नई दिल्ली : संसदीय समिति ने राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (आईबीसी) से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए अलग बेंच या विशेष वर्टिकल गठित करने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि इससे दिवाला मामलों का समयबद्ध निपटारा तेज होगा और कंपनियों से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर भी न्यायाधिकरण पर्याप्त ध्यान दे सकेगा।
कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय संबंधी विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति ने देश में न्यायाधिकरणों के कामकाज की समीक्षा पर अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव दिया है। रिपोर्ट इसी महीने संसद में पेश की गई थी। समिति ने कहा कि एनसीएलटी के अधिकार क्षेत्र में दिवाला मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और अब ये न्यायाधिकरण के कुल मामलों में आधे से अधिक हो चुके हैं। ऐसे में दिवाला मामलों के लिए पर्याप्त न्यायिक एवं तकनीकी सदस्यों, रजिस्ट्री कर्मचारियों और जरूरी बुनियादी ढांचे के साथ विशेष व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
समिति ने कहा कि दिवाला मामलों के बढ़ते बोझ के कारण एनसीएलटी की कंपनियों से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी प्रभावित नहीं होनी चाहिए। कंपनी कानून, 2013 के तहत विलय एवं अधिग्रहण, कॉरपोरेट गवर्नेंस और हितधारकों के हितों की सुरक्षा जैसे मामले भी न्यायाधिकरण के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
एनसीएलटी ने समिति को बताया कि उसकी स्वीकृत सदस्य संख्या 62 पर लंबे समय से बनी हुई है, जबकि आईबीसी लागू होने के बाद न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र और मामलों की जटिलता में काफी विस्तार हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, न्यायाधिकरण में एक अध्यक्ष, 31 न्यायिक सदस्य और 31 तकनीकी सदस्यों के पद स्वीकृत हैं। हालांकि, 13 जुलाई तक केवल अध्यक्ष के अलावा 26 न्यायिक और 25 तकनीकी सदस्य ही कार्यरत थे।
समिति ने कहा कि मामलों की बढ़ती संख्या और जटिलता को देखते हुए न्यायाधिकरण में अतिरिक्त बेंच और सदस्यों की जरूरत है। इनकी आवश्यकता की नियमित अंतराल पर समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि काम के बोझ के अनुरूप न्यायिक क्षमता उपलब्ध कराई जा सके।
रिपोर्ट में एनसीएलटी के कर्मचारियों की कमी पर भी चिंता जताई गई है। समिति के अनुसार, न्यायाधिकरण के 95 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी संविदा के आधार पर कार्यरत हैं। इसके अलावा प्रतिनियुक्त कर्मचारियों के लगातार स्थानांतरण और संविदा कर्मचारियों के उच्च स्तर के पलायन से प्रशासनिक कामकाज में निरंतरता प्रभावित होती है। इससे संस्थागत अनुभव और विशेषज्ञता विकसित करने में भी बाधा आती है।
समिति ने विधि एवं न्याय मंत्रालय से एनसीएलटी की कर्मचारियों से जुड़ी जरूरतों का नए सिरे से आकलन करने और पर्याप्त स्थायी पद सृजित करने की सिफारिश की है। उसका कहना है कि इससे संविदा और प्रतिनियुक्त कर्मचारियों पर निर्भरता कम होगी तथा न्यायाधिकरण के कामकाज में स्थिरता आएगी।
देश में एनसीएलटी की प्रधान पीठ और नई दिल्ली पीठ के अलावा इलाहाबाद, अहमदाबाद, बेंगलुरु, चंडीगढ़, चेन्नई, कटक, हैदराबाद, इंदौर, कोलकाता, कोच्चि और मुंबई में भी पीठ हैं।
एनसीएलटी ने जुलाई में बताया था कि उसने जून तिमाही में कुल 5,517.66 करोड़ रुपये की राशि से जुड़ी 78 समाधान योजनाओं को मंजूरी दी। न्यायाधिकरण के अनुसार, आईबीसी लागू होने के बाद किसी वित्त वर्ष की पहली तिमाही में समाधान योजनाओं की मंजूरी के लिहाज से यह उसका अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन रहा।