नई दिल्ली : एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा ने अपने व्यक्तिगत दिवाला मामले की सुनवाई के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की पांच सदस्यीय पीठ गठित किए जाने का बुधवार को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में विरोध किया। उनके वकील सस्मित पात्रा ने कहा कि एनसीएलटी को ऐसी बड़ी पीठ गठित करने का अधिकार नहीं है और इसका आदेश ‘त्रुटिपूर्ण और गलत’ है।
यह विवाद चंद्रा की करीब 22,006 करोड़ रुपये के ऋणदाता दावों से जुड़े व्यक्तिगत गारंटी मामले का है। चंद्रा ने करीब 6.5 करोड़ रुपये में निपटारे का प्रस्ताव दिया था। एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ ने मंगलवार को सदस्य (न्यायिक) निलेश शर्मा के आदेश पर रोक लगा दी थी और मामले की अगली सुनवाई 23 सितंबर को तय की थी।
एनसीएलएटी में पात्रा ने कंपनी अधिनियम की धारा 419(5) और (6) का हवाला देते हुए कहा कि अलग-अलग राय होने पर मामले को दूसरे सदस्य या सदस्यों के पास भेजा जा सकता है, लेकिन इससे पांच सदस्यीय पीठ गठित करने का अधिकार नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि अशोक कुमार भारद्वाज और निलेश शर्मा की राय पात्रता और पुनर्भुगतान योजना के प्रमुख मुद्दों पर मूलतः समान थी। वहीं, ऋणदाताओं की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामले में तीन अलग-अलग विचार सामने आए हैं और असामान्य परिस्थितियों को देखते हुए बड़ी पीठ से सुनवाई उचित है।
चंद्र की ओर से पेश अधिवक्ता सस्मित पात्रा ने कहा कि मामले की सुनवाई एक तरह के ‘मीडिया ट्रायल’ में बदल गई, जिससे उनके मुवक्किल की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि NCLAT की कार्यवाही का इस्तेमाल मीडिया में बयान देने के लिए नहीं किया जा सकता।
चंद्रा के वकील ने यह भी कहा कि प्रस्तावित 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान को लेकर उन्हें सार्वजनिक रूप से बदनाम किया जा रहा है, जबकि योजना को मंजूरी देने वाला कोई अंतिम आदेश नहीं है। एनसीएलएटी ने कहा कि इस शिकायत को एनसीएलटी के समक्ष उठाया जा सकता है। अंततः अपीलों को लंबित रखते हुए मामले को 7 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।