दूसरों के लिए भी उपयोगी बनाए। जैसे अकेले जलने वाले दीपक का ज्यादा महत्व नहीं हो सकता वैसे ही केवल अपने लिए जीने वाले मनुष्य का भी महत्व देश या समाज के लिए अधिक नहीं होता। कह सकते हैं कि दीपावली व्यष्टि नहीं समष्टि के कल्याण का पर्व है। 

इसलिए इस दीपावली केवल घरों में दीप जलाने के संकल्प सहित व्यवहार में भी  बदलाव लाने का प्रयास करें। धन कमाएं, लेकिन ईमानदारी से; उत्सव मनाएं, लेकिन प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना; खुशियां मनाएं, लेकिन किसी वंचित की उदासी को अनदेखा किए बिना।    दीपावली की असली सफलता तब होगी जब अमावस्या की रात के दीप बुझ जाने के बाद भी हमारे भीतर संवेदना, विवेक और सद्भाव की लौ जलती रहे। यही प्रकाश पर्व की परंपरा का सम्मान और उसके भविष्य की सबसे सुंदर कल्पना है।(युवराज) डॉ. घनश्याम बादल

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