सोना पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहता है, चमक बिखेरता रहता है 
बिजनेस

सोने की चमक फीकी क्यों नहीं पड़ती?

दुल्हन की संदूकची से सेंट्रल बैंकों की तिजोरी तक सोने की कहानी

Ravi

दुल्हन की संदूकची में रखा सोना शायद दुनिया की सबसे पुरानी बचत योजनाओं में से एक है। न कोई पासबुक, न कोई पासवर्ड, न कोई ऐप। मंगलसूत्र-हार, कुछ चूड़ियां, कानों के झुमके, नथ, टीका और शायद कुछ गोल्ड कॉइन - पीढ़ी बदलती रहती है, लेकिन सोना इसी रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहता है, चमक बिखेरता रहता है।

भारत में सोने की असली कहानी यहीं से शुरू होती है। यह केवल गहना नहीं है, यह बचत है, सामाजिक सुरक्षा है, विरासत है और जरूरत पड़ने पर नकदी में बदल सकने वाली संपत्ति भी है। दुनिया में मंदी छा जाए, युद्ध छिड़ जाए, शेयर बाजार लुढ़क जाएं, ब्याज दरें आसमान छूने लगें, रुपये की कीमत घट जाए, कच्चे तेल के दामों में उबाल आ जाए... सोने की चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। आखिर सोने में ऐसा क्या है कि यह सदियों से सबसे दमदार प्रॉपर्टी है?

सोने की अहमियत समझने में भारत सबसे आगे रहा है, यही कारण था कि हम सोने की चिड़िया कहलाते थे। आज भी इस कहानी का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा किसी गहनों की दुकान या आरबीआई की तिजोरी में नहीं, भारतीय घरों में छिपा है।

अनुमानों के मुताबिक भारतीय परिवारों के पास 25,000 टन के आसपास सोना है। यह कितनी बड़ी पूंजी है, यह समझने के लिए इतना काफी है कि भारत के घरों में मौजूद सोने का यह भंडार दुनिया के किसी भी बड़े संस्थागत स्वर्ण भंडार की तुलना में असाधारण रूप से विशाल है। विश्व स्वर्ण परिषद ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था में सक्रिय किए जा सकने वाले सबसे बड़े निष्क्रिय संपत्ति भंडारों में गिना है।

अब इसके सामने एक दूसरा आंकड़ा परखिए - जून 2026 के अंत में भारतीय रिजर्व बैंक के पास करीब 880 टन सोना था। यानी भारतीय परिवारों के पास अनुमानित सोना RBI के भंडार से लगभग 26 से 28 गुना अधिक है। एक तरफ देश की करोड़ों निजी तिजोरियां, दूसरी तरफ देश की केंद्रीय तिजोरी - और दोनों में वही अनमोल धातु - सोना। यही विरोधाभास भारत को दुनिया के सबसे दिलचस्प सोना बाजारों में से एक बनाता है।

और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। RBI के पास सोना करीब 880 टन ही है, लेकिन कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 16 प्रतिशत हो गई। कारण और सोना खरीदना नहीं, बल्कि सोने की कीमत में तेज बढ़ोतरी थी। वह भी तब, जब रुपये की कीमत लगातार गिर रही है।

मतलब सीधा-सा है, भले दशकों तक सोने की कीमत एक ही जगह पर टिकी रहे, लेकिन जब उसकी कीमत में उछाल आता है तो वह एकदम दोगुना-तीन गुना हो जाती है। इसीलिए केंद्रीय बैंक भी इसे रखते हैं।

नोट तो रद्दी का टुकड़ा हैं, कीमत तो सोने की ही है

पिछले चार वर्षों में दुनिया के केंद्रीय बैंकों ने औसतन करीब 1,000 टन सोना सालाना जमा किया है, जबकि उससे पहले के दशक में यह औसत करीब 500 टन था। यानी डिजिटल मुद्रा, इलेक्ट्रॉनिक भुगतान और अत्याधुनिक वित्तीय बाजारों के दौर में भी दुनिया की मौद्रिक संस्थाएं अपनी तिजोरियों में पीली धातु के लिए का भंडार बढ़ा रही हैं।

इसका कारण भी है, बड़ा लॉजिकल - आपकी जेब में पड़ा 100 रुपये का नोट असल में कागज का टुकड़ा मात्र है, आपकी जेब में रखा डॉलर, यूरो, पाउंड, येन, दिरहम भी रद्दी कागज मात्र हैं। अगर कल कोई देश या केंद्रीय बैंक कह दे कि ये नोट चलन में नहीं माने जाएंगे तो उन नोटों की कहीं कोई कीमत मिलेगी? नहीं! भारत में नोटबंदी के दौरान यही तो हुआ, अचानक कह दिया गया कि इस डेट के बाद 1000 और 500 रुपये के नोट रद्दी में बदल जाएंगे।

लेकिन सोने के साथ ऐसा नहीं है! सोना और चांदी, दोनों ऐसी धातु हैं, जिनकी कीमत कोई सरकार, कोई केंद्रीय बैंक जीरो नहीं कर सकता। सरकार अगर कह भी दे कि सोना अब मूल्यहीन है, तब भी आप दूसरे देश में उसी सोने से सबकुछ खरीद सकते हैं। रुपया भी तभी तक असली मुद्रा था, जब तक उसमें उसी कीमत की धातु होती थी।

बुजुर्गों को याद होगा कि आजादी के बाद भी रुपये में चांदी की मात्रा होती थी और उस चांदी से कभी भी, उतना ही माल खरीदा जा सकता था, जितने रुपये का वह सिक्का होता था। वही असली मुद्रा थी, क्योंकि उस चांदी की मात्रा रुपये से तब जितना घी, चीनी, कपड़े आदि खरीदे जा सकते थे, आज भी उतनी चांदी से घी, चीनी, कपड़े आदि की उतनी ही मात्रा खरीदी जा सकती है। सरकारों ने धीरे-धीरे नोट चलन में आए और लोगों की जेब से ‘असली मुद्रा’ निकाल कर उन्हें भुला ही दिया कि असली पैसा होता क्या है।

सोना खुद किंग है

रूस-यूक्रेन में युद्ध छिड़ा तो अमेरिका ने रूस की संपत्तियां, उसके खरबों रुपये जब्त कर लिए। ईरान से युद्ध छिड़ा तो उसकी संपत्तियां जब्त कर लीं। उसके बाद ही सारे देशों को समझ आया कि संपत्ति डॉलर में होगी तो अमेरिका कभी भी जब्त कर सकता है, उन पर प्रतिबंध लगा सकता है, लेकिन अगर वे डॉलर की बजाय सोना खरीद कर रख लें तो अमेरिका की दादागिरी नहीं चलेगी। यानी सोना खुद में किंग है। यही कारण है कि अब चीन जैसे सक्षम देश अपने देश के विदेशी मुद्रा भंडार के बदले सोना खरीद रहे हैं। इसी कारण सोना के दाम एक साल में दोगुना तक हो गए।

गहना ही नहीं, निवेश भी है सोना

भारत में सोना केवल केंद्रीय बैंक नहीं खरीदता। परिवार खरीदते हैं। निवेशक खरीदते हैं। आभूषण उद्योग खरीदता है। और जब कीमत बहुत बढ़ जाती है, तब भी मांग बहुत नहीं घटती, बस उसका रूप बदल जाता है। 2026 की पहली तिमाही इसका शानदार उदाहरण है। जनवरी से मार्च के बीच भारत में सोने की मांग 151 टन रही, जो पिछले साल की इसी अवधि से 10 प्रतिशत अधिक थी।

लेकिन असली कहानी मांग की मात्रा से ज्यादा उसकी संरचना में थी। निवेश के लिए सोने की मांग 82 टन तक पहुंच गई, जिसमें बार और सिक्कों की मांग 62 टन थी। आभूषणों की मांग 66 टन रही। पहली बार ऐसा दृश्य सामने आया कि निवेश के लिए खरीदा गया भौतिक सोना आभूषणों की मांग के लगभग बराबर पहुंच गया।

यह बदलाव गौर करने लायक है। सोने को कभी केवल ब्याह-शादी में दुल्हन के गहनों से जोड़कर देखा जाता था। अब उसी सोने की एक बड़ी कहानी निवेश की भी है। दूसरी तिमाही ने इससे भी दिलचस्प तस्वीर दिखाई। अप्रैल से जून के बीच सोने की मांग घटकर 131 टन रह गई। लेकिन सोने पर खर्च रिकॉर्ड 1.979 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया - पिछले साल की दूसरी तिमाही से 35 प्रतिशत अधिक।

यानी लोगों की सोना खरीदने की मात्रा में भले कमी आई, लेकिन इस बार पहले से भी ज्यादा पैसे का सोना खरीदा। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है - हमारे देश में सोने की जितनी खपत है, उसका मात्र 2 प्रतिशत हमारी खदानों से आता है, 16 प्रतिशत पुराने सोने की रिसाइक्लिंग से और 82 प्रतिशत हिस्सा आयात करना पड़ता है। इसके लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है और रुपये के बदले डॉलर लेने से रुपये की कीमत गिरती जा रही है।

अब सोना भी हो रहा डिजिटल

जैसे असली मुद्रा को हटाकर कागज के नोट थमा दिए गए, वैसे ही अब सोने को भी हाथ से हटाकर मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखने वाला बनाया जा रहा है। युवा पीढ़ी के लिए सोना खरीदने का अर्थ हमेशा गहना खरीदना नहीं रह गया है। 2026 की पहली छमाही में भारत के स्वर्ण कोषों की होल्डिंग 119 टन तक पहुंच गई। इन कोषों में प्रबंधनाधीन संपत्ति करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये थी। यानी सोने की कहानी धीरे-धीरे आभूषण की दुकान से निकलकर वित्तीय बाजार तक पहुंच चुकी है।

सोने की छोटी बहन - चांदी

लंबे समय तक चांदी को सोने की छोटी बहन या गरीब का सोना कहा जाता रहा। अब यह परिभाषा अधूरी लगने लगी है। सोना मुख्य रूप से बचत और आभूषण की धातु है, जबकि चांदी की एक बड़ी पहचान औद्योगिक धातु की भी है। सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, विद्युत उपकरण, वाहन और आधुनिक तकनीकी ढांचे में चांदी का इस्तेमाल होता है। 2025 में भारत ने 7,222 टन चांदी आयात की।

कीमत में औसतन 46 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद आयात केवल 6 प्रतिशत घटा। जनवरी और फरवरी 2026 में ही भारत ने 1,263 टन चांदी आयात कर ली, दस साल के औसत से 25 प्रतिशत अधिक। सोना हजारों साल के भरोसे की कहानी है तो चांदी आधुनिक अर्थव्यवस्था की जरूरत की कहानी भी बन रही है।

दुनिया ने सिक्कों से कागज के नोट तक, बैंक से इंटरनेट बैंकिंग तक और नकदी से डिजिटल भुगतान तक लंबी यात्रा की है। लेकिन पांच हजार साल से अधिक पुरानी इस धातु ने हर बदलाव के बीच अपना स्थान बनाए रखा है। शायद इसलिए नहीं कि सोना कभी नहीं बदलता बल्कि इसलिए कि दुनिया बदलती रही, पर मनुष्य की एक जरूरत नहीं बदली - ऐसी संपत्ति रखने की जरूरत, जिस पर वह मुश्किल समय में भरोसा कर सके और वह संपत्ति सोना-चांदी ही है।

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