नई दिल्ली : अमेरिका की ओर से ईरान पर बढ़ाए गए आर्थिक दबाव और नए प्रतिबंधों के बीच वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। भारत के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो इसका असर भारत के आयात बिल, रुपये की विनिमय दर, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर पड़ सकता है।
वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली ने अपनी रिपोर्ट में 2026 की चौथी तिमाही के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान 75 डॉलर से बढ़ाकर 100 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। ब्रोकरेज का कहना है कि वैश्विक तेल भंडार तेजी से कम हो रहे हैं और मध्य पूर्व से सामान्य आपूर्ति बहाल होने में 2027 तक का समय लग सकता है। हालिया बाजार रिपोर्टों में भी ब्रेंट के 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की संभावना का उल्लेख किया गया है।
मॉर्गन स्टेनली के आकलन के मुताबिक, वैश्विक ऊर्जा बाजार उम्मीद से ज्यादा तेजी से सख्त हो रहा है। समुद्र में मौजूद तेल के भंडार में भी उल्लेखनीय कमी आई है। इसके अलावा चीन समेत कई देशों के तटवर्ती भंडार में भी गिरावट देखी जा रही है।
रिफाइनिंग क्षमता पर दबाव के बीच गैसोइल और ब्रेंट के बीच का अंतर भी बढ़ा है। इससे भौतिक तेल बाजार में आपूर्ति की तंगी का संकेत मिल रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि वैश्विक शेयर बाजारों के लिए भी चुनौती बन सकती है। महंगे तेल से महंगाई बढ़ सकती है, जिससे केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो सकता है। इससे बॉन्ड यील्ड पर दबाव बढ़ने और इक्विटी बाजारों में अस्थिरता आने की आशंका रहती है।
भारत कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है। ऐसे में ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने या लंबे समय तक ऊंचा बने रहने से कई स्तरों पर असर पड़ सकता है।
आयात बिल बढ़ेगा : महंगे कच्चे तेल से भारत का तेल आयात बिल बढ़ेगा, जिससे व्यापार घाटे पर दबाव पड़ सकता है।
रुपये पर दबाव : तेल आयात के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ने से रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
महंगाई का जोखिम : पेट्रोल, डीजल और एविएशन फ्यूल की लागत बढ़ने से परिवहन और माल ढुलाई महंगी हो सकती है।
रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं : ऊंची परिवहन लागत का असर खाद्य पदार्थों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
सरकारी खर्च बढ़ सकता है : महंगे कच्चे माल और ऊर्जा की लागत का असर उर्वरक सब्सिडी सहित सरकारी खर्च पर भी पड़ सकता है।
शिपिंग लागत में वृद्धि : पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने पर युद्ध जोखिम बीमा और मालभाड़ा महंगा हो सकता है।
ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव भी भारत के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
अमेरिकी सीनेट ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 86-11 के बहुमत से मंजूरी दी है। प्रस्तावित कानून में रूस के तेल और गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों तथा रूस के ऊर्जा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले कुछ देशों के सामान पर राष्ट्रपति को 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। हालांकि, यह विधेयक अभी कानून नहीं बना है और इसे प्रतिनिधि सभा की मंजूरी तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति की जरूरत होगी।
भारत और चीन रूस के प्रमुख तेल खरीदारों में शामिल हैं। इसलिए यदि यह प्रावधान कानून बनता है और भारत पर लागू किया जाता है, तो रूसी तेल खरीदना भारत के लिए वित्तीय और व्यापारिक रूप से अधिक जटिल हो सकता है।
एक तरफ मध्य पूर्व में तनाव से अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी का जोखिम है, तो दूसरी तरफ रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते तेल पर संभावित अमेरिकी प्रतिबंध या टैरिफ का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, आयात लागत और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।