भारत उन देशों की मदद के लिए रुपये में व्यापारिक भुगतान को बढ़ावा देना चाहता है, जो विदेशी मुद्रा (हार्ड करेंसी) की कमी का सामना कर रहे हैं। इससे इन देशों को आवश्यक वस्तुओं का आयात जारी रखने में मदद मिलेगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को यह बात कही।
थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों के दौरान अटलांटिक काउंसिल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि जिन देशों के पास विदेशी मुद्रा की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है, उन्हें व्यापार जारी रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था इस समस्या को दूर करने में मददगार हो सकती है।
सीतारमण ने कहा, “भारत जिन कदमों पर काम करना चाहता है, उनमें से एक यह है कि भारत से वस्तुओं का आयात करने वाले देश भुगतान रुपये में कर सकें।”
उन्होंने कहा कि भारत रुपये और संबंधित देशों की स्थानीय मुद्राओं में व्यापारिक भुगतान की व्यवस्था को सुविधाजनक बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहे देशों को आवश्यक वस्तुओं का आयात जारी रखने में मदद करना है।
वित्त मंत्री ने कहा, “रुपये और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था उन देशों के लाभ के लिए है, जिनके पास विदेशी मुद्रा की कमी है, लेकिन उन्हें कुछ वस्तुओं का आयात करना जरूरी है। इस तरह रुपये में व्यापार के जरिए स्थानीय मुद्रा में भुगतान संभव बनाकर व्यापार को जारी रखने का प्रयास किया जा रहा है।”
उन्होंने कहा कि भारत इस व्यवस्था पर काम कर रहा है और इसे लागू करने की संभावनाओं को समझ चुका है।
सीतारमण ने कहा कि इस व्यवस्था पर ऐसे समय में काम किया जा रहा है, जब बढ़ती आर्थिक मंदी कई देशों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रही है।
उन्होंने कहा कि युद्ध सहित बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण कई देश कर्ज के जाल और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के संकट में फंस गए हैं।
वित्त मंत्री के अनुसार, बहुपक्षीय विकास संस्थानों को इन समस्याओं पर प्रतिक्रिया देने में कई साल लग जाते थे। कई मामलों में इसमें तीन से चार साल तक का समय लग जाता था। हालांकि, अब इन प्रक्रियाओं में सुधार किया जा रहा है।
बहुपक्षीय सहयोग के संदर्भ में सीतारमण ने कहा कि भारत अधिक सार्थक द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत कई देशों के साथ व्यापार समझौतों की दिशा में प्रगति कर रहा है, जिससे साझेदारी और मजबूत हो रही है।
हालांकि, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान (ASEAN) के साथ भारत के व्यापार समझौते पर उन्होंने चिंता जताई।
सीतारमण ने कहा, “आसियान देशों के साथ हमारा व्यापार समझौता भारत के खिलाफ काफी असंतुलित है। हम इसके जरिए आसियान देशों को होने वाले लाभ के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि भारत की चिंताओं पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए।”
उन्होंने कहा कि भारत को आयात, घरेलू बाजार और विनिर्माताओं से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिनका समाधान जरूरी है।
वित्त मंत्री ने बताया कि भारत और आसियान के बीच व्यापार समझौते की समीक्षा की जा रही है। भारत इस समझौते को जारी रखना चाहता है, लेकिन इसे थोड़े बदले हुए और अधिक संतुलित स्वरूप में लागू करने का इच्छुक है।
उनके मुताबिक, समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों को लाभ पहुंचाना होना चाहिए और भारत के घरेलू उद्योगों तथा बाजार से जुड़ी चिंताओं को भी उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
सीतारमण ने कहा कि भारत ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र की 16 अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (RCEP) से जानबूझकर दूरी बनाए रखी, क्योंकि इस समझौते में भारत के लिए पर्याप्त लाभ नहीं दिखाई दे रहे थे।
उन्होंने कहा कि भारत इन सदस्य देशों के साथ व्यापार जारी रखे हुए है, लेकिन इस समझौते में शामिल होना भारत के हित में नहीं होता।
गौरतलब है कि भारत ने नवंबर 2019 में RCEP से हटने का फैसला किया था। इसके पीछे चीन सहित अन्य देशों से सस्ते आयात बढ़ने की आशंका, व्यापार घाटे में वृद्धि और घरेलू उद्योगों तथा कृषि क्षेत्र को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलने जैसी चिंताएं प्रमुख थीं।